उसे लगा वह आज फिर लेट हो जाएगा।
उतावली आँखों से उसने घड़ी की ओर देखा। नौ बजा चाहते थे। कल भी देरी से पहुँचने के कारण बाॅस ने उसे तीखी नजरों से देखा था। शायद वह डाँट देता तो असर इतना ना होता। मौन संवाद न जाने क्यों इतने प्रभावी होते हैं? बाॅस से वह बहुत डरता था, अभी प्रोबेशन पर भी था।
छः माह पहले ही उसकी शादी हुई थी। उम्र के तेईस वर्ष भी अभी पूरे होने थे। वैसे तो यह उम्र एक भरे-पूरे जवान आदमी की होती है पर उसका चेहरा, विशेषकर वह जब बोलता या मुस्कुराता, एक बालोचित अबोधता से भर जाता। अभी वह इतना परिपक्व नहीं हुआ था पर हाँ, शादी के बाद उसके व्यवहार में कुछ गंभीरता अवश्य आई थी हालांकि उसका सहज अक्खड़ स्वभाव अब भी बरकरार था। उसे कभी-कभी गुस्सा भी आता पर थोड़ी देर बाद ही वह शांत भी हो जाता। उसका इकहरा बदन, ढीले कपड़े, पतला लंबोतरा चेहरा, बड़ी-बड़ी गहरी दार्शनिक आँखें, सर पर शैम्पू से धोए काले लहराते बाल एवं उन्नत ललाट उसके गुस्से को ज्यादा देर टिकने नहीं देते। गुस्सा उसके व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं लगता। उसके हल्के शरीर पर क्रोध का भार अधिक देर नहीं ठहर पाता था।
उसके दोस्तों ने उसे खूब से समझा दिया था , बीवी को अंगूठे के नीचे रखना वरना जीवन भर आगे-पीछे डोलेगा। वह यारों का यार था, दोस्तों की बात उसने गाँठ बाँध ली। वह पढ़ा-लिखा था पर अभी उसका विवेक इतना जागृत नहीं हुआ था कि आगा-पीछा सोच सकेे।
पहले उसने कभी अपने व्यवहार में कठोरता नहीं दिखाई थी, पर शादी के बाद उसका व्यवहार अखरोट जैसा हो गया ऊपर से कठोर एवं भीतर से कोमल।
उसे फिर लगा देरी न हो जाए। बाॅस की घूरती आँखें याद आते ही वह चिड़चिड़ा गया। बाथरूम जाने से पहले उसने बीवी पर हुक्म चलाना प्रारंभ किया।
‘‘मैं आऊं उससे पहले जूते पाॅलिश कर देना। कितनी बार कहा रात को ही कर दिया करो पर तुम सुनती कहाँ हो। और हाँ…… कपडे डबलबेड पर रख देना, साथ में पर्स, रुमाल, कँघा एवं स्कूटर की चाबी भी। मैं तैयार होऊँ तब तक ब्रेकफास्ट तैयार कर देना….. डबल आमलेट और एक गिलास दूध…….. एक सादा परांठा भी बना देना।’’ उसने आदेशों का अंबार लगा दिया, कुछ हल्का महसूस किया एवं बाथरूम में घुस गया।
नहाने के पहले एकाध गाना वह जरूर गाता। अक्सर बाल्टी को ढोलक बना लेता। उसने राग अलापना शुरू किया, एक गाना पूरा किया एवं मग से पानी सर पर डाल ही रहा था कि उसे लगा पानी बहुत ठंडा है। मार्च का महीना आधा ही बीता था, ठण्ड अभी गई नहीं थी। वह हल्का-सा सिहर उठा, उसने एक गाना और गाया। गाते-गाते उसे फिर बाॅस की तीखी नजरों का स्मरण हो आया। उसने सारे साहस को इकट्ठा किया एवं पलक झपकते सारी बाल्टी एक श्वास में सर पर उँड़ेल दी। हाथों से बदन को रगड़ा व उठ खड़ा हुआ। छाँटा लागा नीर का, पाप गया शरीर का।
उसे याद आया, टाॅवल तो वह बाहर ही भूल आया था। उसने आधा दरवाजा खोला और आवाज लगाने ही वाला था कि देखकर हैरान रह गया, कविता बाहर टाॅवल लिये खड़ी थी। उसके होठों पर एक अजीब सी रहस्य भरी मुस्कान थी मानो कह रही हो, तुम्हारी आदतों को मुझसे अधिक कौन जान सकता है। वह उस मुस्कुराहट का अर्थ ठीक से नहीं समझ सका, झेंपकर सर खुजाने लगा।
टाॅवल लेते हुए उसने पत्नी की कलाइयों पर पहनी लाल चूड़ियों को देखा। ओह, वह कितनी गोरी कलाइयाँ थी। उसके हाथ कितने कोमल एवं अंगुलियाँ कितनी सुन्दर थी। पतली-पतली लम्बी अंगुलियाँ, अंगुलियों के आगे नखों पर लगी हल्की गुलाबी नेल पाॅलिश।
उसने एक बार फिर ऊपर से नीचे तक उसे देखा। सचमुच वह बहुत भाग्यशाली था। कविता नख-शिख तक खूबसूरत थी। कितनी कमसिन, कितनी आज्ञाकारिणी जैसे कोई सहमी हुई हिरणी हो। उसने अपने आप पर असहज नियंत्रण किया। बाथरूम बंद करते वक्त उसने मन ही मन सोचा, औरत पर रोब रखना जरूरी है। सरचढ़ी औरतें घर खा जाती हैं। उसे दोस्तों की सीख फिर याद आई।
शादी के पहले सारे कार्य वह खुद करता था, इसी घर में अकेला रहता था पर ब्याह होने के बाद हर काम में उसके अधीन हो गया।
उसे हुक्म चलाने में आनन्द आता था एवं कविता को हुक्म मानने में। पुरुष आकाश तत्त्व एवं स्त्री धरती तत्त्व से परिपूर्ण होती है। इसी कारण पुरुष की महत्त्वांकांक्षा एवं स्वाभिमान आकाश छूना चाहता है जबकि स्त्री सहिष्णुता की पराकाष्ठा को छूकर ही सर्वांश में स्त्री बनती है। दोनों का आकर्षण उनके व्यक्तित्व के परम विरोधाभास पर ही टिका है। पुरुष का आकाश तत्त्व जब अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करता है तो वह अभिमानी हो जाता है, स्त्री का धरती तत्त्व अतिक्रमण करता है तो वह हठी हो जाती है।
कविता मात्र बाईस वर्ष की थी। उससे कम शिक्षित थी पर उसने कहीं अधिक व्यवहारपटु थी। वह एम.काॅम था एवं कविता मात्र सीनियर सैकण्डरी, पर वह अच्छी तरह जानती थी पुरुष को कैसे बाँध कर रखा जाता है। दरअसल कई बार उसके बचपने एवं बेवकूफी पर उसे प्यार आता तो कई बार दया भी आती थी। वह कई बार उसे बेमतलब डाँट देता, ताने भी देता तो कई बार बंदर घुड़की पिलाता पर अंत में हर बार खीज उठता था। कविता की सहज मुस्कान उसे मजाक उड़ाती हुई-सी लगती। वह हैरान होकर सोचता, भगवान ने औरत को न जाने किस मिट्टी से बनाया है।
वह ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगा। तुरन्त कपड़े पहने, शर्ट पहनते हुए उसे पता चला कि सबसे ऊपर का बटन गायब है। उसे घुड़घुड़ करने का एक और मौका मिल गया। ‘‘कम से कम शर्ट के बटन तो देख लिया करो?’’ वह चिल्लाकर बोला।
कविता ने चुपचाप सुना एवं आकर बटन टाँकने लगी। पत्नी की सहिष्णुता उसकी वाचालता एवं उद्दण्डता को ऐसी शिकस्त देती जैसे कोई मँजा हुआ कुश्तीबाज किसी बड़बोले पहलवान को भरे अखाड़े में पटखनी देता है। वह खिसिया कर रह जाता। उसका अहंकार उसे फिर फिर उद्दण्ड बनाता, पत्नी का धैर्य हर बार एक मूक शिकस्त देता।
बटन टाँकते हुए उसकी नाजुक अंगुलियाँ उसकी छाती से छूने लगी। वह एक अजीब से रोमांच में भर गया। उसका क्रेाध कपूर की तरह उड़ गया।
वह निर्लिप्त अपना काम किये जा रही थी। उसके घने काले बाल मेघों की तरह उड़ रहे थे, क्षण भर के लिए वह चातक बन गया। जी में आया इसे सीने से लगा लूँ, वह थोड़ा करीब आया तो छाती में सूई चुभ गई। उसने उसे फिर लताड़ा, ‘‘देखकर काम नहीं कर सकती क्या? क्या बटन टाँकना भी घर वालों ने नहीं सिखाया? थोड़े दिन पीहर जाकर मम्मी से काम सीखकर आओ।’’ उसे फिर दोस्तों की हिदायत याद आई। कविता अब भी चुप रही, वह और खीज गया। उसने घड़ी की ओर देखा, पौने दस बजे थे। अब कहने-सुनने का समय नहीं बचा था फिर भी उसने जाते-जाते एक तीर डाल ही दिया, ‘‘तुम्हारी वजह से रोज लेट हो जाता हूँ? पहले हमेशा समय पर पहुँचता था।’’ उसे पूरा विश्वास था वह इस बार भी चुप रहेगी पर इस बार उल्टा हुआ।
‘‘तो मैं कुछ रोज पीहर चली जाती हूँ। पापा का कल ही दो बार फोन आया है। मेरे जाने से आपकी परेशानियाँ भी कम हो जाएगी। जब देखो डाँटते रहते हो? मैं क्या पशु हूँ?’’ वह तमक कर बोली। उसके धैर्य का बाँध अब रिसने लगा था।
वह अन्दर तक सिहर उठा पर मुँह पर कृत्रिम रोब बनाते हुए बोला, ‘‘कब जाना है? मैं कोई तुम्हारे भरोसे बैठा हूँ?’’
‘‘जब आप छोड़कर आ जाएँ।’’
‘‘मुझे वहाँ जाने का समय नहीं है, मेरे पास एक भी छुट्टी नहीं है। सारी दुनिया की औरतें अकेले जाती हैं, तुम कोई तीन लोक से न्यारी नहीं हो।’’ उसे मालूम था वह झूठ बोल रहा है।
बात यहीं रुक गई। घर में कुछ पल के लिए निस्तब्धता छा गई। उसने कपड़े पहने तब तक नाश्ता टेबल पर लगा था। उसने आनन-फानन नाश्ता किया, जूते पहने एवं अपना ब्रीफकेस सम्भाला। गेट पर जाने से पहले कविता ने उसे टिफिन दिया। काम की आपाधापी में उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें उभर आई थी। इन श्रमकणों एवं रुसवाई ने उसके रूप को और निखार दिया। उसने सोचा, आज अवकाश लेकर घण्टों रूठी रानी को मनाऊँ। रूठी हुई औरत कितनी कमसिन लगती है। गुलाबी मोहब्बत के यह दिन न जाने फिर कब आए। फिर उसके दिमाग में एक बिजली कौंधी, उसने तुरन्त ऑफिस की राह ली।
रात वह न जाने फिर किस बात पर अड़ गया। अमचूर की तरह अकड़ कर पलंग पर लेटा रहा।
कविता चुपके से उसके पास आई एवं उसकी छाती पर सर रखकर लेट गई। उसके मदमस्त रूप एवं गदराये बदन ने उसे बेसुध कर दिया। ‘‘तुम नहीं चलोगे तो मैं भी वहाँ नहीं जाऊंगी। मुझे छोड़कर आना एवं लेने के लिए भी आना, नहीं तो मैं नाराज हो जाऊंगी।’’ कविता ने उसके बालों में अंगुलियाँ घुमाते हुए कहा। ‘‘अच्छा देखूंगा!’’ समय देखकर उसने अपनी अकड़ को कम किया।
पत्नी की चमकती आँखें, नशीली चितवन एवं दमकते कपोलों ने उसकी रोमांचित देह में तुरीय तत्त्व जगा दिया। प्रेम-सूर्य के उदय होने से उद्दण्ड अँधेरा कैसे भाग खड़ा होता है। उसने उसे कठोर आलिंगनपाश में समेट लिया। उफ, उस आलिंगन में कैसा अथाह सुख था। प्रेम आप्लावित होकर विदेह हो गया।
सुबह वह अपनी बात से फिर मुकर गया। अव्वल तो उसे भेजना नहीं चाहता था, पर यह बताकर वह अपना कद भी कम नहीं करना चाहता था। उसका दिल तो मोम की तरह था जो जल्दी पिघलता एवं जल्दी ही कठोर भी हो जाता। दूसरे, उसे दोस्तों की हिदायत भी याद थी…….. औरत जो कहे उसका उल्टा करो तभी सारी उम्र गुलामी करेगी।
कविता फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने आज रात अकेले ही जाने का मानस बना लिया। काँपते होठों से उष्ण आवेशमय शब्द फूट पड़े, ‘‘अब कभी वापस नहीं आऊँगी। बात-बात पर टोकते रहते हो, मैं क्या तुम्हारी गुलाम हूँ? इतना भी नहीं समझते वहाँ अकेले जाने पर कितनी तौहीन होगी!’’
वह फिर भी नहीं माना। रात उसे ट्रेन पर अकेला ही छोड़ आया। वह जानता था स्त्री को अपने पति को डाँटने का कोई अधिकार नहीं है।
उस रात वह देर तक करवट बदलता रहा। आज उसे पहली बार लगा शादी के बाद अकेले रहना कितना कठिन है। डबल बेड पर रखे कभी एक तकिये को बगल में दबाता तो कभी दूसरे को। तमाम प्रयासों के बावजूद उसे नींद नहीं आई। झुंझलाकर वह बाहर आ गया। एक गहरी उच्छ्वास लेकर उसने आसमान की ओर देखा। आसमान में छोटी-छोटी सफेद बदलियाँ यत्र-तत्र बिखरी थी। निशिनाथ इन्हीं बदलियों से लुका-छिपी कर रहे थे। कभी बदलियाँ उन्हें अपने आगोश में ले लेती, कभी वे उनके आलिंगन को छुड़ाकर भागते नजर आते। वह इस दृश्य को और अधिक न देख सका, उसे लगा चन्द्रमा उसका मखौल उड़ा रहा है। अन्दर आकर अनमना-सा वह फिर पलंग पर लेट गया। न जाने उसे कब नींद लग गई।
दो-चार रोज में ही उसकी सारी फूंक निकल गई। घर के काम करना तो जैसे वह भूल गया था। कभी दूध उफन जाता, कभी गैस खुली रह जाती, कभी तवे पर रोटी सेकते हाथ जल जाता। कपड़े धोते वक्त वह सोटा जोर-जोर से चलाकर अपना गुस्सा निकालता। काम करते-करते ऐसी चिड़चिड़ मचती कि कई बार गाली निकल जाती-‘‘हरामजादी, प्राण पी गई। औरत के साथ रहना भी मुश्किल, उसके बिना रहना भी मुश्किल।’’ आँतें गले में आ गई।
अब उसे लगा उसने ख्वामख्वाह मुसीबत मोल ली। दोस्तों पर भी उसे बहुत गुस्सा आया, हरामजादे छड़े…….बिना मतलब उकसाते रहते हैं। अब वही मित्र उसे जानी-दुश्मन लगने लगे। उसका बस चलता तो वह एक-एक पर डण्डे बरसाता।
वासंती बयार की तरह कविता की यादें उसे छेड़ने लगी। वह कितनी महान, कितनी ऊँची है, उसका हृदय कितना विशाल है। मैं कुछ भी बोल देता पर उसने कभी प्रतिकार नहीं किया। कमल की भाँति हर वक्त खिली रहती थी जैसे स्फूर्ति व उल्लास का सोता हो। कितनी कृतज्ञ कितनी सरल! मैं अकारण ही बड़बड़ कर दिल की गर्मी निकालता रहता था।
आज ट्रंक काल की लम्बी घण्टी बजी तो उसने उड़कर रिसीवर उठाया। उधर से कविता ही बोल रही थी। ‘‘सभी तुम्हें बुला रहे हैं, तुम जरूर आना। तुम्हें मेरी कसम है।’’
वह फिर भी नहीं माना। उसे लगा अब जाने से उसकी नाक कट जाएगी। वह जरूर कहेगी, आखिर हार कर आना ही पड़ा। फिर कई दिनों तक ऐंठी-ऐंठी फिरेगी। वह जब्त कर गया।
तीन दिन बाद फिर कविता का फोन आया। आज वह बहुत प्रफुल्लित थी, उसकी आवाज में खनक थी। कह रही थी, ‘‘कल मैंने सुरेश के साथ बहुत परचेजिंग की। कितना मस्त लड़का है, हँसा-हँसा कर लोट-पोट कर दिया। हमने पानी पकौड़े भी लिये एवं रात होटल में पिज्जा भी खाया। क्या शानदार आदमी है।’’
‘‘कौन है यह सुरेश?’’ उसे लगा उसके पैरों के नीचे से किसी ने जाजम खींच ली है।
‘‘यहीं हमारे पड़ौस में रहता है। बहुत काॅपरेटिव है। आज फिर हम परचेजिंग करने जाएंगे। मुझे बहुत सामान खरीदना है।’’
उसने गुस्से में रिसीवर नीचे रख दिया। क्रोध के मारे अंग-अंग काँप रहा था। इस कबूतरी में बिल्कुल अक्ल नहीं है। चार दिन पंजे से क्या निकल गई, बहकी-बहकी फिर रही है। इतना भी नहीं जानती आदमी पहले मीठे बोलते हैं, खूब काम करते हैं और अंततः बहेलिये की तरह चिड़िया फाँस लेते हैं। वह बैचेन हो उठा। लगा जैसे किसी काँटे की झाड़ी में उलझ गया हो। कविता का लावण्य, चंचलता एवं चपलता उसे और भी भयभीत करने लगी। कलेजे पर साँप लोटने लगे। न जाने वह कौन हरामजादा सुरेश है? काश, मैं उसके साथ चला जाता। उसे लगा वह उड़कर कविता के पास पहुंच जाए।
प्रेम के साथ ही मन में ईर्ष्या भी अपना डेरा बना लेती है। रात स्वप्न में उसने कविता को दूर धुंधलके में एक व्यक्ति के साथ देखा। उसे लगा जैसे कोई उसके मर्मस्थल पर नमक छिड़क रहा हो। वह हड़बड़ा कर उठा फिर सारी रात उसे नींद नहीं आई। वह सोचने लगा स्त्री कैसी गिरह है। कितनी अगम्य कितनी दुर्बोध, विधाता भी उसकी गति को नहीं जान सकते।
उस रात वह अटैची लेकर रेलवे स्टेशन की ओर जा रहा था।
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04.12.2002
