थैंक्स कैटी

सूरज डूबते हुए अनेक बार शाम को उदासियाँ क्यों दे जाता है ? वह स्वयं तो महाकाश में विलीन होकर परम शांति ढूंढ लेता है, अकेली शाम को वह किसके आश्रय में छोड़ता है ? सूरज क्या जानता नहीं शाम को आगे अंधेरे की महासत्ता से रूबरू होना है ?

उस शाम रीता के यहां से घर पहुंचा तब भीतर कहीं गहरे उदासी पसर गई थी। लौटते हुए पांव मन-मन भर के हो रहे थे। सारी क्रियाशक्ति मानो लुप्त हो चुकी थी। काश! किरण के साथ होता तो मन बांट लेता। पत्नी में पुरुष का मन पढ़ने का नैसर्गिक गुण होता है। पुरुष कहे इसके पूर्व वह जान लेती है ये क्या कहेगा एवं इसकी समस्या का क्या समाधान निकल सकता है ?

रीता का हृदयविदारक रुदन सुनकर मन दहल गया था। समझ नहीं आया उसे क्या कहूं क्या न कहूँ ? मेरे पास समाधान भी क्या था? ओह ! हमारे इर्दगिर्द, यत्र-तत्र कितने दुःख, कितने अवसाद बिखरे हैं , हम अपना ही रोना रोए चले जाते हैं , दूसरों की किसको पड़ी है ?

रीता का मकान हमारे मकान से फर्लांग भर दूर है, मनोज थे तब तक हम हर पखवाड़े वहां जाते थे , वे भी बराबर मिलने आते थे पर मनोज के सड़क दुर्घटना में निःधन के बाद वहां जाना पहले से बहुत कम हो गया। मनोज थे तो पहले टहलते हुए अकेले भी चला जाता था पर अब जाने क्या सोचकर कदम रुक जाते हैं। एक अकेली विधवा के घर जाने में अजीब संकोच होता है एवं अकारण भय भी कि लोग क्या कहेंगे ? मनचले कुछ भी कह सकते हैं , उनकी तो जुबान चलेगी, अपनी प्रतिष्ठा धूल में मिल जाएगी। समाज का भय हमारे विवेक एवं स्वायत्तता को कोल्हू की तरह पीस डालता है।

ऐसा भी नहीं कि मैं उसके घर बिल्कुल नहीं जाता, बहुधा किरण के साथ जाता हूँ। कभी-कभी अकेले भी जाता हूँ एवं जब भी अकेले जाता हूँ कुछ न कुछ लेकर जाता हूँ हालांकि किरन को यह बिल्कुल पसंद नहीं है एवं न ही मैं उसे कुछ बताता हूँ। पत्नी कितनी ही राजदार हो उससे भी कई बातें छुपानी होती हैं। अभी चार रोज पहले ही दुबई के खजूर देकर आया हूँ। उसके पहले कभी फल तो कभी ड्राईफ्रूट्स, कभी मिठाई , स्नैक्स एवं जाने क्या-क्या देता रहा हूँ। मैं कभी खाली हाथ जाता ही नहीं । ईश्वर ने इतना धन एवं दिल तो दिया है कि अपनों की संवेदना का ख़्याल रख सकूं।

मेरी इस उदारता के बावजूद रीता के मुख पर प्रसन्नता नहीं उभरती , वह अक्सर उदास रहती है। एक अजीब रिक्तता उसकी आत्मा में प्रवेश कर गई है।  कुछ दिन पूर्व मैं उसके यहां चाय पीने को रुका तो कह रही थी , ‘दिनेशजी ! आपके मित्र इतना कुछ छोड़कर गए हैं कि मैं स्वाभिमान से जी सकूं पर अकेलापन काटने को दौड़ता है। अनेक बार रातों को नींद नहीं आती तब घर में चक्कर काटती हूँ। हवा भी दस्तक दे तो आत्मा में खौफ़ पसर जाता है। ओह ! मैं मनोज के साथ मर क्यों न गई ?’ इतना कहकर वह फूट-फूट कर रोने लगी। मैं अपने ही में सिमट गया। कुछ देर तो वहां बैठा रहा फिर सीधा घर चला आया।

उसके यहां से आए एक घण्टा हुआ पर मन अब भी उदास है। घर आकर कुछ देर टीवी देखता रहा फिर जस-तस डिनर गटक कर पलंग पर पड़ा हूँ। लेटने से क्या  कभी मन के बवंडर शांत हुए हैं ? ओह ! अकेले लोग कैसे जीते होंगे? यहां दो हैं ,  तो भी कभी-कभी चिड़चिड़ मचती है। बच्चे दूर हैं तो उनकी याद सताती है। अनेक बार तो किरण पर अकारण झल्ला उठता हूँ । वह रसोई में हो तो “अब तुम कित्ती देर वहां बैठी रहोगी” एवं पास हो तो “अब छाती पर ही बैठी रहोगी क्या ?” जाने क्या-क्या बोलता रहता हूँ। तब वह मुझे ऐसे देखती है मानो मैं आदमी न होकर चिम्पांजी हूँ। मेरा बस चले तो पेट खुजाकर दांत दिखाऊँ।

“अब सो भी जाइए ! सुबह जल्दी उठकर मॉर्निंग वॉक पर जाना है। ” मैं यूँ चौंका मानो कोई बवंडर से निकलकर बाहर आया हूँ।

“अरे ! दस बज गए , पता ही नहीं चला। ” मैं उठा, स्विच ऑफ किया एवं पुनः लेट गया। जाने क्यों रीता कई देर तक मेरे विचारों में तैरती रही।

सुबह ब्रश कर रसोई में जा ही रहा था कि दरवाजे पर दस्तक हुई जैसे कोई दरवाजे के नीचे से हल्का-हल्का ठोक रहा हो। मैंने खास ध्यान नहीं दिया। मुझे लगा तेज हवा से दस्तक हुई होगी। थोड़ी देर बाद यही दस्तक तीन-चार बार फिर हुई तो मैं चौंका। मैं चिढ़ गया। आने वाला घण्टी नहीं बजा सकता क्या ? जाने इस देश मे सिविक सेन्स कब आएगा ? यकायक मुझे ख़्याल आया बरामदे से आगे बने ग्रिल गेट यानी मुख्यद्वार पर तो हम रात ताला लगाकर भीतर आते हैं, फिर क्या कोई फांदकर आया है? कॉलोनी में क्या कोई इमरजेंसी बन गई है ? कहीं गहरे अवसाद के चलते रीता ने तो कुछ नहीं कर दिया ? मेरी आत्मा में एक विचित्र भय पसर गया।

 मैं ड्राइंगरूम पार कर दरवाजे तक आया एवं चिटकनी खोली तो देखकर दंग रह गया । यहां तो माजरा ही कुछ और था। दरवाजे के बाहर एक सफेद बिल्ली धीमी आवाज में म्याऊँ बोल रही थी। यह बिल्ली इधर कैसे आ गई ? इसने दरवाजे पर बार-बार पंजा क्यों मारा ? मैं उसे भगाने ही वाला था कि उसने पंजे पीछे कर मेरी ओर कातर आंखों से देखा। उसकी चमकती आंखों में अद्भुत सम्मोहन था। शरीर पर रूई जैसे स्वच्छ, मुलायम एवं घने बाल थे। यह एक युवा बिल्ली थी। मैं उसकी ओर गौर से देख ही रहा था कि उसने दो बार फिर म्याऊँ किया। ओह! अब समझ आया यह भूखी होगी। मैं मुड़कर रसोई तक गया , एक पुरानी स्टील की भगोनी में कुछ दूध एवं पानी मिलाया एवं पुनः बाहर आ गया।

मुझे देखते ही बिल्ली भगोनी तक उछली , मैं ध्यान नहीं रखता तो वह गिरा देती। मैंने हाथ ऊपर किया एवं भगोनी वहीं दीवार पर रख दी। मेरे देखते-देखते वह दूध चट कर गई। पेट भरते ही उसने मुंह के बाल पोंछे  एवं मेरी ओर उपकृत नज़रों से देखा। वह जितनी सुंदर थी उतनी ही आकर्षक भी थी। मुझे लगा इसे हाथों में उठाया जाय, मैं नीचे झुका पर मेरा हाथ लगने के पूर्व ही वह ऐसी फुर्र हुई जैसे उसे अब मुझसे कोई प्रयोजन ही न था। मैं अपना-सा मुंह लेकर रह गया।

दूसरे दिन फिर बिल्ली ने नॉक किया। इस बार मैं समझ गया कैटी होगी। मैंने कल  जाने के बाद मन ही मन उसका ‘कैटी’ नामकरण कर दिया था। मैं दूध लेकर बाहर आया पर आज वह उतना नहीं उछली जितना कल उछली थी। कहीं पी आई होगी। बिल्ली की जात मुझे लुभा सकती है तो अन्यों को भी तो लुभा सकती है। उसने दूध पीया एवं आश्चर्य ! आज चुपचाप मेरे पांवों के पास आकर बैठ गई मानो कह रही हो कल परख रही थी आज पहचान गई हूं। मुझे उसका यूँ बैठना बहुत भला लगा। मैंने उसे उठाकर गोदी में लिया, कुछ देर सहलाया तो मेरे भीतर स्नेह का दरिया बह गया। ओह ! पशु- पक्षी कितने अहसानमंद होते हैं, मात्र दो दिन दूध पिलाया एवं आज मुझे इस तरह देख रही है मानो मैं उसका अपना हूँ। आदमजात कितनी अहसानफरामोश है। कुछ तो ऐसे भी हैं जिनके लिए मर- खप लो पर अंत में ऐसे पीठ दिखाते हैं मानो कभी देखा ही न हो।

अब तो कैटी का आना रोज की बात हो गई। आश्चर्य ! अब मैं भी उसका इंतजार करने लगा। मुझे खुद नहीं मालूम ये इंतज़ार मेरे दिल में क्यों पैदा हो गया ? कुछेक बार तो मैं दूध लेकर उससे पहले आ गया, वह बाद में आई।

इन दिनों मैंने कैटी के व्यवहार में अप्रत्याशित परिवर्तन महसूस किए। दूध पीकर कभी वह कोने में बैठ जाती, कभी दूध छोड़ देती। मैं दूध के साथ ब्रेड के टुकड़े डालने लगा, उसने एकाध बार खाए भी पर फिर दूध-ब्रेड भी थोड़ा-सा लेकर छोड़ देती। एक बार मैंने उसे गोद में लेकर कहा भी , कैटी, ऐसे करते हैं क्या! यह कहते हुए मैंने उसे चूमा तो वह ऊपर मुंह कर ऐसे म्याऊँ बोली जैसे बहुत उदास हो। अब मैं क्या समझूं उसकी क्या समस्या है? अवश्य नीचे उतर कर सड़क पर भागी होगी एवं कुत्तों ने फफेड़ दिया होगा। यह भी हो सकता है पड़ौसी शर्माजी के यहां दूध पीने मरी होगी पर वह कंजूस इसे कुछ दे सकता है क्या ?  चार दिन पहले उसके बड़े भाई ने नागपुर से ढेर संतरे भेजे थे, चाहता तो कुछ इधर भी कर सकता था पर दोनों मियां-बीवी गड़ड़ गड़ड़ मिक्सर  चलाकर सारा रस पी गए। यूँ शर्माजी मेरे हमवय यानी पचास पार हैं, इसी शहर की एक प्रतिष्ठित प्राइवेट स्कूल में प्रिंसिपल हैं एवं मेरी उनसे बहुधा नोकझोंक चलती है। उनका नाम अंकित शर्मा है , नित्य कसरत करने से आज भी चुस्त-दुरुस्त लगते हैं। मेरी तरह अच्छे लंबे हैं एवं नाक-नक्श भी आकर्षक है।

ओह ! यह कैटी की सोचते शर्माजी क्यों बीच में आ गए। कैटी के जाने के बाद उसकी उदासी कई देर मेरे जेहन में तैरती रही। संवेदना का विस्तार तो सर्वत्र एक-सा है  मनुष्य हो अथवा पशु। मनुष्य तो फिर जुबां से बयान कर देता है, पशु-पक्षियों का दर्द तो इशारों से समझना पड़ता है। मुझे ताज्जुब इस बात का था मैं उसके बारे में इतना क्यों सोचने लगा था। कोई हमारे जीवन में इस तरह जगह कैसे बना लेता है ? इतना ही नहीं हम उसके सुख-दुःख तक से प्रभावित होने लगते हैं।

यकायक कैटी कुछ दिनों के लिए गायब हो गई। मैं बाहर आता पर वह नहीं दिखती। कहां चली गई ? क्या सचमुच कुत्तों ने उसे फफेड़ दिया ? वह किसी अन्य मोहल्ले में तो नहीं चली गई ? किसी तेज दौड़ती कार के नीचे तो नहीं आ गई ?  अब मैं उदास हो गया पर करता क्या ? मैंने कई दिन उसका इंतजार किया , अंततः समय बीतते भूल भी गया।

प्रकृति में कुछ भी तो स्थाई नहीं रहता। यहां मौसम तीव्रता से बदलते हैं। यहां बसंत है तो पतझड़ भी है, सर्दी है तो गरमी है एवं सुख है तो दुःख भी है । यह दुःख अनेक बार बिन बुलाए मेहमान की तरह औचक आ धमकते हैं।

इन दिनों शहर में एक नए ‘कोरोना’ रोग ने दस्तक दी थी , कुछ समय में ही इसका खौफ शहर भर में पसर गया। मैंने तो इस रोग का नाम भी पहली बार सुना। एक दैत्य की तरह यह रोग नित्य अनेक लोगों को लीलने लगा। शहर की फ़िज़ाओं में दहशत घुल गई। ऐसा संक्रामक रोग न पहले देखा न कभी बुजुर्गों से सुना। इन दिनों मास्क लगाना अनिवार्य था। शहर में मास्क पहने लोग ऐसे दिखते मानो सारा शहर पर्दानशीं हो गया हो। पुलिस की गश्त एवं सख़्ती दिन ब दिन बढ़ रही थी। कहां शहर देर रात तक जगमगाता था और अब शाम होते ही शहर में एक रहस्यमय खामोशी डेरा डाल देती , सर्वत्र सन्नाटे तैरने लगते । बाज़ार, मोहल्ले सभी सुनसान बन गए। इस महारोग को नेस्तनाबूद करने के लिए हुक्मरानों ने जो बन पड़ा, किया। कभी कर्फ्यू तो कभी लॉकआउट एवं जाने क्या-क्या प्रयोग हुए, इससे रोग कम तो हुआ, पर काबू में न आया। शहर भी हमेशा के लिए कब तक बंद रखा जा सकता था। दिहाड़ी मजदूर भूखे मरने लगे। सरकार को नियंत्रण हटाने पड़े। इस बार लॉकआउट खुला तो संक्रमण और बढ़ गया। अखबारों के आधे पृष्ठ शोक-समाचारों से भर गए। शहर में मानो खौफ़ का राज हो गया। कपोलकल्पित भय के चलते कई लोग अवसाद में चले गए।

इन्हीं दिनों एक रात पलंग पर पड़ा सोच रहा था, अगर मुझे या किरण को या फिर हम दोनों को कोरोना हो गया तो क्या करेंगे ? बच्चे तो दूर अन्य शहरों में बैठे हैं, उनका आना तो असम्भव है। अगर उन्हें कोरोना हो गया तो हम कैसे पहुंचेंगे? मैं भीतर तक सहम गया, चेहरे का रंग पुराने कागज की तरह ज़र्द पड़ गया। मैं मन ही मन ईश्वर को पुकारने लगा, ‘प्रभु ! मारना है तो हमें मार देना, बच्चों से बैर मत निकालना।’ यही सोचते मेरी सांस फूल गई। मेरे सामने अखबार के वे चित्र तैर गए जहां कोरोना वारियर्स एक खास किस्म की सफेद ड्रेस पहने शवों का दाह-संस्कार कर रहे होते। उनके सर ढके होते एवं हाथों में खास किस्म के दस्ताने होते। मरने वालों के मित्र- निकट रिश्तेदारों तक को शव से दूर रहने का फरमान था। मौत छूने भर की दूरी तक हो तो वहां जाएगा भी कौन? कुछ ऐसी तस्वीरें भी थीं जहां कतारों में शवों के अंबार लगे होते। आज शव आता तो दूसरे दिन शाम अथवा देर रात तक जलाना सम्भव होता। दाह-संस्कार में भी इंतज़ार! कभी सोचा न था ऐसे खौफ़नाक मंज़र से रूबरू होना पड़ेगा।

इसी उधेड़बुन में मुझे रीता की याद आई। वह अकेली इन स्थितियों में कैसे रहती होगी ? उसके तो सारे रिश्तेदार हमारे शहर जोधपुर से दूर उत्तराखंड में रहते हैं। उसे कुछ हो गया तो ? मैं एक अज़ीब कपोलकल्पित भय से गिर गया। मैंने तुरत फोन कर उसके हाल जाने एवं ढाढ़स बंधाया।

इन्हीं विचारों के बीच एक रात किरण की आवाज़ सुनकर मैं चौंका।

“आपको पता है मिसेज शर्मा को कोरोना हो गया है?” कहते-कहते वह कांपने लगी। भयभीत उसने मेरे हाथ पकड़ लिए। मैंने उसकी कंपकंपाहट मेरी हथेलियों में महसूस की। लगा जैसे मौत अब मेरे दरवाजे पर खड़ी है एवं उसका अगला शिकार मैं अथवा किरण है। कमरे में एक अजीब चुप्पी पसर गई। भीतर का भय, उद्रेक किसी अज्ञात अवलम्ब को पुकारने लगा। निश्चय ही इन स्थितियों में शर्माजी की मदद करनी चाहिए। कल मैं भी तो इसका शिकार बन सकता हूँ ?

मैंने पास पड़े स्टूल से लेकर तुरंत मोबाइल मिलाया। मेरे फोन से शर्माजी को राहत मिली। अगले चार दिन उनके यहाँ भोजन, दवाइयाँ आदि भी हमारे घर से ही भेजी गईं। वे मुझे फोन कर अपनी जरूरत बता देते। मैं उनके दरवाजे पर छोड़ आता, हालांकि वहां तक जाते हुए भी पिंडलियां कांपती। वे भी क्या करते, घर में क्वारन्टीन जो थे।

पांचवी रात अचानक मिसेज शर्मा की तबीयत बिगड़ी तो एम्बुलेंस बुलवाई गई, चिकित्साकर्मियों ने मिसेज शर्मा को गाड़ी में लिया, प्रशासन ने किसी अन्य यहाँ तक कि शर्माजी को भी साथ चलने की इज़ाज़त नहीं दी। मैंने साथ चलने का कहा तो मुझे भी मना कर दिया गया। गाड़ी चली तब शर्माजी फफक कर रो पड़े। नम आंखों से मैं एवं किरण भीतर आए। हम सभी लाचार थे। शहरभर की संवेदनाएँ पत्थर बन चुकी थी।

अगली सुबह यह समाचार जानकर कलेजा धक् से रह गया कि मिसेज शर्मा चल बसी है। शर्माजी एक विशेष सरकारी वाहन में श्मशान गए, सरकार ने क्वारन्टीन लोगों के लिए यह खास व्यवस्था की थी। वे भी दूर से देख सकते थे, उन्हें भीतर आने की इजाज़त नहीं मिली। ओह, यह कैसा कठिन समय था। इस समाचार से कॉलोनी ही नहीं, आसपास की कॉलोनियों तक के निवासी कांप गए।

इस हादसे को भी तीन महीने होने को आए। हालात अब धीरे-धीरे सुधरने लगे थे। अगले दो माह में स्थितियां सामान्य हो गईं।

इन्हीं दिनों मैं रीता के यहां गया तो वो मुझसे लिपटकर ऐसी रोई जैसे बच्चा बुक्का फाड़कर रोता है। महीनों बाद उसकी चुप्पी टूटी थी। वह एक विचित्र अवसाद में थी। अमूमन यही हाल शर्माजी का था। सुबह बगीचे में पानी देते हुए वे अक्सर शून्य में तकते रहते।

इसी बीच एक सुबह दरवाजे पर फिर दस्तक हुई। ओह ! कैटी होगी। इतने माह वह कहां रही ? मैं दूध लेकर बाहर आया तो देखकर हैरान रह गया। वह पंजे आगे-पीछे कर नाच रही थी, कभी इधर-कभी उधर, कभी यहां कभी वहां। कभी पंजे ऊपर कर खड़ी हो जाती, कभी रुककर मेरे पैर चाटने लगती। कुल मिलाकर वह बहुत खुश थी। मैंने दोनों हाथों से पकड़कर उसे ऊपर उठाया तो वह म्याऊँ कहकर मुझे चाटने लगी। आज वह दूध की तरफ भी नहीं लपकी। यह कैसे संभव है ? मैंने इधर-उधर देखा तो कोने में एक बड़ा-सा बिल्ला बैठा था, हट्टाकट्टा, कैटी की तरह सुंदर, सफेद रंग का। मैंने उसे गौर से देखा। पहले तो उसने आंखें ऊपर की फिर जाने क्या सोचकर नीची कर ली मानो कह रहा हो हम आपके नए दामाद हैं। अब मुझे माजरा समझ आया। संसार में पेट की भूख से भी बड़ी है एक साथी की भूख, एक ऐसा साथी जिसके साथ हम मन बांट सकें, जो देह के साथ हमारी मन-आत्मा को भी तृप्त कर सके। अकेलापन कोढ़ से भी बुरा है।

अब मुझे पता चला उन दिनों दूध-ब्रेड लेते हुए भी कैटी उदास क्यों रहने लगी थी ?

अगर पशु-पक्षियों को साथी की जरूरत है तो मनुष्य को भी तो होगी ? जीवनयापन से इतर सभ्य मनुष्य को कुछ और भी तो चाहिए ?

कुछ माह बाद शर्माजी एवं रीता हमारे घर दावत पर आमंत्रित थे।

रीता अब मिसेज शर्मा थी।

गत चार माह से मैं एवं किरण इसी संबंध को मूर्तरूप देने में लगे थे। रीता ने बहुत आनाकानी की पर अंततः हमारे प्रयास सफल हुए।

मुझे लेकिन यह बोध कैटी ने दिया। मैं मन ही मन बुदबुदाया ‘थैंक्स कैटी’।

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30.01.2022

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