कुंजी

मेरे घर से सौ कदम दूर ठीक सामने खड़े उस बूढ़े पीपल के पेड़ को किसने लगाया, उसकी क्या उम्र है, क्या इतिहास है, किसने इसके चारों और सुंदर जड़े हुए पत्थरों का चबूतरा बनाया आदि बातें तो जितने मुंह उतनी बातों की तरह रहस्यमयी हैं पर यह भी सच है कि हमारे लिए यह पेड़ उस चौकीदार की तरह है जो चौबीस घण्टे मोहल्ले के बाहर खड़ा पहरा देता है।

बचपन से बड़े होते इस पेड़ के इर्दगिर्द होने वाली अनेक गतिविधियों का मैं चश्मदीद गवाह रहा हूँ। इस चबूतरे पर पूरे दिन कोई न कोई आता रहता है पर सूरज ढलते इस किंवदंती के चलते कि पीपल के नीचे सांझ के बाद बैठना ठीक नहीं है, यहां सन्नाटा पसर जाता है। मैं लेकिन इन बातों में बिल्कुल यकीन नहीं रखता एवं बहुधा रविवार को छोड़ घूमने भी रात्रिभोज के बाद ही जाता हूँ। रविवार मैं तड़के उठकर मॉर्निंग वॉक करता हूँ , यह मेरी वर्षों पुरानी आदत है। अन्य दिनों दुकान के कार्यों में सुबह से व्यस्त हो जाता हूँ।

मेरी इसी शहर में ऑटोपार्ट्स की दुकान है एवं ईश्वर की कृपा से अच्छी चलती है। हम इन मीन तीन जने तो हैं। मैं बीवी अतिका एवं बेटा बंटी जो अब तीसरी जमात में आ गया है। मेरी बड़ी बहन तारा वर्ष में एक-दो बार जब भी अपने ससुराल गुड़गांव से जोधपुर आती है तो अवसर मिलते ही कहती है, भाभी चांद का टुकड़ा है। अतिका है भी खूबसूरत, पैंतीस में भी कमसिन लगती है। काजल लगाकर तो और निखर जाती है। हमारे मित्र ही नहीं मोहल्ले के लोग भी हमें ‘मेड फॉर इच अदर’ जोड़ा कहते हैं। इसका कारण नैन-नक्श के अतिरिक्त हमारी अच्छी लंबाई एवं सुंदर व्यवहार भी है। मैं अतिका से तीन वर्ष बड़ा हूँ एवं हमारा विवाह हुए भी अब एक दशक से ऊपर होने को आया।

घूमना सुबह का हो या शाम का मैं वॉक पूरी कर इस पेड़ के सामने लगी बेंच पर बैठता जरूर हूँ। यहां बैठकर मुझे अद्भुत, अकल्पनीय शांति मिलती है। हवा चलने के साथ होने वाली सायं-सायं की आवाजें मुझे भयभीत करने की बजाय आनंद से भरती है। मुझे इसके पत्तों के हिलने, खड़कने पर ऐसा लगता है मानो प्रकृति पत्तों के तारों से किसी महासंगीत के सुर छेड़ रही हो।

मेरी तरह ही  इस पेड़ की दिनचर्या सूर्याेदय पूर्व से प्रारम्भ हो जाती है। इस पर न जाने कितनी तरह के पक्षी कोयल, कौए, गिद्ध, मोर आदि  सुबह-शाम आते रहते हैं, कुछ पक्षी यहां स्थायी बसेरा किए हुए हैं। यही पक्षी भोर होते से जग जाते हैं, उनकी चहचहाहट कुछ देर चलती है , फिर न जाने सब झुंड के झुंड अपना दाना-पानी ढूंढने यत्र-तत्र चले जाते हैं। दिन चढ़ते यहां औरतें पानी सींचती हैं, इनमें से कुछ पेड़ की पूजा भी करती हैं। अनेक मर्द-लुगाइयों को मैंने यहां गुप-चुप टोटके करते भी देखा है। यह टोटके अनेक प्रकार के होते हैं। कोई यहां सिंदूर चढ़ाता है तो कुछ अन्य राई-तिल आदि बिखेरकर मंत्र जाप करते हैं। कोई अन्य छोटे मटकों में लाल कपड़े आदि डालकर चले जाते हैं । यहां जाने क्या-क्या होता रहता है। मोहल्ले के एक बुजुर्ग तो इस पेड़ का स्पर्श किए बिना अन्न-पानी  तक नहीं लेते। अनेक बार मैंने औरतों को इस पेड़ की प्रदक्षिणा करते हुए भी देखा है। ये सभी औरतें तड़के नहाकर यह सब करती हैं। खुले बाल वाली ये औरतें तब उतनी ही खूबसूरत एवं ताज़ा लगती हैं जितनी ताज़ा मेरे बगीचे की ओस भीगी कलियां लगती हैं। जहां इन रूपसियों को इस समय पति के आगोश में होना चाहिए, वे यहां जाने क्या मांगने चली आती हैं ? क्या इनकी पतियों से बनती नहीं अथवा फिर इन्हें भी मेरी पत्नी अतिका की तरह मर्दों को सताने में आनंद आता है?

मैं तो कहता हूँ यह पेड़ इन औरतों का सूचना-केंद्र भी है अन्यथा अतिका को पता कैसे लगता है मोहल्ले में कौन आया, कौन गया, किसके बच्चे का ब्याह होने वाला है, किसका तलाक हो रहा है, कौन प्रेम में है एवं किसका छूट गया? उसे तो यह तक पता है मोहल्ले का मोहनदास लुच्चा है, राधेश्याम सज्जन है, किसको कौन सी बीमारी है एवं किसे इलाज लग गया है। पैंतीस की उम्र में उसका सामान्य ज्ञान किसी बुजुर्ग महिला से कम नहीं है। दो वर्ष पहले कह रही थी इन दिनों कल्लाजी की बीवी बगावत पर है। मैंने कहा क्यों तो बोली वे कभी-कभी तैश में आकर मारपीट कर देते हैं। यह तो अत्यंत रसभरी बात थी, मेरी उत्सुकता परवान चढ़ गई। मैं कुछ और जानता उसके पहले वह करवट बदल कर ऐसे सो गई मानो कह रही हो मेरे साथ ऐसा मत करना वरना् तोते उड़ा दूंगी। मैंने मन ही मन उसे ‘तू दुष्ट है’ कहा एवं चादर ओढ़कर सो गया।

मोहल्ले के इस पीपल के बारे मैं वैसे तो कोई खास नहीं जानता पर मुझसे दो घर आगे रहने वाले लोहियाजी एक बार बता रहे थे यह पेड़ कम से कम दो सौ वर्ष पुराना है। इसके तने में पड़े खड्डे एवं काले दाग इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। एक अन्य बुजुर्ग फोफलियाजी यह कहते सुने गए कि ग़दर में कुछ स्वतंत्रता सैनानियों को इसी पेड़ से लटकाकर फांसी दी गई थी। वे तो यह तक कहते हैं कि एक बार देर रात उनके पिता इस पेड़ के नीचे होकर गुजर रहे थे तो उन्होंने तलवारों की टकराहट एवं वंदे मातरम् तक की आवाज़ें सुनीं। कुछ अन्य कहते हैं फोफलियाजी बहुत बूढ़े हैं , उन्हें डिमेंशिया के दौरे पड़ते हैं, अतः कुछ भी कह देते हैं। कुल मिलाकर मोहल्ले में जितने घर हैं, उतनी ही इस पेड़ को लेकर कहानियां हैं।

नित्य की तरह आज भी मैं डिनर के बाद घूम कर  पीपल के सामने लगी पत्थर की बेंच पर बैठ गया हूँ। अभी नौ बजे हैं एवं मेरे ठीक ऊपर आसमान में चांद यूं चमक रहा है जैसे वह भी डिनर कर मेरी तरह घूमने निकला हो। यूँ एकांत में बैठ  मैं दिनभर के क्रियाकलापों का लेखा-जोखा कर लेता हूँ। अतिका कहती है मैं सोचते हुए अनेक बार बड़बड़ाता हूँ। वस्तुतः मैं ऐसा नहीं करता, जो बात उसे नहीं कह पाता अनायास मुंह से निकल जाती है। ऐसी बातों में प्रिय-अप्रिय सभी तरह की बातें होती हैं। प्रिय बातें तो वह पेट में ऐसे उतारती है जैसे बच्चा मिठाई हलक से नीचे उतारता है लेकिन अप्रिय बातें सुनकर एक का इक्कीस सुनाती है। उसकी खोपड़ी ब्रह्माजी ने खास तरह से गढ़ी लगती है। तब मैं अपना-सा मुंह लेकर इस पेड़ की शरण मे आ जाता हूँ। यह भी सम्भव है मैं यहां भी बड़बड़ करता हूंगा पर पीपल मुझे कभी कुछ नहीं कहता वरन् कई बार तो खोपड़ी गरम होने पर ठंडी हवा देकर राहत देता है। इसीलिए तो इस पेड़ से मेरा अज़ीब या अन्य तरह से कहूं तो रूहानी नाता है। मैं इसके सामने उतना ही खुला हूँ जितना एक सच्चा दोस्त दूसरे दोस्त के प्रति होता है। मेरे विचारों के वस्त्र इसके आगे वैसे ही उतरते हैं, जैसे प्रणयातुर पुरुष अपनी प्रेयसियों के आगे सब कुछ उतार देते हैं। उन्हें शर्म आए तो मुझे आए।

अनेक बार मुझे लगता है यह पेड़ वह सब जानता है जो मैं सोचता हूँ यहां तक कि वह बात भी कि एक बार मैं एवं पड़ौसी दुकानदार बत्रा बियर पीकर नचनिया के यहां नाच देखने गए थे। वहां दो पैग और चढ़ाए तो हमारी हरकतें हर सीमा को लांघ गई। ये बात बड़बड़ाहट में भी मेरे मुंह से कभी नहीं निकली, अतिका को पता चलता तो फाड़ खाती। उस रात लौटते हुए दो घड़ी इसी बेंच पर सुस्ताने बैठा था,  तब जाने क्यों लगा यह पेड़ मुस्कुरा रहा है। असहज मेरी आँखें नीची हो गई, मैं उठा एवं सीधा घर चला आया।

यहां आकर इस तरह बैठते हुए मुझे वर्षों हो गए हैं। मैं आज फिर डिनर के बाद बेंच पर आकर बैठ गया हूँ। पूनम होने से आज पूरा पेड़ चांदनी में नहाया है। मेरे दिमाग में फिर विचारों का खमीर उठने लगा है। मैंने चुप आंखें बंद कर ली हैं। आज जाने क्यों मेरा ध्यान उस जमीन पर चला गया है जिसे दो वर्ष पूर्व मैंने अपनी गाढ़ी बचत से खरीदी थी एवं जिस पर खरीदने के छः माह बाद ही शेरसिंह नाम के एक गुंडे ने कब्जा कर लिया था। वह जाने कहाँ से हुबहू डुप्लीकेट पेपर्स बना लाया। वह मुझसे कुछ पैसे ऐंठना चाहता है। मैं उसके मंसूबे जानता हूँ।  उससे झगड़ा करना मेरे बस की बात नहीं है। केस कोर्ट में चल रहा है, चार पेशी हो आया हूँ। जाने कब फैसला होगा ? बूढ़ा बलद सरके तो केस सरके। यह दुःख अनेक बार केंकड़े की तरह मुझे जकड़ लेता है। मुझे इसका दूर तक समाधान नहीं दिखता। अतिका कहती है शेरसिंह को तुम भी आंख दिखाओ, एक-दो बार मर्दानगी दिखाओगे, तब कोई समाधान की आशा बनेगी। बिना दबाव यह खाली करने वाला नहीं। टेढ़ी अंगुली से घी निकलता है। यूँ शेखचिल्ली की तरह सोचने से ज़मीन मिल जाएगी क्या ? अतिका का बस चले तो मेरा खून कर दे। मुझे लेकिन पता है उसे आंख दिखाना जान जोखिम में डालना है। तब वह यह कहकर ताना मारती है, सभी मर्द घर में शेर बनते हैं, बाहर मिट्टी के ढेले हैं।

ओह, मैं भी जाने क्या-क्या सोच लेता हूँ। अतिका की देगची में उबलने वाली खिचड़ी की तरह मेरे भीतर भी असंख्य बुदबुदे उठते रहते हैं। विचारों के इसी उधेड़बुन से बाहर आकर आंखें खोलीं तो आज मेरा ध्यान पेड़ पर लिपटे मन्नत के धागों पर गया। वैसे तो ये धागे मैं पहले भी देख चुका हूँ पर कई बार जैसे हम देखकर भी नहीं देखते वही स्थिति मेरी इन धागों को लेकर हैं। हम बहुधा हमारे विचारों से मेल खाती वस्तुओं को ही देख पाते हैं।

मौली के इन धागों से पेड़ अट गया था। जगत में क्या इतना दुःख है ? संसार क्या इतना रुग्ण एवं खंडित है ?  क्या सबके दुःख मेरी तरह असाध्य हैं ? अवश्य बांधने वालों ने ये मन्नतें तब बांधी होंगी जब वे इन दुःखों का समाधान नहीं ढूंढ सके होंगे। ऊपर से नीचे बंधे इन धागों को अब मैं गौर से देखने लगा था। इन्हें देखते-देखते विचारों के एक तेज पुंज ने मुझे आवृत कर लिया। मैं बेतरतीब एक विचित्र सोच में उलझ गया। सबसे ऊपर बंधे धागे में जाने कौन सा दुःख होगा? उसके नीचे, उसके भी नीचे, बीच वाले एवं सबसे नीचे बंधे धागे में भी कोई गहरा दुःख तो होगा? क्या यह पेड़ इन दुःखों का समाधान कर सकता है? क्या मैं इनमें से किसी का दुःख दूर कर सकता हूँ ? हम तो हमारे दुःख इस पेड़ के आगे खोल देते हैं , पेड़ बेचारा कहाँ बयाँ करता होगा? क्या इसके भी कोई मित्र हैं अथवा ऐसा तो नहीं यह किसी पर विश्वास नहीं करता ? करता भी है तो किस जुबान से बतियाता है ? ये भी हो सकता है, इसे  मेरी तरह खुलना नहीं आता। बूढ़े बात पचाने में माहिर होते हैं , यह भी तो बूढ़ा है। ऐसा सोचते हुए जाने क्यों मैंने पहली बार पेड़ की ओर वितृष्णा से देखा। मैं मानो उसे कह रहा था , “विश्वास करना सीखो विश्वास से पर्वत हिलते हैं। यह छोटी सी बात तुम्हें क्या मैं समझाऊंगा ? मित्रता क्या एकतरफा होती है ?” भावावेश जाने मैं क्या-क्या सोचता चला गया ? ऐसा नाराज तो मैं पहले कभी नहीं हुआ था।

यकायक पेड़ की सायं- सायं तेज हुई एवं फिर एकदम रुक गई। हम दोनों के बीच मानो सन्नाटा पसर गया। यह सन्नाटा अन्य दिनों से गहरा एवं इतना रहस्यमयी था कि मैं कुर्सी से चिपक गया। तभी पेड़ से आवाज़ आई , “मित्र ! आज तुम्हें यह क्या हो गया? तुमने यह क्योंकर सोच लिया कि मैं तुम पर विश्वास नहीं करता? संदेह के किस सर्प ने आज तुम्हें जकड़ लिया है ? मित्रों के मध्य संदेह कालकूट से अधिक भयानक होता है। ऐसी बेरुखी पहले तो नहीं देखी। सच तो यह है मैं तुमसे बेइंतहा मोहब्बत करता हूँ। एक तुम्हीं तो हो जो मेरे आगे सच्चे मन से जी हल्का करते हो। मैं आज तुम्हारी हर बात का उत्तर दूंगा। प्रिय सखे ! बताओ तुम क्या जानना चाहते हो ?” उत्तर सुनते हुए मुझे लगा पेड़ का गला रुंध गया है।

मैं सहम गया लेकिन आश्वस्त था पीपल मेरा कुछ नहीं बिगाड़ेगा। मैं समझ गया वह मुझे उतना ही प्रेम करता है जितना मैं उसे करता हूँ। संयत होकर बोला,  “अच्छा यह बताओ , सबसे ऊपर वाला धागा किसने बांधा है एवं उसे क्या दुःख है ?” मेरा प्रश्न सुनकर पेड़ कुछ पल मौन हो गया। अब वह गंभीर हो चला था।

“मैं तुम्हें सब कुछ बताऊंगा पर तुम वादा करो यह रहस्य कि मैं बोलता  हूं किसी को नहीं बताओगे अन्यथा लोग किसके आगे आकर अपने दुखड़े बताएंगे ? उनके अपने तो सुनते नहीं। यह भी सम्भव है आगे से वे हम पर विश्वास करना बंद कर दें। तुम्हारे जैसे सच्चे मित्र हमें फिर कैसे मिलेंगे ?” पहले से गम्भीर पेड़ की गम्भीरता अब और बढ़ गई थी।

“मैं वादा करता हूँ मित्र ! मेरे प्रश्न का अब उत्तर भी तो दो।” हम दोनों अब तक सहज हो गए थे।

“सबसे ऊपर वाला धागा तुम्हारे आगे वाले मोहल्ले की एक लड़की गीता ने दो माह पूर्व बांधा है। वह रामू चमार की बेटी है। उसे किसी से प्रेम हो गया है जो ब्राह्मण जाति से है। लड़की के पिता तो मान गए हैं पर लड़के का बाप अड़ा है। कहता है प्राण चले जाएं पर यह विवाह न होने दूंगा , बिरादरी में नाक कट जाएगी। उसका लड़का भी अड़ा है पर उसमें पिता से विद्रोह करने का साहस नहीं है। लड़की इस बात को ताड़ गई है एवं इसी समस्या से निजात पाने के लिए यह मन्नत बांध गई है। कभी-कभी मुझे यह जानकर आश्चर्य होता है हम सभी एक परमात्मा की रचना है, सबका पिता एक है फिर क्या धर्म और क्या जात-पांत? मनुष्य इतना प्रबुद्ध, चेतनशील होते हुए भी इस जरा-सी बात को क्योंकर नहीं समझता ?” इस बार बोलते हुए पेड़ के गाम्भीर्य में भावुकता एवं दर्शन दोनों घुल गए थे।

“आप ठीक कहते हैं। यह छोटी-सी बात लोग समझ जाए तो उन्हें असंख्य समस्याओं से छुटकारा मिल जाए। देश आजाद हुए दशकों बीत गए पर लोगों की मानसिकता में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। समय बदला है पर समझ अब भी दकियानूसी है |” उत्तर देते हुए मेरी नज़र सबसे नीचे वाले धागे पर गई।

“यह सबसे नीचे वाली मन्नत किस की है ? क्या वह भी किसी कठोर दुःख से ग्रसित है ?” प्रश्न करते हुए जिज्ञासा मेरी आँखों में सिमट गई।

“यह मन्नत गीता से कुछ आगे रहने वाली अरुणा की है। उसका पिता एक प्राइवेट कम्पनी में चपरासी है , चादर इतनी छोटी है कि मुंह ढकता है तो पैर निकल आते हैं। जस-तस गृहस्थी धकियाता है। अरुणा लेकिन उसकी गुदड़ी का लाल है। तमाम अभावों के मध्य पढ़ाई में अव्वल है। वह सीए बनना चाहती है। इसकी प्रवेश परीक्षा के लिए उसे कोचिंग की जरूरत है। परीक्षा हेतु भी फीस की व्यवस्था करनी होगी। यह रकम लगभग पचास हज़ार बनती है। तमाम प्रयासों के बावजूद अरुणा का पिता यह व्यवस्था नहीं कर पाया है। मजबूर उसने अरुणा को परीक्षा न देने को कहा है, पर अरुणा अडिग है। इसी कशमकश के चलते वह मन्नत बांध गई है।” पेड़ ने मुझ पर विश्वास कर दूसरी व्यथा भी बता दी।

“ओह ! यह कैसी विडंबना है कुछ लोग बच्चों को पढ़ाने के लिए लाखों खर्च करने को तैयार हैं पर वे पढ़ते नहीं और कुछ के बच्चे प्रतिभावान होते हुए भी यूँ लाचार हैं ? मजबूरियों की गर्द में लिपटे यह नगीने बिना तराशे ही जमींदोज हो जाते हैं।” उत्तर देते हुए पेड़ के साथ मैं भी भावुक हो गया। इसी बीच मेरी नज़र बीच वाले धागे पर गई। इस धागे का रंग पहले दो धागों से भी अधिक गहरा था। मैंने पेड़ से इस धागे का दुःख भी बताने को कहा।

“यह धागा तुम्हारे घर से पांचवे घर में रहने वाले मोहनदास की बीवी सैणी बांधकर गई है। इनके तीन बच्चे हैं। सैणी को शक है कि उसके पति के ऑफिस में कार्य करने वाली एक महिला से सम्बन्ध है। मोहनदास उस पर तो खूब खर्च करता है, पर परिवार की सामान्य जरूरतों के लिए भी हाथ खींच लेता है। इस भीषण आर्थिक-मनोवैज्ञानिक व्यथा के चलते सैणी यह मन्नत बांध गई है।”  उत्तर सुनते ही मैं समझ गया अतिका की सूचना सटीक थी। अब मेरा ध्यान अन्य धागों पर था। मेरी उत्सुकता परवान चढ़ गई। यहां तो पूरा आंवा बिगड़ा है। मैंने पेड़ से इन धागों के बारे में भी बताने को कहा।

“अब मैं तुम्हें किस-किस के दुःख बताऊं? इनमें से कोई बीमारी से ठीक न होने से पीड़ित है तो कोई धंधा ठीक से न चलने से परेशान है। कोई अपने भाइयों से दुःखी है तो कोई मित्र-रिश्तेदारों से। किसी को वाहन चाहिए तो किसी को मकान। किसी के पास दोनों है तो उसे इनसे भी बड़ा वाहन-मकान चाहिए। कोई नौकरी मांग गया है तो कोई लगी नौकरी से परेशान है। कुछ ऐसे भी हैं जो पदोन्नति न होने से पीड़ित हैं।  किसी को कोई दुःख नहीं है तो वह पड़ौसी की तरक्की से दुःखी है। वह उसकी ऐसी-तैसी करना चाहता है। एक मन्नत यह भी बंधी है कि उसका बॉस स्वर्ग सिधार जाए। कोई बच्चों की पढ़ाई को लेकर रो गया है तो कोई उनके ब्याह को लेकर। कुछ शादी न होने से दुःखी हैं तो कुछ बीवियों से त्राण चाहते हैं। दो व्यापारी प्रतिस्पर्धियों के बीमार पड़ने की तमन्ना कर गए हैं। कुछ बहुएं सास के त्रास से विकल हैं तो कुछ सासुओं ने बहुओं की सद्बुद्धि हेतु मन्नतें बांधी हैं। कोई तीर्थाटन का आकांक्षी है तो कोई विदेश-यात्रा का स्वप्न देख रहा है। मित्र ! संसार में सर्वत्र दुःख पसरा पड़ा है। इसका बयां मुश्किल है। तुम स्वयं समझ सकते हो ऐसे में मेरी क्या दशा होगी ? तुम भी क्यों चूकते हो ? तुम भी तो शेरसिंह से दुःखी हो, तुम भी मन्नत अटका जाओ। इतनों के बीच यह भी झेल लूंगा।” पेड़ की आवाज़ अब इतनी भारी थी, मानो वह फट पड़ेगा।

मैं हैरत में था पीपल को मेरी व्यथा का कैसे पता चला ? क्या वृक्ष सुनते, समझते भी हैं ? क्या वे भी इस शिद्दत से महसूस करते हैं ? क्या प्रकृति हमारे अकथ दुःख भी जान लेती है ? मेरे मन में प्रश्नों का अंबार लग गया। इन्हीं प्रश्नों में मेरी निजी व्यथा भी जुड़ गई।

“बांधने से क्या मन्नत पूरी हो जाएगी ? क्या तुम किसी का दुःख दूर भी कर सकते हो ?” इस बार प्रश्न पूछते हुए शेरसिंह मेरी आँखों के आगे आ गया।

“नहीं मित्र ! मैं किसी का दुःख दूर नहीं कर सकता। हाँ , मैं दुःख दूर होने का रहस्य अवश्य बता सकता हूँ ?” इस बार पेड़ की आवाज़ ऐसी थी, जैसे कोई धीर-गम्भीर संत हो।

“बस मुझे वह रहस्य बता दो तो समस्याओं से निजात मिले।” मैं अधीर हो गया।

“अवश्य बताऊंगा! तुम किंचित् मेरे समीप तो आओ। यह रहस्य बहुत धीरे से प्रगट करना चाहता हूँ।” पेड़ अब रुक-रुक कर इस तरह बोल रहा था मानो किसी महान रहस्य को उद्घाटित करने वाला हो।

मेरी उत्सुकता को पंख लग गए। मैं पेड़ के समीप आया एवं उसके तने से कान सटाकर खड़ा हो गया। पेड़ ने हौले से इस रहस्य का उद्घाटन भी कर दिया।

पेड़ की बात सुनकर मेरी आँखें एक अभिनव संकल्प से चमक उठी। मुझे मानो ताले की कुंजी मिल गई। ओह , ऐसा तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था।

अब मैं एवं पेड़ दोनों चुप खड़े थे। यकायक जाने क्या सोचकर मेरी मुट्ठियां तन गईं।

मैं चबूतरे से उतरकर सीधा घर आया एवं आगे कुछ दिनों में अपने संकल्प को मूर्त रूप देने का निश्चय किया। मैंने गीता के प्रेमी के पिता से सम्पर्क कर उन्हें समझाया कि आपकी जिद के चलते अनर्थ हो सकता है तो उनके औसान जाते रहे। फकत तीन-चार दिन की समझाइश में वे मान गए। सीए परीक्षा की आकांक्षी अरुणा के पिता को मैंने जब पचास हज़ार का लिफाफा दिया तो वे दंग रह गए। भावावेश उनसे कुछ बोलते नहीं बन रहा था। अरुणा की आंखों में आंसुओं की लड़ी लग गई । वे मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे घर पर कोई देवदूत आया हो। मोहनदास तो मुझसे अपना निजी रहस्य जानकर सहम गया कि उसका राज पूरी कॉलोनी जानती है। मैंने जब उसे कहा कि उसकी बीवी आत्महत्या तक कर सकती है तो उसकी जमीन सरक गई। उसने मुझे वादा किया वह आगे से ऐसा कभी नहीं करेगा। मोहनदास इतना जल्दी मान जाएगा, यह तो मेरी कल्पना से परे था। उसे समझाना टेढ़ी खीर था पर  इन दिनों जबान पर जैसे सरस्वती बैठ गई ।

पेड़ के कहे अनुसार मैंने भी यह रहस्य गोपनीय रखा कि यह सब मुझे उसी से ज्ञात हुआ है । सभी के बार-बार पूछने पर भी मैंने पेट का पानी नहीं हिलने दिया। इन दिनों इन समस्याओं को निपटाते मेरा घूमना तक छूट गया।

आज इतवार था। मौसम में एक अजीब-सी कैफ़ियत थी जो शायद ऋतुएं बदलने के संधिकाल में होती है। कई दिनों बाद आज घूमने के लिए बाहर आया तो दरवाजे पर शेरसिंह को देखकर हैरान रह गया। उसका तरबूज जैसा चेहरा पपीते की तरह लटक गया था। काली, चमकदार आंखें अब धुंधली एवं पनीली लग रही थीं। आंखों के नीचे गड्ढे पड़ गए थे। किसी अप्रत्याशित की अनहोनी से मेरा दिल धड़कने लगा। मैंने उसे भीतर आने को कहा तो वह वहीं ठिठक गया। यकायक वह रुआंसा हुआ एवं फिर स्वयं फूट पड़ा , “बाहेती साहेब ! गत दस दिनों से मुझे न नींद आती है न चैन मिलता है। न भूख लगती है न प्यास। मेरा मन इस कदर उचट गया है कि न बोल पाता हूँ न चुप रहते बनता है। रात एक अजीब स्वप्न आता है जिसमें एक पीपल अपनी टहनियों से गला जकड़ कर कहता है , दुष्ट ! उस भले आदमी का हक वापस लौटाओ अन्यथा समूल नष्ट कर दूंगा। यही स्थिति दो-चार दिन और रही तो दम टूट जाएगा। हो न हो यह आपकी ही बद्दुआ है। मनुष्य जो करता है वही तो पाता है। इस अज्ञात कोप ने मेरी आत्मा को झकझोर दिया है। मैं आपको बताने आया हूँ कि कल रात मैंने आपकी ज़मीन का कब्जा खाली कर दिया है।” ऐसा कहते हुए उसने हाथ में गोल कर रखे जाली पेपर मेरे ही सामने फाड़ डाले। इसके बाद वह पल भर भी नहीं रुका। उसकी लड़खड़ाई चाल एवं भर्राई आवाज उसकी मनोदशा बयां कर रही थी। बड़े बुजुर्ग ठीक ही कह गए हैं ज़ुल्म के पांव कच्चे होते हैं।

मैंने भीतर आकर अतिका को सारी बात बताई तो उसकी आंखें चमक उठीं। उसकी आँखों में सिमटा गौरव भाव मानो कह रहा था आज उसके आगे मिट्टी का ढेला नहीं शेर खड़ा है , शेर जो बोलते नहीं सीधे  शिकार लाकर डालते हैं। उसका दीप्त चेहरा देख मेरी छाती फूल गई।

मुझे पता है आप सभी यह जानने को उत्सुक होंगे कि पेड़ ने मुझे कौन-सा रहस्य उद्घाटित किया था ?

मैं क्यों बताऊं ?

जगत में समस्याएं हैं तो समाधान भी हैं।

ताले हैं तो कुंजियां भी हैं। अपनी कुंजी आप खुद ढूंढिए।

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05.11.2022

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