जैसे महाजन अपने बढ़ते धन को देखकर खुश होता है, किसान अपने लहलहाते खेतों को देखकर खुश होता है, माता अपने प्रिय पुत्र को देखकर खुश होती है, नवीनजी अपने बाहर आँगन पर लगे अमरूद के पेड़ को देखकर खुश होते थे। न जाने उन्हें इस पेड़ से क्यों लगाव हो गया था। कोई पाँच साल हुए, उन्होंने नर्सरी से लाकर इसका पौधा लगाया था। बडे़ जतन से इसकी देखभाल करते थे। समय-समय पर खाद, पानी, सब कुछ मुहैया करवाते थे।
समय जाते देर नही लगती। पेड़ भी अपने कद्रदान के घर आकर ऐसा फूला-फला जैसे शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा। वर्ष-दर-वर्ष पेड़ बढ़ता गया और कुछ ही वर्षों में फलों से लद गया। शाम आंगन में आरामकुर्सी पर इस पेड़ के साये में बैठकर नवीनजी की सारी थकावट दूर हो जाती थी। बच्चा जवान होकर जब सुपुत्र हो जाता है तो माता-पिता उसके पालने में उठाई सारी पीड़ा को भूल जाते हैं। ठीक यही हाल नवीनजी का इस पेड़ को लेकर था।
नवीनजी जिनका पूरा नाम नवीनचन्द्र दत्ता है अब प्रौढ़ हो चुके हैं। सर पर कुछ-कुछ बाल ही नजर आते हैं जैसे विदा लेते यौवन के अवशेष हो, परन्तु उनका ललाट देदीप्यमान है तथा चेहरे से सौम्य एवं विद्वान नजर आते हैं। हृदय से अत्यंत दयालु है एवं उन्हें देखते ही लगता है जैसे कोई भला उपकारी आदमी हो। काॅलोनी में उनकी सबसे अच्छी मित्रता है, दरअसल उनके सहज स्वभाव के कारण लोग उनसेे अक्सर मिलने आते थे। सबके सुख-दुःख में बढ़-चढ़कर काम आते थे वो। शादी हुए कोई बीस वर्ष हो गए, एक बेटा एक बेटी है – मुकुल एवं मालती। पत्नी शालिनी समझदार एवं व्यावहारिक है पर उन्हें मूर्ख ही समझती है। उसे अच्छी तरह से मालूम है कि मेरे पतिदेव को सभी मूर्ख बनाते हैं, सभी उनकी झूठी तारीफें करते हैं एवं कलेक्टरेट में इनकी नौकरी के जरिए काम निकालते रहते हैं। उनके बच्चों का नजरिया भी अपने पिता के बारे में ऐसा ही है। नौकरी करते बीस वर्ष हो गए, अभी भी बाबू ही है। प्रमोशन के नाम पर हर बार धत्ता। प्रमोशन परिणाम के दिन हर बार मुंह लटकाये चले आते हैं, पूछने की जरूरत ही नहीं है, उनका चेहरा ही उनका दर्पण है। नवीनजी चुपचाप सह लेते हैं यह सब। उन्हें मालूम है भले एवं अच्छे इंसान के लिए इस दुनिया में वितृष्णा के अतिरिक्त कुछ नहीं है, उसकी खुशी तो उसके आत्म-संतोष में ही छिपी है।
इस बार सीजन में अमरूद के पेड़ पर बहुत फल आए। पेड़ जैसे अमरूदों से लद गया। टप-टप करके ऊपर से ढेर सारे अमरूद सुबह गिरते तो नवीनजी उन्हें धोकर कुछ घर में रखते, कुछ तुरन्त ही काॅलोनी में भिजवा देते। घर से बाहर निकलते तो लोग कह ही देते, ‘‘भई नवीनजी आपके पेड़ जैसे मीठे अमरूद तो कभी नहीं खाए’’। नवीनजी को इससे एक भीतरी खुशी मिलती थी। शायद अमरूद का पेड़ भी इसे कहीं से सुन लेता था, प्रशंसित होकर बढ़-चढ़कर फल देता। सुबह-शाम पेड़ पर न जाने कितने पक्षी, कोयल, कौवे, कबूतर, मोर आते थे एवं फल खाकर जाते थे । काॅलोनी के बच्चे तो उस पेड़ के इर्दगिर्द ही रहते थे । उन्हें तो जैसे स्वर्ग मिल गया था। उन्मत्त शैशव को और क्या चाहिए। सबको मालूम था नवीनजी कुछ नहीं कहने वाले। ऑफिस से आते-जाते इन बच्चों को देखकर नवीनजी का हृदय भीग जाता, लगता उनके जीवन से कोई एक छोटा-सा अर्थ निकल आया हो। सज्जन इंसान की यही निशानी है, मिट्टी किसी की भीगती है परन्तु तृप्ति उसको मिलती है। दुःख किसी को पहुँचता है, परन्तु पीड़ा उसके अंतस में उभरती है।
आज ऑफिस से आते हुए वे चार-पाँच लोहे के हुक लगवाकर बांस ले आए थे। घर आते ही पत्नी, बच्चों ने टोका, ‘‘ये क्या कर रहे हैं आप! क्या आपको मालूम है इससे हमें कितनी तकलीफ होती है?’’ सारे दिन बच्चे मुंडेर पर बैठे रहते हैं, पक्षी अधपके फल गिराते रहते हैं, सफाई कर कर के थक जाते हैं और आप यह बांस भी ले आए ? कुछ और भी कसर रह गई थी।’’ बडे़ सहज भाव से नवीनजी ने कहा, ‘‘भाग्यवान, बच्चों को बहुत तकलीफ होती है। अभी कल ही पड़ोसी गिरीशजी के बच्चे अमरूद तोड़ते हुए गिर गए थे। मैंने सोचा, बांस छप्पर पर रख दूं तो बच्चे छप्पर से लेकर बांस से अमरूद तोड़ लेंगे।’’ एम.ए.फर्स्ट क्लास पत्नी ने सर पीट लिया। मन-ही-मन कुढ़ी और खीज कर रह गई। एक यही बेवकूफ मिला था जगत में मेरे लिए। लेकिन नवीनजी चुप। अमरूद का पेड़ भी उनके साथ चुप खड़ा था, मानो कह रहा था कि संसार के मूर्खों में तुम अकेले नहीं हो। लेकिन दोनों दाता होने के सुख को जानते थे। धरती जैसे धन-धान्य से भरकर सब कुछ अपनी संतानों को दे दती है, वैसे ही विसर्जन के सारगर्भित सुख से नवीनजी मालामाल थे।
इस बार सीजन में इतने फल आए कि काॅलोनी के लोग तो क्या पक्षी भी निहाल हो गए। यहां तक कि गाय, बकरियाँ भी अधपके फलों को खाने के लिए आने लगी। सभी उस पेड़ को दुआ देते थे एवं इन दुआओं के मिलते अमरूद का पेड़ हर वक्त फलों से भरा मिलता था। कल्पवृक्ष हो गया था पेड़। उपकारी व्यक्ति की संपत्ति जैसे कभी खाली नहीं होती वैसे ही हालत पेड़ की थी। प्रकृति का यह गूढ़ रहस्य नवीनजी के साथ-साथ पेड़ को भी समझ में आ गया था।
शायद किसी की दुआ नवीनजी को भी लग गई। इस साल उनका वर्षों से रुका प्रमोशन हो गया। अब वे अपने महकमे में अधिकारी हो गए लेकिन प्रमोशन के साथ ही उनका स्थानान्तरण भी जोधपुर से 350 किलोमीटर दूर जयपुर हो गया। नवीनजी की वर्षों की मुराद पूरी हुई। बुढ़ापे में उन्हें ‘बाबूजी’ सुनना बहुत बुरा लगता था। सोचा कम से कम बच्चों की शादी में तो कह पाऊंगा कि मैं सरकार में अफसर हूँ । अफसर आखिर अफसर होता है। बाबू को तो सब्जीवाला भी सलाम नहीं करता । पैसा सब कुछ थोडे़ है, इज्जत भी कुछ चीज है। इंसान की मनःस्थिति के अनुकूल उसके विचार भी बन जाते हैं। चूंकि दूसरी जगह तुरंत रिपोर्ट करना था, अतः आनन-फानन सामान पैक हो गया। उन्होंने मकान मालिक को हिसाब कर चाबी पकड़वा दी, कहा, ‘‘हम सभी कल यहां से चले जाएंगे।’’ नई जगह की नई तकलीफें नवीनजी के जेहन में घूमने लगी थीं। रात बराबर सो भी नहीं पाए।
सुबह सूर्य जल्दी ही उग आया था, शायद उसे भी नवीनजी को विदाई देनी थी। अच्छे दिनों में समय जाते देर नहीं लगती। आँगन में हल्का सुनहरा प्रकाश बिखरने लगा था। अमरूद का पेड़ आँगन में यथावत् खड़ा था, पत्तियों पर ओस की बूँदें सुहावनी लग रही थी। नवीनजी ने एक-एक कर सारा सामान बाहर भिजवाया एवं घर खाली होने पर आँगन में आए। अब तक बच्चे एवं पत्नी भी बाहर जा चुकी थी। नई सरकारी गाड़ी में बैठने की सबको जल्दी थी।
अमरूद का पेड़ जैसे उन्हें विदाई देने को खड़ा था, मूक और प्रगल्भ। उसे देखते ही भाव विभोेर हो गए। कसके पकड़ लिया उसे और फफक कर रो पडे़। इस शहर को छोड़ते हुए उन्हें सर्वाधिक दुःख इस पेड़ को छोड़ने का हो रहा था, मानो कोई भाई भाई से बिछुड़ रहा हो। संभलकर उन्होंने उस पर प्यार से हाथ फेरा, जैसे उसे समझा रहे हो कि इस जीवन में कौन हमेशा साथ रहा है। हर रिश्ते की एक उम्र होती है, शायद तुम्हारा मेरा इतना ही साथ हो। नवीनजी शायद वहीं खडे़ रहते पर बाहर से बिटिया की आवाज सुनकर चौंके, ‘’पापा, काॅलोनी के सब लोग, बच्चे आपका बाहर इंतजार कर रहे हैं।’’
नवीनजी बाहर आए और आश्चर्यचकित रह गए। काॅलोनी के सभी लोगों ने उन्हें फूलों से लाद दिया। बच्चे-बूढ़े सभी उन्हें बाहर सरकारी गाड़ी तक छोड़ने आए। गाड़ी में बैठते-बैठते भी वो अमरूद का पेड़ देखना न भूले। शायद कह रहे हों, ‘‘मित्र, फिर मिलेंगे!’’
समय कितना जल्दी बीत जाता है, पता ही नहीं चलता। नये काम की आपाधापी एवं जिम्मेदारी में नवीनजी को पता ही नहीं चला कि जोधपुर छोडे़ दो वर्ष हो गए। इन्हीं दिनों ऑफिस के काम से कोर्ट की एक पेशी के सिलसिले में उन्हें जोधपुर जाना पड़ा। जोधपुर सुबह पहुँच कर उन्होंने सोचा पहले कोर्ट का काम कर लिया जाय। होटल से तैयार होकर वो सीधा कोर्ट पहुँचे। पेशी से आते आते दो बज गए। सीधे होटल पहुँचकर कमरा खाली किया एवं गाड़ी में नीचे आकर बैठ गए। ड्राइवर उनका इंतजार ही कर रहा था।
गाड़ी में जाते-जाते उन्हें पुराने घर की याद हो आई। पुरानी स्मृतियाँ कुरेदने लगी। काॅलोनी रास्ते पर ही थी, सोचा लगे हाथों सभी से मिल लें। पुरानी यादें ताजा हो आईं। अमरूद का पेड़ देखने को उनका अंतस तड़प उठा। वे सीधे अपने पुराने घर में गए और यह देखकर अचंभित हो गये कि वहां अब कोई पेड़ नहीं था। नए किरायेदार ने बताया कि पेड़ कुछ समय पूर्व गिर गया एवं उसे फिकवा दिया गया। इसी दरम्यान कोलोनी के गिरीशजी वहां आ गए एवं उन्हें दूर एक तरफ ले गए। कहने लगे ‘‘नवीनजी! क्या बताएं, आपके जाने के बाद से ही इस पेड़ के बुरे दिन आ गए। नये किरायेदार शर्माजी कड़क आदमी है, उन्होंने पेड़ पर किसी को नहीं चढ़ने दिया। बच्चे भी डर से अब मुंडेर पर नहीं जाते। पक्षियों को गुलेल से मारते रहते हैं एवं पेड़ के फल बाँटनेे का तो सवाल ही नहीं। सिवाय खुद के खाने के किसी और को फल देना तो इन्होंने सीखा ही नहीं। थोड़े ही दिनों में जैसे पेड़ को नजर लग गई। पेड़ में कीड़े लग गए। इस वर्ष कोई फल नहीं आया, थोड़े दिनों में ही पेड़ ठूँठ हो गया एवं गिर गया।’’ नवीनजी को जैसे सदमा लगा।
वे चुपचाप आकर गाड़ी में बैठ गए एवं ड्राइवर को गाड़ी चलाने को कहा। गाड़ी में आते ठण्डे झोंकों से शायद उनका मन शांत हुआ। सोचा यह प्रकृति अपने आप में कितनी पूर्ण है। जब तक फल बंट रहे थे, फल आ रहे थे। ज्योंही संचय शुरू हुआ, जैसे गंगोत्री ही कट गई। जो देना नहीं जानता उसे प्रकृति देती भी नहीं है। एक अजीब-से विषाद भरे इस ज्ञान के मर्म को सोचते-सोचते न जाने कब उनकी आँख लग गई।
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05.11.2001
