किसी दिवंगत व्यक्ति की तस्वीर देखकर कैसा लगता है ? और अगर वह व्यक्ति आपका अंतरंग हो तो ? इस कमरे में खड़े होकर प्रद्युम्न की तस्वीर को देखना मानो उस सम्पूर्ण इतिहास को उलटने जैसा है जिसे मैंने स्वयं न सिर्फ देखा है, अनुभूत भी किया है। अतीत के पृष्ठ एक-एक कर खुलने लगे हैं।
वह बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्ष थे। उन जमानों में केमरे आ तो गए थे पर फोटोग्राफी चुनिंदा शहरों में चंद लोगों तक ही सीमित थी। अधिकांश जगहों पर अब भी तस्वीरें बनवाने का ही प्रचलन था। ये तस्वीरें व्यक्ति की स्मृति को अनेक वर्षों तक जीवित रखती थी।
मुझे अच्छी तरह याद है, उन्हीं वर्षों में, जब प्रद्युम्न ने यह तस्वीर शहर के नामी पेंटर ईश्वरी से बनवाई थी। ईश्वरी का नाम हालांकि स्पष्ट नहीं दिखता पर तस्वीर के दायें कोने में अब भी अंकित है। तस्वीर में जगह-जगह सोने एवं चांदी के झोल से रंग भरे गए हैं। आज भी तस्वीर कितनी नेचुरल लगती है मानो साक्षात् प्रद्युम्न ही बैठा हो।
प्रद्युम्न तब तीस वर्ष का रहा होगा। तब तक उसके दो पुत्र एवं एक पुत्री भी हो चुके थे। बंद गले का सफेद कोट एवं गले में मोतियों की माला पहने वह कैसा फब रहा है। दांये हाथ को चांदी की मूठ पर कैसे रोब से रखे हुए है। रूप-रंग में भी वह कौन-सा कम था। गोरा रंग, ताव देती मूंछे, ऊँचा कद, छरहरा बदन, तीखे नक्श एवं शतरंज की गोटियों जैसी आँखें उस के रूप में चार चांद लगाती थी।
इस तस्वीर को बनाने के लिए ईश्वरी एक माह तक लगातार हर सुबह आया था। दस रोज तक तो प्रद्युम्न को भी नित्य वही ड्रेस पहनकर कुर्सी पर बैठना होता था। प्रारंभिक स्केच बनाने में ही दस दिन लग गए। उसके बीस रोज बाद तक ईश्वरी इसे पूरा करने के लिए निरंतर आता रहा। बीच-बीच में प्रद्युम्न जब इसे देखने आता, मैं भी उसके साथ होती। ईश्वरी को अनेक बार तो हमारे आने का पता ही नहीं चलता। इसे बनाते वक्त वह इसमें ऐसे डूब जाता कि उसे किसी के आने का भान तक नहीं रहता।
तस्वीर पूरी हुई तब ईश्वरी स्वयं उसे प्रद्युम्न को दिखाने बैठक में आया था। इसे देखकर प्रद्युम्न इतना खुश हुआ कि उसने मोतियों की माला उतारकर ईश्वरी को भेंट की थी। तस्वीर में प्रद्युम्न सजीव हो उठा था। उस दिन प्रद्युम्न ने मूंछे ऐंठते हुए कहा था, ‘कम से कम इसे देखकर ही मेरे बेटे-पोते मुझे याद कर लेंगे।’
अतीत अब चित्रपट की तरह मेरे सामने आ खड़ा हुआ है। प्रद्युम्न की यादें मुझसे कैसे विलग हो सकती है ? उसे मैं बचपन से जानती थी या यूं कहिए कि मेरी उसकी जीवन-यात्रा साथ-साथ चली। मैं उसकी अर्धांगिनी तो नहीं थी पर मुझसे अंतरंग उसका और कोई भी नहीं था। वह अपनी हर अच्छी-बुरी बात मुझसे अवश्य बांटता।
उसमें अनेक गुण थे जैसे कि वह अत्यंत दूरदर्शी था, कुशल व्यवसायी भी था पर एक दुर्गण जिसने चांद को दाग लगा दिया वह यह कि वह अत्यंत क्रूर एवं अहंकारी था। घमंड उसके सर चढ़कर बोलता। कई बार तो वह हिंसक पशु की तरह उग्र हो उठता। उसके अहंकार पर खरोंच लगते ही उसका निर्लज्ज व्यवहार पैशाचिक क्रूरता की सीमाओं को पार कर जाता।
बचपन से सोने के पलने में पला था। पिता शहर के प्रख्यात रईस थे। राजदरबार तक में उनकी धाक थी। माँ-बाप का इकलौता बेटा था, उसकी हर जरूरत पूरी की जाती। ताबेदार उसकी आवाज सुनकर दौड़े आते। उन जमानों में हर परिवारों में आठ-दस बच्चे होते थे। ऐसे में किसी संभ्रात परिवार में इकलौते पुत्र का होना बहुत बड़ी बात थी। ऐसी संतानों को पलकों पर रखा जाता था। जहां अन्य घरों में डंडे का शासन चलता था ऐसे दुलारे तिनके की चोट भी बर्दाश्त नहीं करते थे। शायद इसीलिए वह इतना निरंकुश हो गया।
मुझे याद है स्कूल में एक बार उसके सहपाठी से उसका झगड़ा हो गया। उसने प्रद्युम्न को कुछ गलत शब्द बोल दिये तो प्रद्युम्न उस पर बेल्ट लेकर पिल गया। लड़का लहूलुहान होकर चिल्लाने लगा तो अध्यापक दौड़े-दौड़े आए पर किसका साहस था उसे कुछ कहें ? विद्यालय उसके पिता का बनाया हुआ था। जब अध्यापक एवं प्रबंधन ही उसके पिता के रहमोकरम पर हो तो उसे कौन कहे। प्राचार्य ने पिटने वाले लड़के को और आड़े हाथों लिया। भला सूर्य को कौन आँख दिखाए ?
तस्वीर पर मेरी नजर एक बार पुनः टिक गई है। सारी बातें मानो कल की-सी लगती है। जैसे मैं उसे पुनः समझा रही हूँ , ‘प्रद्युम्न! काश, तुम जीवन का सारगर्भित अर्थ समझ पाते?’
प्रद्युम्न जितना अहंकारी था उससे कहीं अधिक हठी भी था। बचपन में अपनी हर जिद पूरी करवाता। उसे अप्रसन्न देखकर उसके मां-बाप की सांस फूल जाती। वह किसी की परवाह नहीं करता। वृद्ध मुलाज़िमों तक को झापड़ रसीद कर देता। बेचारे मार खाकर भी यही कहते, प्रद्युम्नजी, कितने चंचल हैं।
प्रद्युम्न जवान हुआ तो उसकी क्रूरता और बढ़ गई। जवानी ने उसके जुल्म सौ गुना बढ़ा दिए। वह मां-बाप को इशारे पर नचवाता। मनचाहे शब्द बोलता। कई बार तो ऐसे शब्द बोलता कि उनकी आत्मा छलनी हो जाती। ‘बुढ़िया अपनी औकात में रहा कर’ अथवा ‘बुड्ढे! मुझे उपदेश देने की कोशिश मत करना’ जैसे शब्द तो मैंने कई बार उसे मां-बाप को कहते हुए सुना है। उसके मां-बाप ने तो जैसे मान लिया था कि उनके भाग्य में संतान सुख नहीं है, ऐसे कपूत से तो निपूता होना अच्छा। लोग शिकायतें करते तो बेचारे खून के घूंट पीकर रह जाते। कपूत को कुएं में नहीं फेंका जा सकता, उसे भी निबाहना पड़ता है। कान काटने वाले आभूषण को भी कई बार लोक-लाज में पहनना पड़ जाता है।
प्रद्युम्न के पिता इलाके के प्रतिष्ठित जमींदार थे। आस-पास के गांवों में उनके बीघों खेत थे जहां खेतीहर मजदूर काम करते थे। प्रद्युम्न के तेवर देख उसे जमींदारी का काम सौंपा गया, लेकिन यहां भी वह मजदूरों पर बेपनाह जुल्म करता। वे तो उनकी नजरों में उन क्षुद्र तिनकों की तरह थे, जिन्हें वह जब चाहे फूंक से उड़ा सकता था।
प्रद्युम्न का विवाह हुआ तो वह पत्नी पर जुल्म करने लगा। उसे तो वह जूती पर रखता। ओह! वह बिचारी कितनी सुशील एवं सुंदर स्त्री थी पर प्रद्युम्न उसे भी जब चाहे प्रताड़ित करता। अनेक बार मैंने स्वयं उसे अपनी पत्नी को पीटते हुए देखा था।
मैं भी क्या करती ? जो जीवनसंगिनी की न सुने वह सहचरी की क्यों सुनता? मैंने अनेक बार उसे समझाया कि ऐसा करना उचित नहीं है, उसे धर्म एवं नीति का हवाला देती पर वह सुनता कहाँ था। मुझे तो वह ऐसे दबोच लेता जैसे शिकारी खरगोश को दबोच लेता है। प्रमाद एवं अहंकार में डूबे व्यक्तियों ने भी भला किसी की सुनी है। उसकी संगति भी ऐसे दुर्जनों की थी जो सदैव उसके अहंकार का पोषण करते। इसी के चलते वह शराबी एवं व्याभिचारी भी हो गया था। अनेक बार उसे अपने मित्रों के साथ वेश्याओं के कोठे पर जाते हुए देखा गया था।
वह दिन तो भुलाये नहीं भूलता जब वह पास ही के गांव रामपुर अपने खेतों के निरीक्षण पर गया था। वे बरसात के दिन थे। आसमान काले एवं भूरे बादलों से आच्छादित था। प्रद्युम्न उस दिन एक काले घोड़े पर सवार था। उसके साथ उसके दो-तीन मित्र भी थे जो अपने-अपने घोड़ों पर उसके साथ आए थे। उस दिन वातावरण में एक विचित्र-सी उमस थी। प्रद्युम्न ने अपना घोड़ा खेतों के आगे रोका तो कुछ मजदूर उसके समीप आए एवं गर्दन झुकाकर खड़े हो गए। वे साक्षात् दुर्भाग्य एवं दरिद्रता की परछाई लगते थे। मजदूरों को निरीह स्थिति में देखकर उसे विचित्र आनंद आता था।
एक युवक मजदूर भी वहीं थोड़ी दूर पर कार्य कर रहा था। प्रद्युम्न को देखकर वह भी वहां आ गया। वह एक मजबूत कदकाठी का साहसी ओेर स्वाभिमानी युवक था। प्रद्युम्न को देखते ही उसकी आंखें लाल एवं तेवर बगावती हो गए। वह और उसके पिता गत ढाई माह से प्रद्युम्न के खेतों में कार्य कर रहे थे, पर प्रद्युम्न ने उन्हें अब तक मजदूरी का भुगतान नहीं किया था। आज उसने साहस कर प्रद्युम्न से मजदूरी मांगी तो प्रद्युम्न की क्रूरता सर चढ़ बैठी।
दुष्टों ने दूसरों के अधिकारों को कब सराहा है ? अपने नाखून भर दर्द के लिए दूसरों पर कहर नाजिल करने वाले लोगों की संसार में कमी नहीं है।
अब तक प्रद्युम्न जो देता वही मजदूरों की नियति थी, उससे मांगने का साहस तो आज तक किसी का नहीं हुआ। एक मजदूर के कहते ही अन्य मजदूरों का साहस भी बढ़ गया। सबके साहस को बढ़ता हुआ देख प्रद्युम्न तमतमा गया। उसने क्रोध भरी आंखों से युवक की ओर ऐसे देखा मानो उसे कच्चा खा जाएगा। उसकी आंखों में सुलगते अंगारों को देख, वहीं खड़ा, युवक का पिता थर-थर कांपने लगा।
आज निश्चय ही कुछ अप्रत्याशित एवं अनिष्ट होने वाला था। युवक ने सांप के बिल में अंगुली डाल दी थी। प्रद्युम्न इतना कहां सहन करता। उस दिन उसकी पैशाचिकता शिखर पर चढ़ बैठी। पल भर में उसके इशारे पर उसके पट्ठे युवक एवं उसके बुड्ढे पिता पर टूट पड़े। वह युवक भी कम साहसी नहीं था। लट्ठ लेकर अकेला ही इन सब पर पिल पड़ा। एक समय तो ऐसा आया जब वह अकेला इन सब पर भारी पड़ रहा था।
अपना रौब जाते देख प्रद्युम्न ने जेब से तमंचा निकाला एवं देखते ही देखते बाप-बेटे दोनों पर गोलियां बरसा दी। दो दर्दनाक चीखों के साथ दोनों वहीं गिर पड़े। चारों ओर सन्नाटा छा गया। पास खड़े मजदूर भय के मारे बुत बन गए।
लहूलुहान पिता-पुत्र जमीन पर पड़े थे। मरते हुए युवक का पिता प्रद्युम्न से कह रहा था, ‘कमीने, तेरा वंश बर्बाद हो जाएगा। हमारी आहें तुम्हें कहीं का नहीं छोड़ेंगी।’ लेकिन निर्दयी प्रद्युम्न पर इसका कुछ असर नहीं हुआ। उसके साथियों ने उसके इशारे पर लाशों को उसी गांव में दफना दिया। अब किस मजदूर की जुर्रत थी कि वह आवाज ऊँची करता।
रात जब वह हवेली पर आया तो बहुत बेचैन था। उन दिनों उसकी पत्नी पीहर गयी हुई थी। मैं हमेशा की तरह उसके संग थी। मैंने पुनः उसे समझाने का प्रयास किया कि वह अपने पापों को लगाम दे, यह पाप उसे कहीं का नहीं छोड़ेंगे, इसका हिसाब उसे देना ही होगा पर हर बार की तरह उसने इस बार भी मुझे दरकिनार किया। मैं मन मसोस कर रह गई। किसी को बोध ही दिया जा सकता है, समझता तो वह तभी है जब परिस्थितियाँ उसमें विवेक का प्रादुर्भाव करती हैं।
पाप अपना प्रभाव स्वयं प्रकट करता है।
इस घटना के बाद मानो उन आत्माओं का कहर प्रद्युम्न पर टूट पड़ा। इस घटना से स्तब्ध उसके माँ-बाप कुछ ही समय में चल बसे। इसके कुछ अंतराल बाद प्रद्युम्न एक लंबे समय तक क्षयरोग से पीड़ित रहा। इन्हीं दिनों उसके छोटे पुत्र का निधन हैजे से हो गया एवं बड़ा दिन-रात बेचैन रहने लगा।
प्रद्युम्न अब चालीस के पार था। अपनी बीमारी बढ़ती देख उसने बड़े पुत्र के हाथ पीले किए एवं कुछ समय पश्चात् दिन-रात तड़पते प्रद्युम्न भी चल बसा।
प्रद्युम्न के साथ ही मेरे दिन भी समाप्त हो गए, मैं भी कहीं अन्यत्र प्रवास कर गई।
आज इतने लम्बे अंतराल के बाद पुनः यहां आई हूँ। अपनी ही आंखों से प्रद्युम्न की पांचवीं पीढ़ी को देख रही हूँ। प्रद्युम्न के बेटे-पोते तो कबके मरे। उसकी पांचवीं पीढ़ी का हाल भी बेहाल है। इस पीढ़ी का एक वंशधर नेमसिंह इसी शहर की एक प्रतिष्ठित स्कूल में प्रिंसीपल है। प्रद्युम्न के ठीक उलट वह एक अत्यंत सज्जन, मनस्वी एवं ईश्वरभीरू व्यक्ति है लेकिन अक्सर बीमार रहता है। अमूमन यही आलम उसके पुत्रों का है, जो जाने किन-किन अज्ञात बीमारियों से ग्रस्त हैं। कहते हैं प्रद्युम्न के अवसान के बाद उसकी पीढ़ियों का यही आलम रहा है। बच्चे या तो अपंग पैदा होते हैं या अक्सर बीमार रहते हैं।
शायद नेमसिंह को इसका बोध हो गया है। बोधगम्यता ही मनुष्य के पुण्यों का उदय करती है। अभी कुछ समय पहले ही उसने एक प्रखर तपस्वी एवं ज्योतिर्विद् को अपनी एवं अपने सभी पुत्रों की जन्मपत्री बताई थी। उन्होंने बताया है कि उसके ही नहीं उसके पुत्रों की जन्मपत्रियों में पितृदोष है। नेमसिंह के पूछने पर उन्होंने समझाया कि पितृदोष किसी एक पुुरखे द्वारा किए पापों के कारण वंश-दर-वंश चलता है। इसके निवारण के लिए सर्वप्रथम उस विशिष्ट पाप के विमोचन के लिए यज्ञ कर पीड़ित आत्माओं से क्षमा मांगनी होगी एवं साथ ही जनहितार्थ कोई महान त्याग करना होगा।
तपस्वी की राय को शिरोधार्य कर नेमसिंह ने रामपुर गांव की सारी जमीन एक ऐसे अस्पताल के निर्माण के लिए दान कर दी है जहां गरीब मजदूरों एवं अन्य जरूरतमंदों का निःशुल्क इलाज होगा। दुर्भाग्य के खड्डे तो त्याग की मिट्टी डालने से ही भरते हैं।
नेमसिंह के घर आज पितृदोष निवारण हेतु भव्य यज्ञ हो रहा है। आज का दिन मेरे लिए भी अहम है।
लेकिन पांचवीं पीढ़ी तक भला मैं कैसे जिंदा रही?
मैं मरती कहां हूँ?
घड़े के फूटने पर उसके भीतर का आकाश कब विनष्ट हुआ है?
प्रद्युम्न के अवसान के बाद मैं कहां-कहां नहीं भटकी। उन पीड़ित आत्माओं का श्राप प्रद्युम्न के वंश के साथ मुझसे भी चिपक गया था। मेरी यात्रा की गति में वे अवरोध बनकर खड़ी थी।
आज नेमसिंह द्वारा इतना त्याग करने तथा यज्ञ अग्नि के आव्हान पर पुनः इस हवेली में आई हूँ – अपने वंशधरों को आशीष एवं बोध देने-कि हमारे द्वारा किए जुल्म, अत्याचार एवं अनाचार हम ही नहीं हमारी पीढ़ियां तक भोगती है- वैसे ही जैसे हमारे पुण्यों की फसल भी वे ही काटते हैं। वे हमारी संपत्ति के वारिस बनने के साथ ही अनायास उन पापों को भोगने के लिए भी बाध्य हो जाते हैं जो हम संपत्ति के अर्जन में करते हैं।
अब आसमान से बादल फट गए हैं। निःसंदेह अब इस वंश में कोई पितृदोष नहीं रहेगा।
प्रद्युम्न के हृदय में निवास करने वाली, उसकी सहचरी, उसकी आत्मा, मै अब अपने मुक्तिपथ पर प्रवास करते हुए कितनी प्रफुल्लित हूँ !
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25.10.2008
