पंछी हो या मनुष्य सभी को नीड़ की तलाश है। एक ऐसा घरौंदा जिसे हम अपना कह सकें, एक आशियाना जहां हम स्वच्छंदता से आ-जा सके, शांति एवं सुकून से रह सकें, जहाँ हमारी निजता एवं आत्म परितोष को प्रश्रय मिले, एक मुकाम जिसके मालिक हम खुद हों। चैतन्य के अनंत विस्तार में, हर प्राणी को, चाहे वो नभचर हो, जलचर अथवा थलचर, एक घर की चाहना है।
अशोक श्रीवास्तव एवं मंजुला श्रीवास्तव कितने अरमानों के बाद अपने घर में आए हैं। शहरों में स्वयं का मकान होना एक दिवास्वप्न है। एक मध्यमवर्गीय परिवार के आदमी को अपने घर में घुसते-घुसते, कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, कितनों के नाज-नखरे उठाने पड़ते हैं, यह उन्हीं से पूछिए जो किसी तरह स्वयं का मकान खरीद लेते हैं। नेहरू नगर, उदयपुर के इस मकान तक आने में श्रीवास्तव दम्पति ने क्या-क्या नहीं सहा, कितना मन मसोसा, ये वो ही जानते हैं। सारे जीवन की बचत को इकट्ठा किया, बैंक ऋण पास करवाने के लिए चर्खी की तरह बैंक वालों के चक्कर लगाए। इस पर भी रकम पूरी नहीं हुई तो गहने तक बेचने पड़े। कितनी तकलीफ से शादी के समय मंजुला के पापा ने ये गहने बनवाए थे। पीहर की निशानियाँ, विशेषतः गहनों को कोई स्त्री जब बेचने के लिए देती है तो शायद अपना कलेजा ही निकालकर देती है।
पिछली बार तो मकान-मालिक ने अन्तिम चेतावनी दे दी थी, ‘‘श्रीवास्तव साहब, इस बार मकान हर हालत में खाली हो जाना चाहिए, अन्यथा किसी प्रकार के दुर्व्यवहार के लिए आप स्वयं जिम्मेदार होंगे। मकान लिया था तब तो आप कहते थे, जब कहेंगे खाली कर देंगे। अब दस बार कह दिया तो भी कुण्डली मारकर क्यूं बैठे हैं ? ’’ श्रीवास्तव साहब ने एक कड़वा घूंट गले के नीचे उतारा। मन-ही-मन सोच रहे थे – इसके सर पर दस जूते दूं, पर ऐसा करके वो अपने अवयवों को परीक्षा में नहीं डालना चाहते थे। सारे क्रोध का विनम्रता में रूपान्तरण कर, शक्कर घुली आवाज में उन्होंने कहा, ‘‘यकीन रखिए, इस बार अवश्य खाली कर दूंगा।’’ इस विनम्रता को बटोरने में उन्होंने अपने सारे विवेक एवं ज्ञान को समेट लिया था। यह कम कठिन काम नहीं है कि जिन्हें हम पीटना चाहते हैं, उनके सामने नतमस्तक हो जाएं।
उस रात उन्हें नींद भी नहीं आई। बुरा मकान-मालिक स्वयं के मकान का योग जल्दी बनाता है। बड़े बुजुर्ग ठीक कहते हैं-घर के मकान में जाना है तो बुरा मकान-मालिक ढूंढो। हर महीने की पहली तारीख के आसपास उसकी आँखों की गम्भीरता स्वयं ही आपको अपना कर्तव्य बोध करा देती है। तनख्वाह का एक मोटा हिस्सा उसकी नजर करो, उसके बाद भी ग्रहगोचर ठीक है तो अच्छा है अन्यथा न जाने कब उसका दिमाग फिर जाए एवं वह किराया बढ़ा दे। उसकी दृष्टि ही आपको थका देती है, बुरा मकान मालिक स्वयं का मकान खरीदने का सबसे बड़ा प्रेरणा-स्रोत है।
नेहरू नगर, उदयपुर, पचास घरों की एक काॅम्पेक्ट काॅलोनी है। काॅलोनी का डिजाइन एवं आर्किटेक्ट, सोसायटी इंजीनियर ने बहुत शानदार एवं मनभावन किया है। काॅलोनी दूर से ही मन मोह लेती है। तीन सौ गज के पच्चीस प्लाॅट के टुकड़े हैं एवं हर एक प्लाॅट पर दो-दो मकान बने हैं, दो मकानों के बीच की दीवार काॅमन है। श्रीवास्तवजी जब मकान खरीदने गए तो एक ही मकान बचा था। मकान हर तरह से अच्छा था। दो बेडरूम, एक खूबसूरत ड्राईंगरूम, बड़ी किचन, बाहर छोटा बगीचा, अलग से मुख्य द्वार एवं पार्किंग सुविधा भी थी। हवा-पानी, रोशनी भी समुचित मात्रा में उपलब्ध थे। पता नहीं यह मकान कैसे बच गया। मकान के पड़ोस में एक मुस्लिम दम्पति, डाॅ. निसार अहमद अपने परिवार के साथ रहते थे। शायद इसीलिए यह बिकने से रह गया। बाकी सारे मकान हिन्दू वैष्णवों ने लिए थे, डाॅ. अहमद का परिवार ही एकमात्र मुस्लिम परिवार था। मकान खरीदते वक्त हर कोई इस बात पर तवज्जोह देता है कि पड़ोस किसका है, और यहां तो चूंकि मकान एक दीवार से जुड़े थे, पड़ोस देखना लाजमी था।
मकान हर तरह से श्रीवास्तव दम्पति को पसंद आ गया। उनका कौन-सा बहुत बड़ा परिवार था। पति-पत्नी एवं दो बच्चे, कुल चार ही तो थे। उनकी आवश्यकता के अनुरूप मकान बिल्कुल सही था। ऐसे स्वर्णिम अवसर बहुत कम मिलते हैं, पर पड़ोस का विचार कर वे ठिठक गए। उधर मकान मालिक का घूरता हुआ चेहरा बार-बार उनके आगे आ रहा था। पड़ोस और मकान मालिक के ख्याल के बीच उनके विचार त्रिशंकु की तरह लटक गए। उनकी गति उस अपराधी की तरह थी जो पुलिस की गिरफ्त से तो छूट कर भाग गया हो पर रास्ते में किसी खड्डे में पाँव अटक गया हो।
श्रीवास्तव दम्पति अब कशमकश में थे। एक कृष्ण-भक्त शुद्ध शाकाहारी परिवार, एक मुसलमान के पड़ोस में कैसे रहे ? श्रीवास्तव तो बचपन से ही मुसलमानों के बारे में न जाने क्या-क्या सोचता था। सुना है उनके दिल में कोई रहम नहीं। आये दिन देश के साम्प्रदायिक दंगों की तस्वीर उनके सामने थी। इनके घर में तो बच्चे तक लाठी-तलवार चलाना जानते हैं। खून-खराबा करते इन्हें जरा भी दया नहीं आती। कुछ समय पहले ही उनके एक मित्र ने उसे एक मुस्लिम परिवार के बारे में बताया था जो अत्यन्त क्रूर था एवं उसने अपने पड़ोसी के पूरे परिवार की हत्या कर दी थी। यहां तो मुसीबत आए तो हाथ में चाकू भी नहीं उठा सकते, फिर निभेगी कैसे ? श्रीवास्तव ऊपर से नीचे तक काँप गया। यह गाय-शेर के पड़ोस जैसी बात थी। मंजुला एवं बच्चे भी इस मुद्दे पर अन्यमनस्क थे, कोई सहमति नहीं बन रही थी। आदमी अक्सर वही सोचता है जो वो लोगों से सुन लेता है, उन्हीं विचारों के इर्द-गिर्द कल्पना के ताने बाने बुन लेता है एवं अंततः उसकी धारणा किसी व्यक्ति, स्थान या कौम के बारे में वैसी ही हो जाती है। आगे ज्यों-ज्यों हम बड़े होते हैं हमारी आँखों के आगे पर्दा होता है एवं कानों में अँगुलियाँ। हम वही देखते हैं जो देखना चाहते हैं, वही सुनते हैं जो सुनना चाहते हैं। आधारभूत धारणाएँ ही गलत हो तो नये विचार कैसे प्रविष्ट होेंगे?
वर्तमान परिस्थितियों में श्रीवास्तव दम्पति के पास कोई विकल्प नहीं था। श्रीवास्तव साहब स्थानीय कचहरी में टाईपिस्ट थे, परिवार का जैसे-तैसे गुजर होता था। अंततः मन मारकर उन्होंने यह मकान खरीद ही लिया, सोचा एक बार तो बला टले। बाद की बाद में देखेंगे। समस्या आएगी तो कुछ समय बाद वापस बेच देंगे। वर्तमान मकान मालिक के साथ रहना अब असंभव था। नई परिस्थितियों के हिसाब से श्रीवास्तव साहब अब अपने आपको समझाने लगे थे। यह धर्म है क्या? सबका मालिक एक है, सभी एक परमात्मा की संतान हैं, सभी में उसी का नूर समाया है फिर क्या हिन्दू क्या मुसलमान। डाॅ. निसार अहमद भी तो अकेले पचास हिन्दुओं के बीच में रहते हैं फिर मुझे अपने ही कौम के लोगों के बीच भय कैसा ? वह अपने घर में हम हमारे घर में-इधर मुरली की ताने बजेगी, उधर अल्लाह की अजानें उठेंगी। कोई कैसे भी रहे हमारे बाप का क्या जाता है! कल को कोई हिन्दू पड़ोसी भी तो खराब निकल सकता है। अंधेरा रोशनी जलाने से ही जाता है।
श्रीवास्तव दम्पति ने कुछ ही समय में नया घर जमा लिया। रात अपने घर में टांगें पसारकर श्रीवास्तव बेड पर लेटे तो उन्हें अद्भुत सुकून व शांति मिली जैसे पसीने से तरबतर किसी राहगीर को घने वृक्ष की छांव मिल गई हो, किसी प्यासे को नदी का तट मिल गया हो। ‘एक बंगला बने न्यारा’ गीत उन्हें पहली बार इतना मधुर लग रहा था, उनका अवचेतन मन इसे गुनगुनाने लगा था। सोच रहे थे किराये की जगह किश्त चली जाएगी, कम से कम मकान-मालिक का तो लफड़ा नहीं। राक्षस की तरह हर माह किराया छीन लेता था, तिस पर व्यवहार ऐसा जैसे हम कोई उसके गुलाम हो। ईश्वर ने कृपा करके आज उन्हें भी ‘किरायेदार’ से ‘मकान-मालिक’ के पद पर पदोन्नत कर दिया था। इन्हीं विचारों की उधेड़बुन में उन्हें जब पड़ोस का ख्याल आता तो लगता जैसे आँख में किरकिरी आ गई हो। उन्हें अपने स्वप्नदुग्ध में मक्खी गिरी हुई लगती। उन्होंने एक लम्बी सांस भरी -‘‘हे कृष्ण! अब तुम्ही लाज बचावनहार हो। हमें हमारे पड़ोसियों के ख़ौफ से बचाये रखना, उन्हें सद्बुद्धि देना।’’ शीघ्र ही उन्होंने मंजुला एवं बच्चों को इस घर में रहने के तौर तरीके समझा दिए। पड़ोसी से कब कितना मिलना है, कितनी बात करनी है आदि-आदि। धीरे-धीरे दिनचर्या ढलने लगी थी।
डाॅ. अहमद एक नफीस एवं जहीन इंसान थे, हर एक के लिए उनके दिल में एक विशिष्ट स्वाभाविक अनुराग था। वह एक सच्चे मुसलमान थे, एक सच्चे मोमिन जिनमें नेकी एवं परदुःखकातरता कूट-कूट कर भरी थी। उम्र कोई चालीस के पार होगी, परिवार श्रीवास्तव परिवार के जितना ही था-बीबी आफरीन, बेटा इरफान एवं बेटी कहकशाँ। यहीं सरकारी अस्पताल में मेडिसन विभाग में गत 15 वर्ष से डाॅक्टर थे। अस्पताल में ही नहीं काॅलोनी में भी लोग उनके हाथ एवं हुनर का लोहा मानते थे। अत्यंत व्यवहार कुशल एवं मृदुभाषी थे, पोर-पोर से शिष्टता झलकती थी।
श्रीवास्तव साहब के आने के पन्द्रह-बीस रोज बाद ही डाॅ. साहब एवं आफरीन ने उन्हें विनम्रतावश चाय-पान पर बुलाया था, सोचा दो परिवारों में मुलाकात हो जाएगी। पड़ोसी का दर्जा रिश्तेदारों से भी ऊँचा होता है। किसी भी मुसीबत में रिश्तेदार तो आते-आते आते हैं, पड़ोसी तुरन्त आता है। पर श्रीवास्तव किसी तरह टाल गए। उनके जेह्न में एक ही बात बैठी थी, जितनी दूरी उतनी भली। डाॅ. साहब ने यह सोचकर स्ट्रेस नहीं किया कि अभी व्यवस्थित नहीं हुए होंगे। जिसके जैसे विचार हो, वह वैसा ही हो जाता है। प्रारंभ से ही श्रीवास्तव परिवार एक खड़ूस परिवार की तरह पेश आया परंतु नियति को शायद कुछ और ही लेख लिखना था।
दिसम्बर होते-होते उत्तर भारत में सर्दी जोर पकड़ लेती है। रातें लम्बी एवं दिन छोटे होने लगते हैं। रातें काली अंधेरी हो जाती हैं एवं बहुत सर्दी के दिनों में मोहल्ले सुनसान हो जाते हैं। आदमी तो क्या रातभर भौंकने वाले कुत्ते भी इधर- उधर दुबक जाते हैं। यह सर्दी भी ऐसी ही थी।
रात करीब एक बजे यकायक मंजुला चीख मारकर उठी। सामने देखा तो एक लम्बा काला नाग कमरे से सरपट तेज गति एवं टेढ़ी चाल से निकल रहा था। सांप ने मंजुला के पांव को डस लिया था, काटने का निशान स्पष्ट था। बौखलाकर श्रीवास्तव साहब जगे, बच्चों को भी तुरन्त दूसरे कमरे से तेज आवाज देकर बुलाया गया। सभी भागे चले आए। घर में कुहराम छा गया। मंजुला के मुंह से झाग निकलने लगे एवं आँखें उनींदी होने लगी। श्रीवास्तव साहब की चतुर आँखों ने आगत विपत्ति को पल भर में भांप लिया पर करे तो क्या करे। मंजुला जोर-जोर से चिल्ला रही थी ‘‘कुछ करो, नाग खा गया है।’’ श्रीवास्तव को कुछ नहीं सूझ रहा था, उनकी आशा का दीपक टिमटिमाने लगा। मरता क्या न करता, ‘हे कृष्ण! हे कृष्ण!’ करते हुए डाॅ. अहमद के घर की ओर भागे।
विपत्तिकाल का धर्म, आनंद अथवा साधारण समय का धर्म नहीं होता। समय, काल एवं परिस्थिति सदैव नये धर्म का सृजन करते हैं। उन्होंने तेज आवाज लगाकर डाॅ. अहमद को जगाया। डाॅ. अहमद बिना समय गंवाये उनके घर पहुँचे, तुरन्त स्थिति पर नियंत्रण किया। काटने वाले स्थान पर चाकू से खून निकाला गया, घर से लाकर कुछ जीवन रक्षक इंजेक्शन लगाए, पांव के ऊपर कस कर पट्टी बांधी। अस्पताल इमरजेंसी विभाग में उन्होंने दवाइयाँ आदि की व्यवस्था करने के लिए फोन किया एवं स्वयं अपनी गाड़ी में मंजुला, श्रीवास्तव साहब एवं आफरीन को साथ लेकर अस्पताल आए। आनन-फानन इलाज की व्यवस्था की गई। डाॅ. अहमद का स्वयं किसी रोगी को लाना बहुत बड़ी बात थी। उपस्थित सभी डाॅक्टर सेवा-सुश्रूषा में लग गए। श्रीवास्तव अर्धविक्षिप्त से एक ओर खड़े ‘हे कृष्ण! हे कृष्ण!’ … दोहराये जा रहे थे। रंज और तकलीफ में प्राथनाएँ ही आश्रय होती हैं।
दूसरे दिन सुबह स्थिति पूरे नियंत्रण में थी। डाॅ. अहमद कड़कड़ाती सर्दी में स्वयं चार घण्टे अस्पताल रहे। कोई अन्य रोगी होता तो शायद इतना समय देना असंभव था, पर यहां तो वो पडा़ेस के धर्म से बंधे थे। दीपक अपने आस-पास अधिक रोशनी देता ही है।
श्रीवास्तव साहब अस्पताल में किंकर्तव्यविमूढ़-से खड़े थे। उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। जिस व्यक्ति, परिवार के बारे में उन्होंने इतने भ्रम पाले, वह तो जीवनरक्षक निकला। भक्त गजराज के पांव को मगरमच्छ ने पानी में खींचा तब उसकी पुकार पर कृष्ण नंगे पाँव भगे थे, यहाँ डाॅ. अहमद कृष्ण बनकर आए थे। श्रीवास्तव साहब की सारी धारणाएँ एक पल में ढह गई। धर्मांधता का बुखार पलभर में उतर गया। उनकी आत्मा उनको धिक्कारने लगी। जिस आदमी का हृदय इतना निष्कपट, इतना पवित्र एवं इतना सदय है, जो इंसान नहीं साक्षात् देवता है, उसके बारे में मैंने कैसे-कैसे कलुषित विचार पाल रखे थे। वह स्वयं अपने आपको हिकारत एवं हेय दृष्टि से देखने लगे। अब वे अपने आपको अपराधी महसूस कर रहे थे। उनकी अपमानित, ग्लानित, पराजित आत्मा उनसे अनेक प्रश्न कर रही थी। निःसंदेह आज डाॅ. अहमद ने स्थिति पर नियंत्रण नहीं किया होता तो उन्हें मंजुला की अरथी ही देखनी पड़ती।
तीसरे दिन शाम तक मंजुला एकदम ठीक हो गई एवं उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। श्रीवास्तव के भीतर अब धर्म का नया अंकुर फूट चुका था। उन्हें अच्छी तरह से समझ में आ गया था कि संसार का सबसे बड़ा मजहब है ‘इंसानियत’। जिसमें इंसानियत है वही धार्मिक है और जिसमें इंसानियत नहीं है वह सबसे बड़ा अधार्मिक व्यक्ति है।
श्रीवास्तव साहब को आज पहली बार सही ‘नसीहत’ मिली थी। अब वो एक नये अहोभाव से भर गए थे, आज समस्त अस्तित्व उन्हें महारास करते नजर आ रहा था।
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20.01.2002
