खुजली

उसकी शादी हुए दस वर्ष से ऊपर बीत गये। न जाने क्यूँ उसे अब जीवन नीरस, निरानंद लगने लगा था। कई बार तो वह कंटाल जाता।

उसे याद है जब दस वर्ष पूर्व वह अनामिका को ब्याह कर लाया था, उसे उससे सुन्दर कोई नहीं लगता था। उसकी एक-एक अदा मनभावन थी। वह उसे प्यार से अन्नु कहता था।एक बार नहीं अनेक बार अन्नु का मुख अपनी हथेलियों के बीच लेकर उसने कहा भी था, ‘अन्नु तुम कितनी सुन्दर हो !’

तब उसे उसका एक-एक अंग अनुपम लगता था। वह थी भी बहुत सुन्दर। उसकी  आँखें जिसमें लालडोरे नजर आते थे, शराब के प्यालों से कम नहीं थी। उसके कानों से लटकते इयरिंग उसके कपोलों की चमक बढ़ाते थे। उसकी उन्नत नासिका, सुन्दर दंत पंक्ति, सुराहीदार गर्दन, लंबे काले केश एवं हाथी के सूंड जैसी जंघाएं उसे मदहोश कर देती थी।

जवानी में सौन्दर्य मुँह चढ़कर बोलता है।

उन दिनों एक बार वह पाँच दिनों के लिए पीहर क्या चली गई, वह विरह बाणों से बिंध गया। उफ! उस इंतजार में कितनी कशिश थी?

तब शहर की अनाज मण्डी में उसकी एक छोटी सी दुकान थी, जहाँ वह काश्तकारों एवं ग्राहकों को तकता रहता था। अनाज से भरी बैलगाड़ी दुकान की ओर मुड़ती तो वह काश्तकार को सर आँखों पर बिठा लेता। दौड़कर लस्सी की गिलास लेकर आता। काश्तकार को मीठी-मीठी बातों से लुभाकर फांसने का प्रयास करता, ‘अजी पहले पसीना पोंछ लो, बैलों को पानी पिला लो, थोड़ा सुस्ता लो, धंधे की बात फिर कर लेंगे।’ काश्तकार के सुस्ताते ही वह लस्सी की गिलास आगे कर देता। हलक से लस्सी पेट तक उतरती तब तक वह पंछी जाल में फाँस लेता।

अधिकतर ट्रेक्टर गाड़ियाँ बड़ी-बड़ी दुकानों की ओर ही जाती लेकिन कभी कोई ट्रेक्टर उसकी ओर मुड़ता तो वह काँटे में मछली की तरह उसे फाँस लेता।

वह भी मजबूर था। उसे भी अपनी छोटी-सी गृहस्थी बसानी थी। हर इतवार को वह अन्नु को एक अच्छे रेस्टरां में ले जाता। अन्नु कहती भी, ‘क्यूँ पैसे बरबाद करते हो, पहले घर बसाओ, फिर ये स्वांग कर लेना।’ उसे यह बात बिल्कुल न सुहाती। वह एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देता। आखिर वह भी जवान था, उसे भी अपनी बीवी को ‘इम्प्रेस’ करना था।

तब वह कमाता कम था, पर अन्नु के लिए उपहारों का ढेर लगा देता। कभी साड़ी तो कभी चांदी के इयरिंग तो कभी नकली चमकते हुए हार। अपनी पत्नी को इन्हीं उपहारों में सजा हुआ देखता तो मस्त हो उठता। एक बार तो वह बहुत महंगा उपहार ले आया। अन्नु को उसने एक छोटी-सी लाल डब्बी दी एवं कहा, ‘जरा इसे खोलना तो।’ उसने डब्बी पूरी भी नहीं खोली होगी कि वह चहक पड़ा, ‘कैसा लगा ?’ ‘अरे बाबा देखने तो दो! अभी तो मैंने डब्बी भी नहीं खोली।’ डब्बी खोलने पर अन्नु ने उसमें चांदी का मंगलसूत्र देखा तो वह लगभग चीख पड़ी, ‘अरे इतनी महंगी चीज लाने की क्या जरूरत थी।’ अन्नु के मुख पर पसीने की नन्ही बूंदें उभर आयी थी। वह उसके आनन्दमिश्रित आश्चर्य को देखकर निहाल हो गया।

रोज शाम अनु इसी मंगलसूत्र को पहने उसका इंतजार करती । यह मंगलसूत्र तब घर का सबसे महंगा सामान था। 

उसकी कई बार इच्छा होती कि वह उसके लिए सोने के बुंदे लाये, सच्चे मोतियों का हार लाये, लेकिन यह सब उसकी औकात के बाहर था। तब सोना नहीं था पर स्नेह बरसता था।

वह पढ़ा लिखा था। उसने एमए तक पढ़ाई की। अन्नु भी एमए थी। काॅलेज के दिनों में वह हाॅस्टल में रहता था। दोनों साथ एक ही कक्षा में पढ़ते थे। वह उसे कनखियों से देख लेता था। अन्नु की अदाओं पर वह ऐसा फिदा हुआ कि वह उसके मन में बस गयी। बाद में माँ से कहकर उसने यहीं शादी कर ली। जिस दिन बात पक्की हुई, वह कितना खुश था। शादी के बाद वह गाँव से शहर चला आया। गाँव के आधे खेत बेचकर उसके पिता ने उसे अनाज की दुकान दिलवाई थी।

अन्नु भी तब उसका बहुत ध्यान रखती थी। वह सुबह आठ बजे स्नान कर बाहर आता तो उसका नाश्ता तैयार होता। प्रेस की हुई एक ड्रेस भी पलंग पर पड़ी मिलती। उसके काम की सभी चीजें घड़ी, रुमाल, पर्स आदि ड्रेस के साथ ही रखे होते। अन्नु उसे घर गृहस्थी के कामों में कभी नहीं उलझाती। उसे मालूम था वह अनन्त संभावनाओं से भरा हुआ है।

उसे रिझाने के लिए अन्नु तरह-तरह के शृंगार करती। दर्पण निहारते हुए वह सोचती , स्त्रियों का शृंगार तभी सफल है जब उसका पति उसको देखे, उसकी सराहना करे। जिन गुणों को पति सराहे, वही गुण है। वह सुन्दरता ही क्या, जो पिया को प्रियकर ना हो। जो रूप पति को न रिझा सके, उस रूप से तो बदरूप होना श्रेयस्कर है। 

रोज शाम वह उसकी उपहार दी हुई साड़ी पहनकर राह तकती। जब-तब छाती पर हाथ लगाकर देख लेती कि मंगलसूत्र पहना है या नहीं। आँखों में आईशेडो लगाती, बालों में गजरे जिनकी खुशबू से घर महक जाता।

दोनों एक दूसरे को वर्षगाँठ पर सर्वोत्कृष्ट उपहार देते। विवाह के बाद अन्नु की प्रथम वर्षगाँठ पर वह उधार लेकर एक खूबसूरत साड़ी लाया तो उसकी प्रथम वर्षगाँठ पर अन्नु ने दिन-रात बुनकर उसे एक खूबसूरत स्वेटर दिया।

तब उन्हें लोग ‘मेड फाॅर इच अदर’ एवं ‘बेस्ट कपल’ कहते थे। जैसे चन्द्रमा में चाँदनी एवं बादल में बिजली बसी होती है दोनों एक दूसरे के हृदय में बसे थे।

अब तक उसकी दुकान चलने लगी थी। इन्हीं दिनों वह एक सटोरिये के चक्कर में आया। वह ‘अनाज किंग’ कहलाता था। न जाने उसने उसे क्या गुरुमंत्र दिया कि उसके पौ-बारह हो गए। उसे समझ में आ गया कि दिन रात पसीना बहाने से धनी नहीं बनते, उसके अलग समीकरण है। दिन भर बैलों की पूंछ मरोड़कर पसीना बहाने वाले किसान को मिलता क्या है ? सट्टे में चाँदी है। शायद उसका प्रारब्ध एवं पूर्व पुण्याई अच्छी थी, उसने अनाज का सट्टा किया एवं उसके वारे न्यारे हो गए। इसी लाभ से उसने नया मकान बनवाया एवं गाड़ी खरीदी। शादी के दस वर्षों में ही उसने इतनी सम्पत्ति अर्जित कर ली जो पीढ़ियों तक के लिए पर्याप्त थी। 

अन्नु के रूप की आभा अब ढलने लगी थी। इन दिनों वह लापरवाह भी हो गई थी। उसकी कमर पर अब ‘टायर्स’ दिखने लगे थे। रूप शृंगार को संवारने में भी अब उसकी रुचि नजर नहीं आती थी। पूर्णता मनुष्य के उन सभी गुणों को छीन लेती है जो वह पूर्णता की दौड़ में दिखाता है। वह अक्सर किटी पार्टियों में जाती रहती। इन पार्टियों में अक्सर धनी वर्ग की महिलाएं होती जो बहुधा एक दूसरे से जलती रहती। वहां अक्सर सास, ननद, देवरानी एवं जेठानी के रिश्तों की विवेचना होती। पतियों के गुण-अवगुणों की भी व्याख्या होती। सयानी औरतें बताती उन्होंने कैसे अपनी सास को, पति को एवं अन्यों को ठीक किया है। अन्य उन्हें अपना गुरू मानती। कुछ औरतें एक-दूसरे को अलग ले जाकर सीक्रेट बातें करती। यही बातें दूसरे दिन सबको मालूम पड़ जाती। कुल मिलाकर यहाँ उन्हीं औरतों का समूह होता जिनके घर में नौकर काम करते थे एवं जिन्हें शृंगार के अतिरिक्त कुछ काम नहीं था, हालांकि उनके पति सांडों की तरह इधर-उधर मुँह मारते फिरते थे। अक्सर उनके फ्लर्टिंग एवं इनकी किटी पार्टियों का वक्त एक ही होता था। 

इन दिनों उसकी मित्र मण्डली भी बढ गयी थी। वह भी यारों का यार था। अनाप-शनाप लुटाता। मित्र अक्सर घर आते, कभी यहाँ पार्टी होती कभी वहाँ। पास में धन हो तो लोग इर्द-गिर्द मधुमक्खी की तरह मंडराने लगते हैं। धन अगर पसीना बहाकर कमाया हुआ हो तो व्यक्ति उसके महत्त्व को जानता है लेकिन धन अगर ‘इजी मनी’ के रूप में आया हो तो उसे पचाना मुश्किल हो जाता है।

इन्हीं दिनों उसके काॅलेज का एक सहपाठी विनोद अक्सर उसके घर आता। वह उसके घर से कुछ ही दूरी पर किराये के मकान में रहता था। स्थानीय काॅलेज में लेक्चरर था। सुबह तीन-चार घण्टे काॅलेज जाता, बाद में सारे दिन खाली होता। औरतों के ‘किटी पार्टीज्’ आदि-आदि व्यवस्थायें वह करता रहता। औरतें इसीलिये उससे बहुत प्रभावित  थी। बोली मोर जैसी मीठी थी ,अपनी बातों से रस घोल देता। विनोद की पत्नी तीन वर्ष पूर्व ही कैंसर रोग से मर गयी थी। तब से छड़ों की तरह इधर-उधर घूमता रहता। अन्नु उससे अत्यधिक प्रभावित थी क्योंकि जो काम पति से निवेदन कर-कर के वह नहीं करवा पाती, विनोद चट से कर देता।

इस वर्ष अन्नु किटी पार्टी की अध्यक्ष बनी। संयोग से वह भी अनाज मण्डी का अध्यक्ष इसी वर्ष बना। अब दोनों पहले से अधिक व्यस्त रहने लगे। कभी अन्नु का फोन आता तो कभी उसका। अन्नु बढ़ चढ़कर पार्टियाँ करती। उसे अब तक का सबसे अच्छा अध्यक्ष बनना था। घर में पैसे की कमी नहीं थी, बेशुमार खर्च करती।

वह भी अक्सर रात देरी से आता। कभी यहाँ बैठक तो कभी वहाँ। कभी यहाँ प्रतिवेदन देना है तो कभी वहाँ। मण्डी के बड़े-बड़े व्यापारी उसे रात बार में निमंत्रण देते। मान-मनुहार भी अच्छी होती।

वह सारी शक्ति, वह सारी बातें जिससे वे एक दूसरे को रिझाते थे, अब बेकार के कामों में खर्च होने लगी। दोनों का सारा ध्यान अपने-अपने पद को सुशोभित करने में केन्द्रीभूत हो गया। कई बार तो दोनों एक दूसरे पर चिढ़ जाते। एक रात वह देरी से आया तो दोनों में अच्छी तकरार हुई।

‘यह रोज-रोज शराब पीकर आना कब तक चलेगा ? घर में बच्चे भी हैं।’ अन्नु भौहें चढ़ाकर बोली।

‘आज के जमाने में यह सब तो करना ही पड़ता है। लोग तभी ‘रिस्पांड’ करते हैं।’ वह खीजकर बोला।

‘यही काम मैं करूँ तो ?’ अन्नु की आँखें अब लाल होने लगी थी।

आज वह भी तैश में था। अध्यक्षीय गुस्सा अधिक वजनी होता है। उसने कस कर एक थप्पड़ रसीद किया। अन्नु लगभग चीख उठी। उस रात सो भी नहीं पायी। चोट खायी हुई सर्पिणी की तरह वह क्षोभ से भर उठी।

दोनों के बीच अब घृणा की एक मोटी दीवार खिंच गई। अब न वह रूप था जिससे वह पिया को रिझाती थी न वो शृंगार जिसकी प्रशंसा सुनकर वह निहाल हो जाती थी। अब वो उपहार भी बन्द हो गये, जो दोनों धन्यवाद से भरकर एक दूसरे को दिया करते थे। दोनों के जीवन में एक गहरा रीतापन प्रवेश कर गया।

इन दिनों वह अक्सर ‘अनाज किंग’ के साथ बार में होता। दोनों देर रात शराब पीकर बतियाते रहते। वह अन्नु से बोर होने लगा था, कई बार वह उसे बासी रोटी की तरह लगती। वह आकर्षण जिस पर मुग्ध होकर वह समय पर घर पहुंच जाया करता था, अब नदारद था। न वो इंतजार था, न ही वो कशिश। दोनों के चैतन्य पर अहंकार एवं हठ की मोटी परत चढ़ गई। दोनों बात-बेबात लड़ पड़ते। समर्पण समायोजन का गुरुमंत्र है। कंबल-कंबल में गाँठ नहीं लगती।

आज वह फिर ‘अनाज किंग’ के साथ बार में बैठा था। अनाज किंग एक ऐशपरस्त, चतुर आदमी था, लोगों की नब्ज यूँ पकड़ लेता। लोगों को वह चेहरा देखकर ही पढ़ लेता। उसे उदास देखकर बोला, ‘क्या भाभी से झगड़ा हो गया है ?’ वह प्रश्न सुनकर चौंका, पर असल बात भी तो यही थी।

‘इन दिनों कुछ ज्यादा ही सर चढ़ गई है। जब-तब कुढ़ती रहती है। विवाह भी क्या व्यवस्था है ? एक ही स्त्री के साथ जीवनभर सड़ो चाहे उससे बने या न बने, चाहे वो पसंद हो या न हो !’ वह खीजकर बोला। 

‘अब तुम हमारी लाइन पर आये। तुम सही कहते हो, आदमी कैसे उम्र भर एक औरत के साथ रह सकता है ? नवीनता हर एक को चाहिए। रोज-रोज चिकन पुलाव भी मिले तो आदमी का दिल ऊब जाता है। ऐश करो ब्रदर! धन साथ लेकर कोई नहीं जाता है। सभी अपने-अपने तरीके से जीवन को भोगते हैं। बस बातें छिपाने की कला आनी चाहिये। ऐब करने को हुनर चाहिये। हमाम में सभी नंगे है। देवताओं के पास स्वर्ग में अप्सराएँ है तो मृत्युलोक में धनी एवं सत्तासीनों के पास। पृथ्वी के सुखों को भोगने के लिए हौसला एवं चतुराई चाहिये।’ 

‘हमारे देश में विकल्प ही कहाँ है? यहाँ भोगी एवं योगी दोनों कुण्ठित हैं। भोगियों के दिमाग में तूफान है एवं योगियों की लंगोटों में।’

‘तुम ठीक कहते हो दोस्त! अभी कुछ रोज पहले ही अखबार में खबर थी कि एक बुजुर्ग साधु ने एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार किया। अधिकतर साधु ‘हिपोक्रेट्स’ है। मनुष्य विषयों का अनुभव किये बिना विषयों से विलग कैसे हो सकता है? इसीलिए बंधु! जीवन को जितना एवं जितनों के साथ भोगना है, भोग लो। शरीर तुष्ट होगा तो आत्मा स्वतः शांत हो जायेगी और इसके लिये तुम्हें परेशान होने की कहाँ जरूरत है ? बंदोबस्त हम करवा देंगे। एक फोन की बात है, रूपसियों के ढेर लगा दूंगा।’

मन बावरा है। जरा-सी शह मिलने पर इन्द्रियरूपी घोड़े, बुद्धिरूपी सारथी को भ्रष्ट कर विषयरूपी लुटेरों के हाथ डाल देते हैं। बढ़ी हुई नदी जैसे अपने तटों को बहा ले जाती है, कामातुर व्यक्ति का धैर्य एवं धर्म पल भर में बह जाता है। 

सावन के दिन थे। अनाज किंग बेतरतीब हंसते हुए फोन पर उससे कह रहा था, ’सब बंदोबस्त हो गया है। सांझ होते होटल प्राइड में आ जाना।’ होटल शहर से आठ-दस किमी दूरी पर थी।आज अन्नु को भी किटी पार्टी में जाना था। अन्नु ने उसे बता दिया था कि पार्टी देर रात तक चलने वाली है। वह बेहद खुश था। उसके लिए इससे अच्छा समय और क्या हो सकता था?

होटल पहुँचते-पहुँचते बादल उमड़ने-घुमड़ने लगे थे। आज रात वह सब कुछ हुआ जो उसने पहले कभी नहीं किया।

रात दस बजे वह कमरे से बाहर निकला तो एक दृश्य देखकर उसकी सांस रुक गयी। 

उसने गौर से देखा। 

उसकी आंखें विस्मय से फैल गयी। अक्ल के तोते उड़ गये।

उसके कमरे से कुछ दूर एक अन्य कमरे से अन्नु विनोद के साथ बाहर निकल रही थी।

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31.08.2003

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