भरे गले एवं भारी हृदय से नविता आज मुझे जोधपुर रेलवे स्टेशन तक छोड़ने आई थी। बीवी को नाराज करना किसे अच्छा लगता है। बहुत जरूरी काम नहीं होता तो मैं यह यात्रा हरगिज नहीं करता। कोलकाता में एक बहुत बड़ा कारोबारी ठेका हाथ लगने वाला था, अतः यात्रा आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य थी। गाड़ी प्लेटफार्म छोड़ने तक उसका मन अनेक आशंकाओं से भरा था। कमोबेश सभी यात्रियों एवं उनको विदाई देने आये संबंधियों एवं मित्रों का भी यही हाल था। सभी के चेहरे आशंका एवं विचित्र खौफ से भरे थे। सभी अपने परिचितों, रिश्तेदारों के सकुशल पहुंचने की कामना कर रहे थे। सारा वातावरण एक विचित्र कशमकश से भरा था। पौष की ठण्डी रात्रि में भी नवमी का अधूरा चाँद मानोे आग उगल रहा था। दसों दिशाओं एवं हवाओं में अजीब-सा भय व्याप्त था।
तीन रोज पूर्व गुजरात के एक रेल्वे स्टेशन पर अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण हेतु कूच करने वाले रामभक्तों की गाड़ी कुछ मुसलमानों ने जला दी थी। राम हिन्दुओं के आराध्य हैं, हिन्दू मनरंजक है, हिन्दू इस अपमान एवं बर्बर कृत्य को कैसे सहते ? उसके दूसरे रोज वीरपुर में हिन्दुओं ने एक चलती ट्रेन को रोककर चुन-चुनकर मुसलमानों का कत्लेआम किया । शहर में कई मुसलमानों के घर फूंक दिये गए। सैकड़ों बेगुनाह जिंदा जल गए। वर्षों के परिश्रम एवं बचत के बाद इंसान एक घर बनाता है पर फिरकापरस्ती की आँधी पल भर में बस्तियाँ जला देती है।
पूरे देश में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। सर्वत्र हवाओं में जहर घुल गया। जितने मुंह उतनी बातें। निगाहों में नफरत एवं दिल में दहशत लिये लोग चोर आंखों से एक दूसरे को देखने लगे। सियासी लोग अपनी-अपनी शतरंज बिछाने में मशगूल हो गए। रियाया जब प्यादों की तरह कटने को तैयार हो तो सियासी लोग ऐसे मौके का फायदा क्यों न उठाए? अब मुसलमानों ने फिर बदला लेने की धमकी दी थी। घृणा खर-पतवार की तरह फैलती है।
वह अजन्मा, अगोचर राम जो कालातीत, स्थानातीत है, उसी के नाम को लेकर इतना रक्तपात हो रहा था। ईश्वर सर्वत्र समान रूप से व्याप्त है, देश-विदेश, सभी दिशाओं में उसी के रूप का विस्तार है, जो निर्विकार, निर्लेप एवं सर्वव्यापक है, उसे हम क्यों एक स्थान में समेट देना चाहते हैं? जो सिर्फ प्रेम से प्रगट होता है उसके नाम पर इतनी नफरत, लूटपाट, इतनी हत्याएँ, इतनी घृणा ? क्या मनुष्य कभी धार्मिक बन भी सकेगा ? धर्म का सृजन नफरत मिटाने के लिए हुआ है, उसी के नाम पर घृणा का ऐसा वीभत्स ताण्डव ?
जोधपुर-हावड़ा एक्सप्रेस रात के घने अंधकार को चीरते हुए भागी जा रही थी। थ्री टायर रिजर्वेशन कोच के एक सेक्शन में मुझे मिलाकर कुल छह यात्री सफर कर रहे थे। चाक चौबंद व सावधान होने में कोई बुराई नहीं, अब तक मैंने अधिकांश से परिचय प्राप्त कर लिया था। मेरे साथ सीट पर राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर शर्मा एवं उनके पास डाक्टर उपाध्याय बैठे थे। डाॅक्टर शर्मा सागर यूनिवर्सिटी में कार्यरत थे एवं जोधपुर किसी मित्र से मिलने आए थे। डाॅ. उपाध्याय जोधपुर महात्मा गांधी अस्पताल में वरिष्ठ शल्य चिकित्सक थे। सामने सीट पर एक नया जोड़ा बैठा था जो सम्भवतः हनीमून पर निकला था। लड़के के हाथ पर बंधे लाल डोरे एवं दुल्हन के हाथ पाँवों में लगी मेहन्दी एवं पहनावे से ऐसा ही आभास हो रहा था। ये दोनों दार्जिलिंग जा रहे थे। इसी सीट के कोने पर खिड़की के पास एक आदमी चुपचाप बैठा था। उन्नत नाक, प्रशस्त मस्तक, गौर वर्ण, गहरी काली आँखें एवं चेहरे पर दाढ़ी से वह गंभीर नजर आ रहा था। मैंने एकाध बार उससे परिचय करना भी चाहा पर वह हर बार ऐसे आँख उठाकर देखता कि मुझे लगा उससे बात न करना ही उचित होगा। दुनिया में हर तरह के आदमी होते हैं, अकारण ही रुद्र क्यूं जगाएं। छह में से पांच हिन्दू तय थे, सभी के मन में आज के हालात पर बातचीत करने की हूक उठ रही थी पर उस व्यक्ति को देखकर सभी चुप थे। सभी का मन उसको लेकर एक अजीब आशंका एवं अन्देशे से भरा था। क्या पता यह हिंदू है या मुसलमान? मुंह से कोई ऐसी वैसी बात निकल जाए और अकारण कहर नाजिल हो जाए। क्या पता यह गाड़ी में किसी कुटिल उद्देश्य से यात्रा कर रहा हो ? किसी के मुख पर थोड़े लिखा होता है कि कौन किस धर्म का है ? रह-रह कर वह व्यक्ति सबको गंभीर आँखों से तरेरता, सबकी जबान तालु से चिपक जाती। थोड़ी देर बाद उस व्यक्ति ने अपने बैग से भगवद्गीता निकाली एवं भावमग्न पढ़ने में तल्लीन हो गया। हम सभी आश्वस्त हो गए कि वह हिन्दू ही है। सबने राहत की सांस ली। इन्सान अपने समुदाय में सदैव सुरक्षित महसूस करता है।
अब सभी अपने अपने विचार उगलने लगे। माहौल गरमाने लगा एवं धीरे-धीरे चर्चा ने गंभीर रूप ले लिया। सभी अपने मन का धुआँ निकालने लगे।
प्रो. शर्मा – ‘‘अब तो देश में हर रोज कत्लेआम हो रहा है। चैन से जीना दूभर हो गया है। मुझे समझ नहीं आता जब धर्म के नाम पर राष्ट्र का विभाजन मंजूर कर लिया गया तो हमारे जननायकों को मुसलमानों को गले लगाकर हिन्दुस्तान में रखने की क्या जरूरत थी। उनके विचारों की अदूरदर्शिता का खामियाज़ा हिंदुओं को सदियों तक अपना रक्त देकर करना होगा। हर युग, हर काल में हिन्दुओं ने गलत निर्णय लिए हैं, अदूरदर्शिता, कायरता एवं शक्तिहीनता का परिचय दिया है तभी तो उन्हें आज अपने ही देश में यूं भय से जीना पड़ रहा है। पाकिस्तान में किसी मस्जिद को लेकर ऐसा विवाद होता तो वे मंदिर तोड़ने में एक पल भी नहीं लगाते।’’ प्रो. शर्मा एक कट्टर हिन्दू की तरह अपने विचार रख रहे थे। कहते-कहते उनका चेहरा लाल हो चुका था।
डाॅ. उपाध्याय – ‘‘माफ करें प्रोफेसर साहब! मैं आपके विचारों से बिल्कुल सहमत नहीं हूँ। हिन्दू धर्म तो सदैव से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ में विश्वास रखता है। सर्वधर्मसमभाव एवं सभी धर्मों के प्रति आदर हमारी संस्कृति में है। क्या अकबर ने ‘दीन-ए-इलाही’ धर्म नहीं चलाया था ? क्या स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों ने अपने प्राणों की आहुति नहीं दी ? क्या स्वतत्रंता पश्चात के सीमापार युद्धों में मुसलमानों ने बलिदान नहीं दिया ? अगर भारत-पाकिस्तान विभाजन नहीं होता तो क्या हम सदैव लड़ते ही रहते ? क्या स्वतंत्रता के पूर्व भी सदियों तक हम साथ नहीं रहे ? क्या उन्होंने हमारी दीवाली पर दिये नहीं जलाए, हमने उनकी ईद पर सिंवइयाँ नहीं खाई? अंग्रेजों ने एक चाल चली और हम उसका शिकार हो गए। आज भी ये अंग्रेज हम दोनों के बीच बंदर-बांट करवाने से बाज नहीं आ रहे। आप इस राष्ट्र की एकता की कल्पना सभी सम्प्रदायों को साथ लिये बिना कर ही कैसे सकते हैं ? जिस मटके में छेद हो, वो क्या कभी पानी से भरा रह सकता है? हमें नये युग को समझना होगा, नये समीकरणों को जानना होगा। तभी हम एक नये मजबूत भारत का निर्माण कर सकते हैं, अन्यथा आज जिस दहशत के साथ आप यात्रा कर रहे हैं, वैसे जीवन जीना हर भारतीय की नियति बन जाएगी।’’ भावावेश में डाॅ. उपाध्याय की आँखों में पानी तैरने लगा था।
प्रो. शर्मा – ‘‘यही तो दुर्भाग्य है कि हिन्दू ही हिन्दू को काटता है। घृणा का जवाब घृणा से ही दिया जाना चाहिए। ईंट का जवाब पत्थर से ही दिया जाता है। कमजोर कौमों को जिन्दा रहने का कोई हक नहीं। जिस तरह कमजोर पौधे उखड़ जाते हैं उसी तरह कमजोर कौम भी। मुसलमान हमारी भलमनसी को कायरता समझते हैं।’’ प्रो. शर्मा के रक्त की एक-एक बूंद चीत्कार रही थी।
डाॅ. उपाध्याय – ‘‘आपके विचार ठीक वैसे ही है जैसे कोई उसी वृक्ष को काटे, जिसकी डाल पर वह बैठा हो। प्रतिहिंसा की भावना से वैर का अन्त नहीं होता। प्रेम के मंत्र से ही घृणा के दानव को कुचला जा सकता है। कंधे से कंधा मिलाकर ही हम एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।’’ डाॅ. उपाध्याय की आँखों से वेदना एवं चेहरे से गांभीर्य फूट रहा था।
प्रो. शर्मा – ‘‘आपका मतलब हम अहिंसा एवं प्रेम को शिरोधार्य कर सदैव मार खाते रहें। आप उन लोगों से जाकर पूछिए, जिन्होंने विभाजन की त्रासदी भोगी है। दूसरों को उपदेश देना बहुत सरल है, परिस्थितियों को भोगना अलग बात। मुझे मालूम है मेरे पिता किस तरह पाकिस्तान से हमारे परिवार को लेकर आए थे। मेरी मां को तो रास्ते में ही काट डाला गया था।’’ कहते-कहते प्रो. शर्मा की आँखें अंगारे उगलने लगी थीं।
डाॅ. उपाध्याय – ‘‘यह तब की बात थी, वह अंग्रेजों की एक कूटनीतिक चाल थी। वे भाई-भाई को लड़ाकर हमें कमजोर करना चाहते थे। अब आजादी को पचास वर्ष से ऊपर होने को आए। हमें बिखरे तिनकों को जोड़ना होगा। दिया जलाने से रोशनी होगी। जंगल में आग लगा दो, पर रात्रि तो सूर्य के उदय होने से ही जाएगी। अविश्वास, द्वेष एवं क्षोभ के बीज हमारे ही राष्ट्र को खोखला एवं कमजोर करेंगे। कमजोर घर में कोई शत्रु आतंक फैला सकता है। अगर हम एक संयुक्त शक्ति का प्रदर्शन करें तो किसी को हमारे घर जलाने की हिम्मत नहीं होगी। पगड़ी दोनों हाथों से थामी जाती है।’’
सामने खिड़की के पास बैठा आदमी अभी भी शांत, गंभीर था। उसके चेहरे पर क्रोध, वैमनस्य, घृणा का नाम तक नहीं था। हाँ, कभी-कभी हमारी बातों से विषाद की एक रेखा उसके चेहरे पर फैल जाती तो कभी चिंता से उसका माथा सिकुड़ जाता। वह अब भी भावमग्न गीता पढ़े जा रहा था।
प्रो. शर्मा एवं डाॅ. उपाध्याय में वाद-विवाद अब और गरमा गया था। प्रो. शर्मा डाॅ. उपाध्याय की बातों, उनके सटीक तर्कों एवं अभिनव दर्शन से सकते में आ गए। बातों का ज्वार और चढ़ा और धीरे-धीरे दोनों में हाथापाई तक की नौबत आ गई। मैंने बीच-बचाव कर किसी तरह उनको रोका।
सामने बैठा जोड़ा अब उनींदा होने लगा था, रात करीब साढे दस बजने को थे। मैंने सभी से बर्थ खोलकर सोने के लिए निवेदन किया।
ट्रेन बेतहाशा दौड़ी जा रही थी। चन्द्रमा की रोशनी में पीछे भागते पेड़ काली छाया-सी आकृति के दिख रहे थे। खेतों पर भयानक निस्तब्धता एवं नीरवता की काली चादर बिछी नजर आती थी। चन्द्रमा की किरणें खिड़की से चोर पांव आती एवं विलुप्त हो जाती।
यकायक कोच में कुछ खटपट हुई। देखते ही देखते दो युवक हाथ में नंगी तलवारें लिए दरवाजे से घुसे एवं सीधे हमारी सीटों के सामने आकर खड़े हो गए। उनकी आँखों में क्रूरता नृत्य कर रही थी। क्षण भर के लिए जमीन रुक गई एवं आसमान चक्कर खाने लगा। सामने बैठी नववधु पीपल के पत्ते की भाँति कांपने लगी। प्रो. शर्मा का सारा ज्ञान एवं शौर्य क्षण भर में पलायन कर गया। घबराहट के मारे मेरी एवं डाॅ. उपाध्याय की आँखें फैल गई। मृत्यु साक्षात् सामने खड़ी थी। शरीर में रक्त न रहा, सारे अवयव निस्पंद हो गए। नसों में खून जम गया।
‘‘अपना-अपना नाम बताओ?’’ उनमें से एक जोर से चिल्लाकर बोला। हम आज एक भी हिन्दू को जीवित नहीं छोड़ेंगे।’’
भय से सभी थरथर कांपने लगे। प्रो. शर्मा तो बेसुध-से हो गए।
खिड़की के समीप बैठे दाढ़ी वाले व्यक्ति ने पलक झपकते अपनी जेब से पिस्तौल निकाली एवं दोनों को क्षणभर में वहीं ढेर कर दिया। जैसे वक्त थम गया। सभी भीत-चकित नेत्रों से इस सूरमा को निहार रहे थे। उसके रोम-रोम से शौर्य एवं गर्व की ज्वाला फूट रही थी। उसके साहस, मुस्तैदी एवं हौसले ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। निर्जीव मांस के लोथड़ों की तरह दोनों आतंककारियों के शव नीचे पड़े थे।
इस सारे हादसे के बाद पुलिस नजर आई। अब तक कोच के अन्य व्यक्ति भी वहां इकट्ठा हो चुके थे। डिब्बे में अफरा-तफरी मच गई । सभी उस दाढ़ी वाले युवक को उपकृत आंखों से देख रहे थे। मैंने कहा, ‘‘भाई साहब! अब तो अपना परिचय दीजिए!’’ मेघ गंभीर स्वर में उसने कहा, ‘‘मेरा नाम मोहम्मद अली है, तरह-तरह के धर्मग्रंथों, पुस्तकों को पढ़ना मेरी अभिरुचि है। आज मैं गीता पढ़ रहा था।’’ उसने कहना जारी रखा, ‘‘मैं आर्मी में कैप्टन हूँ। इस देश एवं देश के लोगों की हिफाजत के लिए अगर जान भी देनी पड़े तो मुझे कोई तकलीफ नहीं होगी। हिन्दुस्तान हमारा वतन है एवं हर हिन्दुस्तानी की हिफाजत करना हमारा ईमान।’’ प्रो. शर्मा की ओर मुखातिब होते हुए उसने कहा, ‘‘आपको अपना नजरिया एवं पूर्वाग्रह बदलने ही होंगें अन्यथा निःसंदेह यह राष्ट्र एक दिन रसातल में चला जाएगा। फिरकापरस्ती वतन के साथ गद्दारी है। मिल-जुल कर ही हम एक सुद्दढ़ देश का निर्माण कर सकते हैं। चाहता तो आज अपना नाम बताकर मैं साफ बच निकलता एवं आप लोगों को मौत के मुंह में धकेल देता लेकिन यह वतन के साथ गद्दारी होती। राष्ट्रधर्म एवं राष्ट्रध्वज का स्थान सबसे ऊपर है, सभी मजहब उसके नीचे हैं।’’ कहते-कहते उसका चेहरा शौर्यज्योति से दमकने लगा।
ट्रेनअब भी सरपट दौड़ी जा रही थी।
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23.06.2002
