‘चाय तैयार है !’ तारा की रसोईघर से आती आवाज को सुनकर सब डाइनिंग टेबल पर हाजिर थे।
तारा का अनुशासन कठोर था, वह सिर्फ एक ही बार आवाज देती। बार-बार आवाज देना उसे जरा भी नहीं सुहाता। उसे यह भी अच्छा नहीं लगता था कि कोई यहाँ और कोई वहाँ चाय पीये। वह सबकी नौकरानी नहीं है कि यहाँ-वहाँ से कप उठाती फिरे। घर में सुबह का ही तो समय होता है जब सब मिल बैठकर बात कर सके।
केतली से टीकोजी (कपड़े एवं अस्तर का बना केटली कवर) उठाते हुए मैंने कहा, ‘अब इस टीकोजी को फेंक भी दो। जगह-जगह से फट गयी है, अब तो इसके तार भी लटकने लगे हैं।’
‘आपको आम खाने से मतलब है अथवा पेड़ गिनने से। चाय क्या टीकोजी को निचोड़ने से निकलती है ? चाय तो केतली से लेते हैं। जब देखो इस टीकोजी के पीछे पड़े रहते हो। माँ ने पूरे सात रोज मेहनत कर इस पर कसीदा किया था। कितने सुंदर बूँटे काढ़े थे। तब तो जब भी मेहमान आते, कहते थे, ‘चाय केतली में टीकोजी ढककर लाया करो। उन्हें भी तो पता लगे हमारा स्टैण्डर्ड क्या है। अब पुरानी पड़ गयी है तो कोसते रहते हो। कल को कहोगे बीवी भी पुरानी हो गयी, उसे भी बदलना पड़ेगा।’
तारा दस जमात पास थी एवं मेरी डिग्रियाँ नेमप्लेट में नहीं समाती थी फिर भी उसकी बातों के आगे मैं अनेक बार बौना महसूस करता।
मैंने मन ही मन सोचा, काश! ऐसा संभव होता अथवा समाज में प्रथा होती कि एक बीवी दस साल से अधिक नहीं रखी जायेगी। तब हर मर्द कितना खुश होता। यहां तो जो मिल गयी सो मिल गयी। एक ही कंबल जीवन भर ओढ़ो।
सुबह-सुबह तारा को नाराज करना दिन भर भारी पड़ता था। मैंने बात को सम्हाला, ‘क्या पते की बात कही है !’
पास बैठे दोनों बच्चे धीरे-धीरे मुस्कराने लगे थे। आज का आधा अखबार अभिषेक पढ़ रहा था एवं आधा अंजना। दोनों समझ गये थे नित्य की तरह पापा की आज भी ‘चाॅपी’ हुई है।
हमारा घर दो छोटे-छोटे दलों में बँटा हुआ था। मेरी तरफ बिटिया अंजना एवं माँ के साथ अभिषेक था। अभिषेक ने मुझे देखते हुए इशारे से अंगूठा उल्टाकर माँ का हौसला बुलंद किया।
यह एक मौन संवाद था। अंगूठा उल्टा करने का अर्थ था आपकी ‘चाॅप’ हुयी है यानि आप पिट गये हैं, अंगूठा सीधा दिखाने का अर्थ था, ‘वेल डन’! आप जीत गये हैं।
बिटिया फिर चुप क्यों रहती।
‘मम्मी! पापा ठीक कह रहे हैं, इतनी सुन्दर केतली पर अब फटी हुयी टीकोजी अच्छी नहीं लगती। अब तो मुझे भी बूँटे निकालने आ गये हैं। मैं आज ही नयी टीकोजी सी देती हूँ। अभिषेक के रेशम के शर्ट का बचा हुआ टुकड़ा अभी रखा होगा। अस्तर घर में मिल जायेगा। अटक जाऊँ तो आप बता देना, मम्मी! आपका हाथ तो कितना साफ है।’
तारा को यह बात जँच गयी।
‘ठीक है!यह कार्य आज दोपहर को प्रारंभ करेंगे।’ अंजना के अंतिम वाक्य ‘मम्मी! आपका हाथ कितना साफ है’ ने उसके कानों में अमृत घोल दिया था।
मैंने मन ही मन सोचा अंजना कितने तरीके से बात संभालती है।
केतली और टीकोजी दोनों तारा के पीहर से विवाह केे समय दहेज के साथ आये थे। पीहर से आयी एक-एक चीज उसे प्राणों से अधिक प्रिय थी। मुझे लगा मैंने ख्वामख्वाह पंगा लिया। दोष देखना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। फटी हुई टीकोजी पर टिप्पणी करना क्या जरूरी था ? अगर टीकोजी उठाते वक्त मैं केतली की तारीफ कर देता तो तारा का कोपभाजक नहीं बनता।
अभिषेक अखबार में सामान्य ज्ञान का काॅलम रोज पढ़ता। भूगोल उसका प्रिय विषय था। आज उसे फिर कलेवा मिल गया।
‘पापा! आपको मालूम है पृथ्वी अपने आधार बिन्दु पर कितनी झुकी हुयी है?’ अभिषेक ने चाय पीते-पीते बात का विषय बदला।
‘तकरीबन साढ़े तेबीस डिग्री !’ मैंने उत्तर दिया।
‘क्या आपको मालूम है पृथ्वी दो डिग्री और झुक जाये तो समुद्र का पानी हमारे घरों में घुस आयेगा। हम पानी में डूब जायेंगे !’
यह बात मार्के की थी। जिस पृथ्वी के एक सूक्ष्मतम अंश पर बैठकर हम इतने महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते हैं, इतनी महत्त्वाकांक्षाएँ पालते हैं, इतना अभिमान करते हैं वह कैसी अधर में लटकी है। जब हमारा आधारबिन्दु ही अधर में लटका है तो फिर हम किस बात का अहंकार भरते हैं? हमारा अस्तित्व कितना बौना है? हमारे सुख-दुख कितने अप्रासंगिक? सामान सौै बरस का और अगलेे पल की खबर नहीं। उस वृहत् सत्ता के सामने इंसान कितना क्षुद्र है ? उसका अहंकार कितना मिथ्या है ? फिर भी न जाने किसका प्रेरा हुआ यह मनुष्य इतना दंभ भरता है। क्यों फिर इस पृथ्वी पर एक मनुष्य दूसरे का शोषण करता है ? क्यों यहाँ इतने व्यभिचार होते हैं ? क्यों यहाँ इतने युद्ध होते हैं ? मनुष्य कितना मूढ़ है? सभी हवा में गाँठें लगा रहे हैं।
‘पापा! आखिर पृथ्वी टिकी किस आधार पर है ? अंतरिक्ष में पड़ी एक बाॅल की तरह पृथ्वी न जाने कब अनंत में समा जाये।’ अभिषेक का प्रश्न अत्यंत गूढ़ था।
हर पिता अपने विद्वान् पुत्र पर गर्व करता है लेकिन तभी तक जब तक वह उसके अहंकार को चुनौती न दे। मैं असहाय था। निरुत्तर था। उसके यक्ष प्रश्न ने मेरी सारी डिग्रियों को चक्रव्यूह में घेर लिया।
मैं एमए,पीएचडी,डीलिट्था। नेमप्लेट पर लिखी डिग्रियों को पढ़कर ही अनेक लोग मुझे नमस्कार कर देते परन्तु अभिषेक के इस छोटे-से प्रश्न ने मेेरे मन मस्तिष्क में ज्वार उठा दिये। दुनिया के सारे तर्क जुटाकर भी इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना कठिन था। मैं चुप रहा।
‘अरे, ये क्या जवाब देंगे, मैं बताती हूँ। पृथ्वी धर्म पर टिकी हुई है। कहते हैं एक बार हिरण्याक्ष नाम का राक्षस इसे उठाकर ले गया एवं गहरे समुद्र में छिपा दिया। तब भगवान ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध किया एवं उसके पंजे से पृथ्वी को छुड़ाकर समुद्र से ऊपर लाये। उस समय पृथ्वी उनके मुख पर रखी हुई थी। पुनः कोई राक्षस हमें परेशान नहीं करे, अतः उन्होंने इसे सही जगह पर ठहराया तत्पश्चात् इस पर अपनी आधार शक्ति का संचार किया। पृथ्वी उसी आधार पर ठहरी हुयी है।’ उत्तर देते-देते तारा ने मेरी ओर सगर्व नेत्रों से ऐसे देखा मानो कह रही हो डिग्रियां अधिक होने से आदमी बुद्धिमान नहीं होता। उत्तर देते हुये उसके पोर-पोर से आत्मविश्वास टपक रहा था।
आस्था के पास कितने सुंदर उत्तर है। तर्क सदियों से प्रश्नों की गठरी ढो रहा है। जिन्हें ईश्वर में विश्वास है उन्हें कोई संदेह नहीं, कोई अशांति नहीं। जो हर बात तर्क की कसौटी पर कसते है, उन्हें शांति कहाँ ?
‘तुम भी अजीब बात करती हो तारा! समुद्र तो पृथ्वी में ही है फिर पृथ्वी समुद्र में कैसे डूब गयी?’ मैंने प्रश्न किया।
‘तो क्या भागवत में गलत लिखा है। एक-एक बात शुकदेवजी के श्रीमुख से निकली है, गलत हो ही नहीं सकती, और यदि यह बात आपके गले नहीं उतरती तो आप सही उत्तर बता दो ना ?’
मैं खिसियाने लगा। अभिषेक ने एक बार फिर अंगूठा उल्टा किया। अंजना के पास भी इस बात का उत्तर नहीं था पर हाँ बात समेटने का तोड़ अवश्य था।
‘मम्मी! आठ बज गये हैं। नौ बजे मुझे काॅलेज पहुँचना है। आप जल्दी से नाश्ता बना दें, मैं तैयार होती हूँ।’
सभा विसर्जित हुयी। जान बची लाखों पाये।
‘मुझे भी आज ऑफिस जल्दी जाना है, मेरा भी नाश्ता लगा देना। आज नाश्ते में हलवा, पापड़ बना देना। तुम्हारे हलवे की खुशबू ही मन को तर कर देती है।’ मैंने कुर्सी से उठते हुए कहा।
मेरे पास यही अंतिम विकल्प था।
‘रहने दो, बात पिटती है तो झूठी तारीफों से मत समेटा करो।’
मैंने करुण नेत्रों से उसकी ओर देखा। उसके सगर्व चेहरे पर जीत का नशा था।
मैं मन ही मन कुढ़ने लगा। ईश्वर ने आदमी को ज्ञान एवं स्त्री को विवेक दिया है यानि रथ आदमी का एवं लगाम औरत की।
आज शाम मेरा छोटा भाई सोहन बनारस से आने वाला था। यह तथ्य मैंने अब तक गोपनीय रखा था। कल ऑफिस से निकलते समय उसका फोन आया था। तारा का मूड ठीक हो तब तो न बात करूँ।
प्रभात की सुनहरी धूप खिड़कियों एवं रोशनदानों से झांकने लगी थी। सूर्य किरणें भी लुक-छिप कर जाने कितने घरों में झांकती रहती हैं। उन्हें भी पराई पंचायती में ही लुत्फ आता है, औरत जात जो ठहरी।
तैयार होकर मैं एवं अंजना डाइनिंग टेबल पर फिर हाजिर थे। तारा रसोई में खड़ी नाश्ता लगा रही थी। हलवे की सौंधी महक मन को रससिक्त करने लगी थी। मैं अंगुलियों से डाइनिंग टेबल को हल्का-हल्का थपथपा रहा था। यकायक मुझे ध्यान आया कि अंजना के इस बार नम्बर बहुत कम आये हैं। मैंने बात छेड़ी, ‘अंजना! इस बार तुम्हारे नम्बर बहुत कम आये हैं। बोर्ड तक तो तुम्हारे अच्छे नम्बर आते थे। अब क्या हो गया ? तुम हमेशा ऋतु से अच्छे नम्बर लाती थी, इस बार वह तुमसे दस प्रतिशत अधिक नम्बर लायी है।’ ऋतु हमारे पड़ौस में रहती थी।
‘पापा! मेहनत में तो कोई कसर नहीं रखी।’ अंजना ने लम्बी सांस भरते हुए कहा।
अब तक तारा ने नाश्ता लगा दिया था। रसोई में खड़े उसने हमारी सारी बातें सुन ली। स्त्रियों के आठ कान होते हैं।
‘बोर्ड तक तो यह बच्ची थी। मैं नित्य इसे पूजा करवाकर स्कूल भेजती थी। जबसे काॅलेज जाने लगी है, आजाद पंछी हो गयी है।’ तारा नाश्ता लगाते हुए बोली।
‘तो मम्मी अब से मैं पूजा ही करूंगी, पढ़ाई नहीं।’
‘अरे, पढाई के साथ जरा-सी पूजा भी कर लो तो तुम्हारा ही फायदा होगा। ऋतु नित्य शिव मंदिर जल चढ़ाने जाती है। यह उसी का परिणाम है। समुद्र मंथन के समय देवों एवं राक्षसों ने समान श्रम किया लेकिन अमृत देवों को मिला क्योंकि वे प्रभु के आश्रित एवं दानव उनसे विमुख थे। मात्र मेहनत करने से कुछ नहीं होता।’
अंजना एवं मैं दोनों निरुत्तर थे। आस्था भरे अंतःकरण में ही विश्वास का आविर्भाव होता है। मैंने अंजना को अंगूठा उल्टा करके दिखाया। उसने माना उसकी ‘चाॅप’ हुई है।
हलुवा बहुत स्वादिष्ट बना था। बनता तो हलवा हर जगह आटा एवं घी से है, पर तारा के बनाने का तरीका कुछ अलग ही था।
‘एक बात तो कहनी पड़ेगी तारा, तुम-सा पाककला में निपुण शायद ही कोई हो !’ हलवे का स्वाद चखते ही वाचाल जिह्वा ने धन्यवाद दिया।
प्रशंसा के अमृत वचन तारा के कानों से होकर उसके हृदय में उतर गये।
‘आपकी तो बस तारीफ करने की आदत है।’ वह लजाकर बोली।
अब लोहा गरम था।
‘अरे, एक बात तो मैं बताना भूल गया। आज शाम सोहन आने वाला है।’ मैंने मौका ताड़कर दबा रहस्य खोला। सोहन से उसकी कम पटती थी। वह दिन भर जरदा खाता था। लंबा मुँह बनाकर जब-तब पिचकारियाँ छोड़ता रहता।
‘चाचा आने वाले हैं !’ अंजना चहक कर बोली।
‘तू तो ऐसे चहक रही है जैसे वर्षों से आ रहे हैं। आज कल तो सोहनजी हर चौथे दिन ऑफिस के काम से यहीं रहते हैं। पिछली बार सफेद चद्दर पर तंबाकू के छींटे लगाकर चले गये। अंजना! आज काॅलेज से आकर चद्दरें बदल देना, गहरे रंग की बिछाना।’
‘अच्छा, मम्मी !’
सभा फिर विसर्जित हुई।
मैं हाथ में अटैची लिये बाहर खड़ा था। अंजना गैरेज से गाड़ी निकाल रही थी। मुझे उसे छोड़ते हुए ऑफिस जाना था।
ऑफिस पहुँचते ही बाॅस ने कहा, ‘त्यागीजी! आज रात स्टेशनरी की फाइल लेकर आपको जयपुर जाना होगा। कल सुबह हेड ऑफिस में इंडेंट देना जरूरी है। खुद साहब का फोन आया था। आप देर रात वाली बस से निकल जाना। आप तो जानते हैं इंडेंट नहीं देने का अर्थ है पूरे वर्ष स्टेशनरी को तरसो।’
शाम तक सोहन आ चुका था। वही मुझे बस स्टैण्ड तक छोड़ने आया था। घर से निकलने के पहले तारा ने एक चम्मच दही एवं गुड़ का छोटा टुकड़ा खाने को दिया। मैं जब कभी घर से बाहर जाता, तारा यह रस्म अदा करती। अपनी-अपनी आस्था है।
बस रात ग्यारह बजे रवाना हुई। मैं ड्राइवर के पीछे दूसरी पंक्ति में दाँयी और छः नम्बर वाली सीट पर खिड़की के पास बैठा था। बस आधी से ज्यादा खाली थी। आगे की दो पंक्तियों पर तोे मैं अकेला था।
अभी बस रवाना हुए पाँच मिनट भी नहीं बीते होंगे कि ड्राइवर के केबिन से चार-पाँच आदमी बाहर निकले। उनमें से दो के हाथ में देशी ठर्रे की बोतलें थी। सभी अच्छे पीये हुए थे। शक्ल से गुण्डे लगते थे। सभी आगे की सीटों पर बैठना चाहते थे। ड्राइवर से उन्होंने पहले ही साँठ-गाँठ कर ली थी। उनमें से एक आगे बढ़ा। मेरी ओर देखकर बोला –
‘ए! उठ यहाँ से! यहाँ हम सब बैठेंगे। तू पीछे जाकर बैठजा।’
मैं इतना जल्दी हिलने वाला नहीं था।
‘मैं यहां पर बस रवाना होने से पहले बैठा हुआ हूँ। मुझे खिड़की वाली सीट पर ही बैठना है।’ मैंने साहस जुटाकर उत्तर दिया।
‘तो पीछे खिड़की वाली सीट पर जाकर बैठजा !’ उसने आँखें चढ़ाते हुए कहा।
‘आप पीछे जाकर बैठ जाइये। मेरी कमर में दर्द रहता है। ’
‘अब तक तो कमर में दर्द है, थोड़ी देर बाद दाँतों में भी दर्द हो जायेगा।’ उनमें से एक ने घूंसा तानकर कहा।
मैंने ड्राइवर को गाड़ी रोकने को कहा पर वह चुप रहा। अन्य सहयात्रियों में से भी किसी ने जुबान नहीं खोली। गुण्डों में से एक ने मुझे काॅलर पकड़कर उठाया एवं पीछे धकेल दिया। मैं अंतिम सीट पर जाकर बैठ गया। देर तक कुढ़ता रहा। अब तो बस गुण्डाराज हो गया है, कोई कानून ही नहीं है। अरे जब गुण्डे राजनीति में आ गये हैं तो कानून की रक्षा कौन करेगा ? कानून अब इनकी मुट्ठी में कैद हो गया है। मन ही मन कुढ़ते जाने कब आँख लग गयी। गुण्डे देर रात तक पीते रहे।
सुबह एक तेज धमाके के साथ मेरी नींद खुली। देखते ही देखते बस मेें चीख-पुकार मच गयी। बस किसी सामने आते ट्रक से बुरी तरह टकरा गयी थी। बस का दाँया हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका था। ड्राइवर का सर स्टीयरिंग पर लुढ़का हुआ था। उसके पीछे सीटों पर बैठे गुण्डे भी बुरी तरह आहत हुए थे।
मैं तुरन्त बस के बाहर आया। रात मेरी सीट पर आकर बैठने वाले व्यक्ति की हालत अत्यन्त गंभीर थी। शायद वह बेहोश हो गया था। उसके मुँह एवं कानों से खून बह रहा था। कुछ लोग उसे उठाकर बाहर लाये एवं नीचे लिटाया। सौभाग्य से बस में एक डाॅक्टर भी यात्रा कर रहा था। बस के फर्स्ट एड बाॅक्स से सामान निकाल कर वह सेवा-शुश्रूषा में जुट गया। बीच-बीच में वह लेटे हुए व्यक्ति की नब्ज भी देख रहा था। उसकी हालत गंभीर लग रही थी।
‘डाॅक्टर साहब! पहले इसे देख लीजिये, यह अधिक सीरियस लगता है !’ मैंने मौन तोड़ते हुए कहा।
‘ही इज डेड़। इसे देखने से कुछ नहीं होने वाला है।’ डाॅक्टर ने जवाब दिया।
मैं भीतर तक काँप गया। रात जिसे मैं यमदूत समझ रहा था वह देवदूत निकला। अगर मैं छः नम्बर पर होता तो मेरी मृत्यु निश्चित थी। संभवतः दुर्घटना के समय ड्राइवर ने स्वयं को बचाने के लिए गाड़ी को तेजी से बाँये घुमाया होगा। इसी कारण सबसे ज्यादा नुकसान भी उसी हिस्से में हुआ था।
वहाँ खड़े रहने की मुझमें अब शक्ति नहीं थी। जयपुर वहाँ से तीस किलोमीटर पर था। मैंने एक ट्रक से लिफ्ट ली एवं सीधा जयपुर पहुंच गया। पूरे दिन अनमना रहा। जैसे-तैसे काम निपटाकर दोपहर की बस पकड़ी एवं देर रात तक घर चला आया। मन इतना खराब था कि रात तारा से जिक्र तक नहीं किया। सुबह तक मैं व्यवस्थित हुआ। मुझे लगा इस घटना के बारे में नहीं बताना उचित होगा। ख्वामख्वाह सभी को तनाव होगा।
चाय पर हम सभी फिर साथ थे। केतली पर आज नयी टीकोजी लगी थी। मेरे हृदय में भी आज नये अंतर्ज्ञान का उदय हुआ था।
‘तारा कल तुम ठीक कह रही थी कि वराह भगवान पृथ्वी को समुद्र तल से लेकर ऊपर आये थे।’ मैंने दार्शनिक अंदाज में मौन तोड़ा।
‘आपको हर बात थोड़ी देर से समझ में आती है।’ वह तुनककर बोली।
आज मैंने कोई विरोध नहीं किया। अभिषेक फिर एक अर्थपूर्ण मुस्कराहट के साथ अंगूठा उल्टा कर रहा था।
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07.06.2004
