चिह्न

पचपन पूरे होने को आए, भगवान झूठ ना बुलवाए, आज भी मैं उतना ही डरता हूँ जितना बचपन में डरता था। भूत-प्रेतों का प्रसंग चल पड़े अथवा ऐसे विषयों पर चर्चा से अब भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बचपन में तो दुबक कर मां से चिपक जाता था। उस गोद में कैसा स्वर्गिक सुख था। मां के समीप जाते ही सारे भय छू-मंतर हो जाते थे। ओह! उसके सीने से लगकर कितना निर्भीक, निःशंक एवं निश्चिंत हो जाता था। अब बीवी के करीब जाता हूं तो बूढ़ी बघेरिन की तरह आंखें लाल कर कहती है, ‘कुछ शर्म करो, बच्चे जवान हो गए हैं।’ यह भी कोई तर्क हुआ। बच्चे जवान हो गए तो क्या बीवी के करीब नहीं आ सकते ? हर बार यह शंका क्यों कि मेरे मन में खोट है। क्या मेरा पिछला रिकार्ड खराब है ? माना कि जवानी में हमारी विश्वसनीयता संदिग्ध थी लेकिन अब तो बुढ़ापे की दहलीज पर आ गए, अब तो साफ-सुथरा रिकार्ड बने। आदमी मन की बात करने भी तो करीब आ सकता है। लेकिन इन औरतों को कौन समझाए, अधिक कहो तो ताने सुनो, अब मन नहीं मनके फेरो!

मुझे नहीं मालूम मैं इतना डरता क्यों हूं। मनुष्य अपनी प्रकृति समझ ले तो शायद सुधर भी जाए, लेकिन मैं तो सब कुछ समझते हुए भी रस ले-लेकर न सिर्फ डरावने सीरियल्स देखता हूं, भूत-प्रेतों की कहानियां भी आंखें गड़ाकर पढ़ता हूं। इन्हें पढ़ने में मुझे असीम आनन्द मिलता है। ये भी कोई स्वभाव हुआ,  करूं भी और डरूं भी। इतना ही नहीं मुझे यह तक याद रहता है कि कब-कब किस समय पर एवं किस चैनल पर डरावने सीरियल्स आते हैं। कल रात ऐसा ही एक सीरियल देख रहा था तो बीबी ने सर पीट लिया, कुढ़ कर बोली, ‘फिर वही सीरियल्स! रात फिर परेशान करोगे। देखो, मेरी बला से, पर जिगर भी तो रखो। करम शेर के एवं दिल चूहे का। अब चिंचियाना नहीं।’

‘तू अपना काम कर। मुझे जो अच्छा लगेगा वही करूंगा। अनाप-शनाप बके जा रही है, बोलने का होश है कि नहीं।’ सीरियल देखने से डिस्टर्ब मैं बिफर पड़ा। 

‘ठीक है, फिर मैं आज अलग कमरे में सोऊंगी। देखती हूं कैसे शेर हो।’ उसने सीधा लुहार का हथौड़ा मारा। अब मुझे नानी याद आई। मैंने तुरत पैंतरा बदला, ‘यार, तुम भी तिल का ताड़ बना देती हो। तुम्हारे होते हुए अलग क्यों सोऊं ? रंडवा हूं क्या ?’

इस बार उसने कोई उत्तर नहीं दिया, बस मुस्कुराकर चली गई। उसकी अबूझ मुस्कुराहट कितनी रहस्यमयी थी? क्या वह मेरे मन में पैठे बीज-भय को ताड़ गई अथवा आज उसके अलग इरादे थे ? मैं कई देर तक सोचता रहा। इस गूढ़ रहस्य को समझने में खोपड़ी गरमा गई। अनुत्तरित प्रश्नों की कशमकश जानलेवा होती है। हे ब्रह्मा! औरतों की बुद्धि गढ़ते समय क्या तूने अलग तरह का चूना-गारा प्रयुक्त किया था ? ये बूढ़े ब्रह्माजी भी कमाल के है, दोनों आंखें मूंदे जाने क्या-क्या रचते रहते हैं!

इस भय का अनुसंधान करूं तो मुझे इसकी जड़ें बचपन में ही नजर आती हैं । मनुष्य के सारे भय बचपन में ही जन्मते हैं, बुढ़ापे तक तो वह उन्हें बलात् ढोता है। मुझे याद है मैं जब पांचवीं जमात में था मेरे दो सहपाठी थे , एक तौफ़िक जो जात का मुसलमान एवं दूसरा पूरण शंकर दुबे जो ठेठ का पण्डित था। पूरण सर पर गांठ मारकर चोटी रखता था, अच्छा गोलमटोल एवं चटोरा था। तौफिक दुबला, लंबा एवं एक नम्बर का शैतान था। टीचर पढ़ाते तब उसकी आंखें टीचर पर एवं मन पूरण की चोटी में विचरण करता था। उसे हर समय शैतानियां सूझती। एक बार तो उसने चलती क्लास में पूरण की शिखा खींच ली। तब पण्डित जोर से चिल्लाया। उस समय संस्कृत की क्लास चल रही थी। संस्कृत के टीचर अनन्य शिखाभक्त थे, स्वयं भी शिखा रखते थे। अपने धर्म प्रतीक का यूं अपमान होते देख उन्होंने तौफ़िक को आड़े हाथों लिया। ऐसी धुनाई की कि दिन में तारे नज़र आ गए। इतना सब होते हुए भी हम तीनों में जाने क्या आकर्षण था, हम अक्सर साथ रहते, साथ खेलते एवं साथ ही लंच करते।

तौफ़िक मुझे बचपन में भूत-प्रेतों की कहानियां सुनाता था। ऐसी अनेक कहानियां उसे याद थी एवं वह नमक-मिर्च लगाकर इन्हें चटपटी बनाता। हमारे जैसे बक-ध्यानी श्रोता उसे कहां मिलते। उसका भूत-प्रेत ज्ञान इतना सघन एवं विलक्षण था कि मैं और पूरण दांतों तले अंगुली दबा लेते। एक बार तो उसने हद कर दी। मैंने जब कहा कि पापा कहते हैं, भूत-प्रेत आदि कुछ नहीं होते तो वह पेट पकड़कर हंसने लगा। थमा तो उसकी आंखों में अजीब रहस्य था, मुझे देखकर बोला, ‘तेरे पापा ने भूत-प्रेत देखे हों तो बताएं। मैंने तो खुद आंखों से देखा है, मैंने ही नहीं मेरे मम्मी-पापा ने भी उनको देखा है।’ इतना कहकर उसने गले पर चुटकी रखी, हम दोनों की ओर देखा और बोला, ‘कसम से, मैं कभी झूठ नहीं बोलता।’ इतना सुनते ही मेरा कौतुहल शिखर पर जा बैठा। मैंने उससे पूछा, ‘अच्छा बता! भूत क्या होता है, कैसा होता है ?’ पूछते-पूछते मेरी आंखें उत्कंठा से लबालब हो गई।

‘भूत बिना शरीर का होता है। बिना शरीर याने सिर्फ कंकाल। लेकिन यह कंकाल हर किसी को नहीं दिखता।’ तौफ़िक ने उत्तर दिया। 

‘फिर किसे दिखता है?’ मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई। 

‘भूत मंतर मारने से दिखता है। मेरे पापा को मंतर आता है। एक बार वे मंतर मार रहे थे तो मैंने चुपके से देख लिया।’ कहते-कहते उसने हमारी ओर ऐसे देखा जैसे कोई अनुभवी व्यक्ति नादान बच्चों को देखता है। 

मैंने डर के मारे पास खड़े पूरण का हाथ थाम लिया। पूरण भी तौफ़िक को तल्लीनता से सुन रहा था, पर उसका ज्ञान बघारना उससे सहन नहीं हुआ। पण्डितों से अन्यों का पाण्डित्य कब सहन हुआ है ? तौफ़िक की बात पकड़कर बोला, ‘भूतों के बारे में तो हर कोई जानता है, क्या तू जानता है प्रेत क्या होते हैं ? पिशाच क्या होते हैं ? डाकण और चुडैलें देखी हैं कभी ?’ कहते-कहते उसने दोनों हाथ कमर पर ऐसे रखे मानो तोफ़िक को समझा रहा हो, करेगा पण्डितों से मुकाबला ?

अल्पज्ञ मियां की आंखें नीची हो गई।

अब पूरण शेखी बघारने लगा, ‘प्रेत मरने के बाद भटकती हुई आत्माएं होती हैं । वे किसी का बुरा नहीं करती। पिशाच भटकती हुई वे आत्माएं हैं, जो लोगों को परेशान करती हैं।’

‘फिर चुडै़लें क्या होती हैं ?’ मेरी जिज्ञासा थम नहीं रही थी। 

‘चुड़ैलें रात को आकर छोटे बच्चों का खून पीती हैं।’ पूरण ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए उत्तर दिया।

मेरा खून निचुड़ गया। मैंने प्रश्न किया, ‘कितने वर्ष तक के बच्चों का?’

‘दस वर्ष तक के।’ पूरण ने पूरे आत्मविश्वास के साथ ऐसे उत्तर दिया जैसे वह इन शास्त्रों का महाज्ञाता हो।

‘अगले साल मैं ग्यारह का हो जाऊंगा।’ मैं डरते-डरते बोला।

मुझे डरते देख पण्डित का मोद आंखों में उतर आया। 

तौफ़िक एवं पूरण की बातों से मैं कई दिनों तक डरा-डरा रहा। रात अम्मा से चिपककर सोता। इन दिनों मेरी टिफिन में रखी सारी मिठाई पूरण एवं तौफ़िक चट कर जाते, मैं उफ न करता।

कुछ दिन बीतने के पश्चात् एक दोपहर फिर तौफ़िक ने अपना भूत-ज्ञान झाड़ा। पण्डित के पिछले पैंतरे उसके दिल में कांटें की तरह खटक रहे थे। वह फिराक में था। इस बार उसकी तैयारी एवं तथ्य दोनों जानदार थे। हम दोनों की ओर देखकर बोला, ‘अच्छा बताओ, झोटिंग क्या होता है ?’

मैं क्या बताता, मैं पूरण की ओर तकने लगा। यकायक आए इस अकल्पनीय प्रश्न का पूरण के पास भी कहां जवाब था!

आज वह भी अल्पज्ञ सिद्ध हुआ। उसकी आंखें आश्चर्य से फैल गई। तौफ़िक के करीब आकर बोला, ‘यार, झोटिंग के बारे में तो पहले कभी नहीं सुना।’

दो अल्पज्ञों के मध्य तौफ़िक का ज्ञान-गर्व उसकी पुतलियों में उतर आया। उत्तर देने के पूर्व वह खड़ा हुआ, अपनी निकर झाड़ी, एक ताली बजाई, फिर बोला, ‘झोटिंग के बारे में कुछ भी बोलते अथवा सुनते समय पहले निक्कर झाड़कर ताली बजा लेनी चाहिए।’ 

मैं और पूरण तुरंत खड़े हुए, दोनों ने अपनी-अपनी निकर झाड़ी फिर ताली बजाकर बैठ गए। आज मियां का दिन था। पहुंचे हुए फकीर की तरह उसने कहना प्रारंभ किया, ‘झोटिंग ठिगना एवं गहरे काले रंग का होता है। वह हरदम हंसता रहता है और हंसते-हंसते लोगों की रूह कैद कर लेता है। बस, उसकी एक ही पहचान है।’ 

‘क्या ?’ भय के मारे मैं सुन्न हो गया।

‘घुटनों के नीचे उसके पांव उल्टे होते हैं। एडियां सामने की बजाय पीछे की ओर होती हैं।’ यह लोमहर्षक वर्णन सुनकर मैं भीतर तक कांप गया। तौफ़िक ने कहना जारी रखा, ‘उससे छूटने का एक ही उपाय है।’

‘वह क्या ?’ मैंने कौतुक से पूछा।

‘मैं मंतर बताता हूं – फट-फट झोटिंग, खट-खट झोटिंग खुदा की आन, भाग यहां से नहीं तो मारूं जूता।’

तौफ़िक ने एक बार ही यह मंतर बोला था पर मेरी एकाग्रता इतनी गहन थी कि मुझे एक बार में ही मंत्र याद हो गया। पास बैठा पूरण आज तौफ़िक के हावी होने से दुःखी था, उठते-उठते उसने भी पैंतरा डाल दिया, ‘हम क्यों बोले तुम्हारे खुदा की आन। क्या हमारे यहां मंतर नहीं है!’

‘क्या और भी कोई मंतर है ?’ मैंने पूरण से पूछा।

‘रामजी की दुहाई, ओऽम् झोटिंग फूट, पण्डित आया लाठी लेकर भाग नहीं तो देगा कूट।’ 

तौफ़िक देखता रह गया। मैंने बिना किसी विवाद के दोनों मंत्र याद कर लिए। 

कई दिनों तक मुझे रात में वैसा ही झोटिंग दिखता रहा। डर के मारे मैं दोनों मंत्र पढ़ लेता। बला टले, इससे नहीं तो उससे।

बचपन और पचपन के बीच पैंतालीस वर्ष कब हवा हुए, पता ही नहीं चला। अभी कुछ रोज पहले चाचा का निधन हुआ तो चाची ने मुझे दाह संस्कार के तीसरे दिन श्मशान से उनके फूल चुनकर लाने को कहा। अकेले श्मशान जाने के नाम से मैं कांप गया विशेषतः तब जबकि फूल शाम को ही चुनने होते हैं। सुबह तो डोम दाह-संस्कार में व्यस्त होते हैं। मन में तो आया चाची को साफ मना कर दूं पर उनके कौन-सा पूत था जो उसे भेजती। बिचारी निःसंतान थी। अन्य कोई तैयार नहीं हुआ, मुझे झख मारकर जाना पड़ा।

मैं श्मशान पहुंचा तब डोम ऊकडूं बैठा एक चिता पर रोटी सेक रहा था। चिता सुबह जल चुकी थी पर अंगारों में अब भी ताप था। उसके पास ही मेरे चाचा की दो रोज पूर्व चिता जली थी। वह चिता ठण्डी थी क्योंकि नियमानुसार दाह-संस्कार के तीसरे दिन तक अर्थात् फूल चुन लेने तक उस पर अन्य मुर्दा नहीं जलाया जाता। मैं आश्चर्यचकित रह गया। डोम की बीबी, एक जवान बच्ची एवं एक अपंग लड़का भी वहीं बैठा था। मैंने विस्मय से पूछा, ‘आप चिता पर रोटी सेक लेते हैं? आपको भय नहीं लगता ?’

‘कैसा भय ! यहां रहते सारे भय भस्म हुए।’ अपनी खिचड़ी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए डोम बोले। कहते-कहते उसके कानों में पहने लकड़ी के कुण्डल हिलने लगे थे।

‘मेरा मतलब चिता जैसी अपवित्र चीज पर खाना पकाते हुए आपको बुरा नहीं लगता।’ मैंने बात बढ़ाई।

‘अरे, मनुष्य की हड्डियां भी तो लकड़ी का ही रूप है। मांस-मज्जा तो सुबह कब के जल चुके। हमारा भोजन पक गया तो उसे ही पुण्य चढ़ेगा। बिचारा स्वर्ग जाएगा। जिंदा मनुष्य तो अच्छे कार्य करते नहीं, उसके मुर्दे से ही पुण्य हो जाए तो क्या बुरा है ?’ कहते-कहते डोम अपने चिमटे से अंगारे उलटने-पुलटने लगे। 

उनके विचार सुनकर मैं दंग रह गया। जीवित जगत् के दार्शनिक चाहे जितना दर्शन झाड़ें पर अंतिम एवं असल दर्शन तो इन जोगियों (डोम) के पास ही होता है।

मैं उनके पास ही बैठ गया। हम कई देर तक इधर-उधर की बातें करते रहे। अब दिन ढलने लगा था। यहां-वहां बोलते कौओं की कांव-कांव को छोड़कर सर्वत्र शांति थी। बातों ही बातों में मैंने उसके परिवारवालों के बारे में पूछा तो उसने बताया कि पहले वे भी शहर में रहते थे। वह एवं उसकी बीवी शहर के एक रईस उद्योगपति के यहां कार्य करते थे। एक रात उद्योगपति के घर चोरी हुई, चोर सारा जेवर एवं रोकड़ चुराकर ले गए। शक में पुलिस उसके घर पर आई एवं आते ही दरवाजा बंद कर उन्हें ताबड़तोड़ पीटना प्रारंभ कर दिया। थानेदार ने मेरी बीवी एवं इस सोलह साल के बच्चे तक को नहीं छोड़ा। गुस्से में मेरे बड़े पुत्र ने, जो अभी किसी कार्य से शहर गया हुआ है, थानेदार का हाथ पकड़ लिया। थानेदार आग बबूला हो उठा, उसे जीप में डालकर थाने ले गया एवं पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। सेठ ने उसे अच्छी रकम चढ़ा रखी थी। सौभाग्य से कुछ रोज पश्चात् असली चोर पकड़े गए तो हमारी जान में जान आई। अगर असली चोर नहीं पकड़े जाते तो वो शायद मार-मार कर उसे चोर ही बना देता। इस घटना के पश्चात् मुझे जीवित समाज से घृणा हो गई, तब से मैं और मेरा परिवार यहीं श्मशान में रहते हैं।

उनकी कथा सुनकर मैं भीतर तक दहल गया। शाम गहराने लगी थी। लौटते हुए पक्षी पेड़ों पर आकर टिंव-टिंव करने लगे थे। मेरे मन में भूत-प्रेत-पिशाचों के अनेक काल्पनिक डर बचपन से ही पैठे थे। मैंने डोम से तुरन्त फूल इकट्ठा कर देने को कहा। मेरे कहने पर भी वह निःशंक अपना कार्य उसी गति से किए जा रहा था। करीब दस मिनट में रोटियां सेकने का कार्य पूरा कर वह मेरे चाचा की चिता के समीप आया एवं धीरे-धीरे अस्थियां चुनने लगा। कुछ देर में वहां छोटी-छोटी अस्थियों की ढेरी लग गई। राख के भीतर से चुनकर उसने अत्यंत कौशल से यह अस्थियां निकाल ली एवं पोटली में बांधकर मेरे हवाले की। अस्थियां हाथ में लेते-लेते मेरे आंसू बह गए। क्या मेरे चाचा मात्र इतने भर थे? क्या इतनी सी हड्डियों एवं राख भर मांस-मज्जा का मालिक, इंसान इतनी महत्त्वाकांक्षाएं पाल लेता है ? सचमुच इंसान कितना मूढ़ है। उस जीवन के लिए बदहवास दौड़ता है जो पानी के बुदबुदे की तरह क्षणभर में समाप्त हो जाता है।

यकायक मैं चौंका। अब रात होने लगी थी। मैंने पर्स से निकाल कर सौ रुपये डोम को दिए एवं तीव्र गति से चलने लगा। स्कूटर यहां से आधे कि.मी. के फासले पर था, वहां से यहां तक जमीन ऊबड़-खाबड़ होने के कारण मैं पैदल ही चला आया था।

मैं तेज गति से गंतव्य की ओर बढ़ रहा था। सर्वत्र सन्नाटे पसरे थे। पक्षियों का शोर अब तक थम चुका था। तेज हवाएं सांय-सांय करने लगी थी। श्मशान की शांति एवं चुप्पी के बारे में पढ़ा-सुना तो अनेक बार था पर अनुभव पहली बार कर रहा था। चलते-चलते मैं एक विचित्र भयावह कल्पनालोक में खो गया। तौफ़िक एवं पूरण का चेहरा एवं उनकी सुनाई कहानियां रह रहकर मेरे मस्तिष्क में नाचने लगी। मैंने कदम और तेज किए। यकायक एक दृश्य देखकर मैं सिहर उठा। सामने कुछ दूरी पर गहरे काले रंग एवं ठिगने कद का एक व्यक्ति खड़ा था। मैंने गौर से देखा। वह लंगड़ाकर चल रहा था एवं उसकी एड़ियां भी आड़ी-टेढ़ी लग रही थी। वह मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। फासले पर होने के बावजूद उसकी चमकती हुई दंतपंक्ति स्पष्ट दिख रही थी। वह धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ रहा था। कहीं वह झोटिंग तो नहीं? निश्चय ही वह झोटिंग था। आज मरण तय था। काटो तो खून नहीं। हूबहू वही हूलिया जो तौफ़िक ने वर्षों पूर्व बताया था। मेरी धड़कन बढ़ गई। क्यों चाचा के फूल लेने चला आया, अभी खुद के फूल बिखर जाएंगे, सोचते-सोचते मैं ऊपर से नीचे तक पसीने में नहा गया। झोटिंग अब मात्र दस कदम की दूरी पर था। भय के मारे मेरे हाथ-पांव कांपने लगे। मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था। यकायक मैं संभला, उल्टा मुड़ा एवं जोर से चिल्लाया, ‘डोम बाबा! मुझे बचाओ।’

आश्चर्य! डोम मेरे पीछे ही खड़े थे। मैं घबरा गया। मैंने डरते-डरते पूछा, ‘आप यहां कैसे ?’

‘मैं तुम्हारे पीछे ही था। तुम्हारे जाने के पश्चात् मुझे लगा रात हो चली है, तुम रास्ता न भटक जाओ, अतः पीछे-पीछे चला आया। लेकिन तुम इतना डरे हुए क्यों हो ?’

‘बाबा, मुझे उस झोटिंग से बचाओ। वह मुझे मार डालेगा। अब तो मुझे मंतर भी याद नहीं रहे।’ बदहवास मैं चिल्लाने लगा। 

डोम खिलखिलाकर हंस पड़े। हसंते-हंसते बोले, अरे! वह तुझे क्या मारेगा, वह तो खुद अधमरा है। वह झोटिंग नहीं है, वह तो मेरा वही बड़ा पुत्र है जिसे पुलिस ने मार-मार कर अधमरा कर दिया था। थानेदार ने गुस्से में इसकी दोनों टांगे तोड़ दी थी। मैंने मेरी क्षमताओं के अनुरूप इलाज भी करवाया पर इस अभागे के पांव ऐसे ही रह गए।’ कहते-कहते डोम ने अपना बांया हाथ मेरे कंधे पर रखकर मुझे सहारा दिया।

मेरा झोटिंग एवं उनका पुत्र अब सामने ही खड़ा था। मुझे देखकर वह कांपने लगा। उसे  कांपते  देख  उसके पिता ने समझाया ‘डरो मत! यह तो बहुत सीधे एवं सज्जन हैं।’ शायद थानेदार से पिटाई के बाद वह हर अजनबी को देखकर कांप उठता था।

क्षणभर के लिए मेरे पांव धरती से चिपक गए। साहस कर जाने लगा तो डोम मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोले, ‘जरा रुकना।’ मैं रुका तो करीब आकर कहने लगे, ‘बेटा, अब कभी मत डरना। मैं इतने समय से श्मशान में रहता हूं,, मैंने कभी भूत-प्रेत नहीं देखे। ऐसी बातें मात्र मन के कपोलकल्पित भय हैं। अगर वे हैं भी तो कभी किसी को नहीं सताते। असली भूत-प्रेत-पिशाच एवं झोटिंग तो तुम्हारे जीवित समाज में हैं जो कमजोर, बेबस एवं लाचार लोगों पर अकल्पनीय जुल्म करते हैं। हो सके तो उनसे सावधान रहना, यहां से तो तुम निश्चिन्त होकर जा सकते हो। मैं तुम्हें अभय करता हूं।’

मेरे जीवन भर के भय क्षणभर में तिरोहित हो गए।

चाचा के फूल हाथ में लिये मैं मंथर गति से स्कूटर की ओर बढ़ रहा था।

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23.12.2009

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