यक्षप्रश्न

रात के सीने में कितने राज होते हैं? 

रात सोने तक कैलाश ने किरण को नहीं बताया था कि अलसुबह क्या होने वाला है? 

कुछ देर पहले उन्होंने तीन बजे का अलार्म भरा तो किरण को हैरानी अवश्य हुई। इससे पहले वह कुछ पूछती स्वयं कैलाश ने उसे बता दिया कि तड़के आकस्मिक निरीक्षण पर उन्हें जेल जाना है। इस बार ऊपर से भी हिदायत थी कि सारी बातें गोपनीय रखी जाएं। बात एक कान से चार कान तक जाने में कितना समय लगता है। चार कान की बात ब्रह्मा भी नहीं छुपा सकते। 

तड़के जो कुछ होने वाला था उसी की तैयारी में वे दिन भर व्यस्त रहे। दिन भर फोन पर उच्चाधिकारियों के निर्देश आते रहे। शाम सभी सम्बन्धित लोगों ने रिहर्सल किया। कैलाश ने सबको समय पर आने के निर्देश दिये एवं जीप में बैठकर घर.चले आए। 

चादर मुँह पर ओढ़कर उन्होंने किरण को ‘गुडनाइट’ तो कह दिया पर नींद उनकी आँखों से कोसों दूर थी। सिर के नीचे दोनों हथेलियाँ रखे वे शून्य में झाँकने लगे थे। कमरे के अंधकार से भी गहरा अंधकार उनके हृदय में घुटने लगा था। सत्य जानते हुए भी उन्हें कल असत्य का साथ देना होगा? कर्तव्यों के नागपाश में जकड़ा सरकारी अधिकारी कर भी क्या सकता है? एकबारगी उन्होंने सोचा भी कि नौकरी से इस्तीफा देकर इन सारे पाशों को काट डालूँ पर इसकी परिणिति इससे भी बुरी होती।गृहस्थी के नागपाश इससे अधिक भयानक थे। 

उन्होंने मुड़कर किरन के कंधे पर हाथ रखा। किरण सो चुकी थी लेकिन इस स्पर्श में भी उन्हें कोई दुःख बाँटता नजर आया। 

रात बढ़ने लगी थी। उनकी आँखें भी अब उनींदी होने लगी थी।

गत तीन वर्षो से कैलाश लखनऊ केन्द्रीय कारागृह में अधीक्षक पद पर तैनात थे। नौकरी करते हुए उन्हें बीस वर्ष होने को आए। इस दरम्यान छः-सात जगह तैनातियाँ हुई पर यहाँ के अनुभव बिल्कुल अलग थे। राज्य की राजधानी में उनकी पहली तैनाती थी। पहली बार अनेक सफेदपोश अपराधियों से रूबरू होने का मौका मिला। अजगर की तरह लाखों-करोड़ों निगल जाने वाले सफेदपोश अपराधी, चेहरे पर चिंता एवं ग्लानि का कोई चिन्ह तक नहीं। दो सौ रुपये की जेब काटने वाले गरीब को भी वही सजा एवं करोड़ो रुपये हजम कर जाने वालों को भी वही सजा। इंसाफ जो चंद कानूनी लफ्जों का गुलाम है, पैसों का गुलाम है,झूठे गवाहों का गुलाम है।

उनकी सोशियल लाइफ न के बराबर थी। शून्य सामाजिक जीवन। कई बार वे अपने जीवन के बारे में सोचते तो स्वयं को सरकारी वर्दी की जंजीरों में जकड़ा एक गुलाम पाते। अपने हमवय अन्य लोगों से तुलना करते तो लगता जेल वालों को कोई रेस्पॉन्ड नहीं करता है। सरकारी आवास जेल परिसर में होता। यहाँ मिलने कौन आये? अपराधियों के रिश्तेदार तक चारों तरफ देखकर मिलने आते थे। अपने परिचितों को उन्होंने कई बार कहा भी पर वो दरकिनार कर जाते। कई बार लोग मजाक बनाते, ‘कैलाश जी! ईश्वर न करे आपसे मिलने आना पड़े।’ यहाँ तक कि जेल से छूटे हुए कैदी भी बाजार में अथवा किसी समारोह में देख लेते तो तोते की तरह आँख फेर लेते। उनसे मिलने का अर्थ था अपने काले इतिहास में झाँकना एवं आसपास खड़े लोगों को अगवत करवाना कि वे जेल होकर आये हैं। समाज के सबसे बुरे वर्ग को संभालने पर भी लोगों की नजरों में बुरे। कई बार वे अपनी तुलना उस हरिजन से करते जो शहर की गंदगी दूर करते हुए भी सामाजिक रूप से कितना उपेक्षित होताहै। 

इस जेल में हर तरह के अपराधी थे। चोर, सेंधमार, उठाईगिरे, बलात्कारी, खूनी, आर्थिक अपराधी एवं जाने क्या-क्या। सब एक थाली के चट्टे-बट्टे। उनके सामने डर के मारे शरीफ बनते एवं आँख से दूर होते ही वही धमाल। सश्रम कारावास होते हुए भी शाम को कैदी क्या करें? उनकी ऊर्जा बहुधा नकारात्मक राहों को पकड़ती। खटपट, मारपीट, गुंडागर्दी यहाँ की रोजमर्रा का हिस्सा होता। रातों में कई बार हमयौनिक नजारे होते। अधिकारियों के पास आँखें मूंदने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होता। ऊर्जा  अपना रास्ता लेगी। वुमेन सेल अलग से बने होते।वहाँ सिर्फ औरते होती। वे भी पुरुष अपराधियों से कम नहीं होती। यहाँ वायलेंस तो कम होता पर एक दूसरे के प्रति ईर्ष्या एवं नीचा दिखाने का भाव अधिक होता। जेल आकर भी मूल वृत्तियों से निजात कहाँ? इनमें भी हर तरह की अपराधी होती। एक औरत पिछले माह आयी थी, उसने अपने पति का तलवार से वध कर टुकड़े-टुकड़े किये एवं बाद में एक टुकड़े को भूनकर खा गई। कई बार तो लगता जो जितना अच्छा है उसके बुरे होने की सम्भावना उतनी ही अधिक होती है। नारी करुणा, स्नेह एवं वात्सल्य का आगार है पर कुण्ठित होकर कितनी विकराल बन जाती है। 

इन सभी कैदियों को ठीक करने का एक ही कारगर तरीका होता‘सोलीटरी कनफाईनमेंट’ अर्थात् एकान्त कारावास। सात दिनों में शातिर अपराधी तक टूट जाते। समूह में रहना इंसान की फितरत है, अकेले कुछ दिनों में ही वह टूट जाता है। कई अन्य तरीके भी प्रचलन में थे जैसे बेड़ियों में डालना, पिटाई करना, उसके साथी अपराधियों से थप्पड़ लगवाना आदि-आदि। इन दिनों मानवाधिकार वाले पैनी नजर रखते अतः अहिंसक तरीके ही अधिक प्रयुक्त होते। कैदियों की नजरों में अधिकारी कंस अथवा रावण जैसे होते। यह इमेज प्रबंधन में तो कारगर होती लेकिन वैयक्तिक स्तर पर मन को कचोटती।

कैलाश ने अपने जीवन में अनेक कैदी देखे पर बालकिशन जैसा एक भी नहीं देखा। गत सात वर्षों से वह इसी जेल में था। अन्य कैदियों से बिल्कुल अलग। उपाध्याय ब्राह्मण था, सभी उसे पण्डित कहते। पतला शरीर, लम्बा कद, तीखी नाक, झक धवल बत्तीसी एवं भव्य भाल जिस पर वह नित्य तिलक लगाता। उसके व्यक्तित्व में एक विशिष्ट दर्प एवं व्यवहार में असाधारण गरिमा थी। वह एमए पास था। उसे रिकार्डस्, स्टाॅक एवं कैदियों की उपस्थिति का काम करना होता था। काम में उसने कभी कोताही नहीं बरती। उसके सटीक,  चमत्कृत निर्णयों की सर्वत्र सराहना होती। जेल के कानून कायदे अब तक उसे कण्ठस्थ थे। 

उसकी दिनचर्या भी नियमित थी। सुबह समय पर उठना, कसरत करना एवं स्नान आदि कर गीता पाठ करना उसकी दैनिक आदतों में शुमार था। संस्कृत के श्लोक ऐसे धाराप्रवाह बोलता कि सुनने वाले दंग रह जाते। सुबह उसके श्लोक जेल में गूंजते तो वह अपराधशाला कुछ समय के लिये मंदिर बन जाती। 

कुछ दिन पूर्व कैलाशअलसुबह आकस्मिक निरीक्षण पर जेल आये थे। तब पण्डित पद्मासन लगाकर गीता पाठ कर रहा था……ऽनन्याष्चिंतयंते मां ये जना पर्युपासते तेषाम् नित्याभियुक्तानाम् योगक्षेमं वहाम्यहम्….। कैलाश के पाँव वहीं रुक गये। कितना मधुर स्वर था, कितने स्पष्ट उच्चारण। थोड़ी देर बाद पण्डित उठा, आँखों पर हाथ मला एवं कंधे से त्रिवली तक आती जनेऊ को दोनों हाथों से ऊपर-नीचे घुमाया तो उसकी नजर कैलाश पर पड़ी। उन्हें देखते ही पण्डित चौंका, हँसकर बोला, ‘गुडमोर्निंग सर! आज इतनी सुबह कैसे आना हुआ ?’ 

‘बस ऐसे ही निरीक्षण करने चला आया।’ आज आँख जरा जल्दी खुल गयी। 

‘कहीं शक तो नहीं हो गया कि हममें से कोई भाग जायेगा।’ पण्डित मुस्कराते हुआ बोला। 

‘हरगिज नहीं। जहाँ तुम्हारे जैसे कानूनों के रखवाले बैठे हों, वहाँ ऐसा होना असंभव है। फिर इंसान कब तक और कहाँ तक भागेगा पण्डित ? बाहर की बेड़ियाँ अंदर की बेड़ियों से कम कठोर है क्या? सारा संसार कैदखाना है, बस बेड़ियों का रूप अलग है।’ कैलाश दार्शनिक अंदाज में बोले।

पण्डित कैलाश के दर्शन की ऊँचाइयाँ जानकर हतप्रभ रह गया। 

‘सर! आपको तो दर्शनशास्त्र का प्रोफेसर होना चाहिये। बहुत गहरी पकड़ है आपकी।’ पण्डित अब तक गंभीर हो चुका था। 

‘तुम क्या कम हो पण्डित! भला भगवद्गीता से उच्चतर दर्शन क्या हो सकता है? अच्छा, यह तो बताओ अभी तुम जो श्लोक पढ़ रहे थे ऽनन्याष्…., उसका क्या अर्थ है?’ कैलाश अब मात्र जिज्ञासु थे। 

पण्डित के भव्य भाल पर गांभीर्य, चिंतन एवं विवेक की त्रिवली खिंच गई। कुछ रुक कर बोला, ‘जो नित्य मेरा चिंतन करते हैं, मुझमें गहरी आस्था रखते हैं….. उनके नित्य प्रतिदिन के कार्यो में, तनावों में, अवरोधों में………मैं उनकी ऐसे रक्षा करता हूँ जैसे चिमनी जलती हुई बाती की करती है।’ 

बहुत गंभीर अर्थ था पर कैलाश कुछ और कुरेदना चाहते थे। वैज्ञानिकों के विचार-सर में कंकर डालने से ही उनके विचार वर्तुलों की विशालता का आनंद लिया जा सकता है। 

‘पण्डित! क्या तुम्हे लगता है कि भगवान सही एवं सच्चे लोगों की इस तरह रक्षा करते हैं? कितने बेगुनाह, निरपराध जेल में सड़ते रहते हैं, प्रभु उनकी रक्षा के लिए क्यूँ नहीं आते?’ कैलाश बोले।

‘अपने कर्मबंधन तो सभी को काटने पड़ते हैं सर! ईश्वर का सहारा नाव में पाल की तरह है। इस दुस्तर नदी के प्रवाह में उसकी कृपा मिल जाये तो हम नदी सरलता से पार कर लेते हैं। हम हमारे भाग्य को नहीं बदल सकते, हमारी जीवन यात्रा को सुगम अवश्य कर सकते हैं।’ 

‘लेकिन उस ईश्वर की आराधना करना क्या उचित है जो हमें इतने दुःख एवं कष्ट देता है?’ 

‘सुख और दुःख तो हमारे विचारों के रचे हुए हैं सर! सत्य की राह में लोगों ने घर फूँक दिये, कितनी तकलीफें पायी, बेशुमार कष्ट उठाये पर उनके कष्ट एवं त्याग समाज के दर्द की औषधि बन गये। उनके विचारों के अमृत ने संसार के हलाहल को नाकारा कर दिया। वे आत्म शक्तियों से स्फूर्त देवपुरुष थे। जिस आत्मसुख, आत्म उपलब्धि तक वे पहुँचे उसके आगे भला इन तुच्छ शारीरिक दुःखों की क्या प्रासंगिकता है? परमात्मा अपने सुपात्र भक्तों के ही आत्म सुख की राह प्रशस्त करता है। जिन्हें संसार दुःख समझता है वह तो उनकी मंजिल का मार्ग है।’ कहते-कहते पण्डित की आँखें एक विशिष्ट दर्प से चमक उठी। 

कितना सटीक उत्तर था उसका। कैलाश ने कलाई में बंधी घड़ी की ओर देखा, पण्डित से हाथ मिलाया एवं आगे चले गये। 

पण्डित के जवाब ने उनके मन में उथल-पुथल मचा दी। ‘स्ट्रेस मैनेजमेंट’ यानि तनाव प्रबंधन में  आध्यात्मिकता का पुट आ जाये तो मनुष्य कठोर तनाव में भी रास्ता बना लेता है।

कैलाश मनुष्य को सर्वोपरि मानते थे। जेल को उन्होंने सुधारगृह बना दिया था। उनकी कार्यशैली अन्य अधिकारियों से भिन्न थी। कठोर प्रशाशन करते हुए भी कई बार उन्हें लगता कि भेड़-बकरियों एवं मनुष्य को रखने के तरीके में अंतर होना चाहिए। मनुष्य आखिर मनुष्य है। उसमें बुद्धि है, विवेक है, विकास की सम्भावनाएँ हैं। जेल में उन्होंने कई बार प्रवचन, योग, नाटक एवं अन्य कैम्प्स इत्यादि करवाये थे। अपने गहरे अनुभव से उन्होंने जान लिया था कि जन्म से कोई अपराधी नहीं होता। उसे अपराधी बनाता है उसका परिवेश, वातावरण एवं संस्कार। परिवेश एवं परिस्थितियों की नीवों पर ही मनुष्य के व्यक्तित्व की इमारत खड़ी होती है। तथाकथित सुसंस्कृत लोगों का जन्म भी अगर इन अंधी गलियों में होता तो वे भी ऐसे ही होते। क्यूँ मंदिर का तोता राम-राम करता है, क्यूँ बुरे व्यक्ति के घर का तोता गालियाँ देता है? पशु-पक्षी तक परिवेश के प्रभाव को नहीं नकार सकते। गलत परिवेश में पैदा होने वालों पर दोहरा जुल्म हो जाता है। उनका बचपन विकृत हो जाता है , यौवन अपराधी। सजा देने वाले जज उनकी इस पृष्ठभूमि का कभी आकलन नहीं करते। कानून का काला चश्मा उन्हें मनुष्यता का धवल पक्ष देखने ही नहीं देता। 

कैलाश, पण्डित के व्यक्तित्व एवं व्यवहार से अत्यधिक प्रभावित थे। एक शाम वह रेकॉर्डशीट देने आया तो उन्होंने उसे सामने कुर्सी पर बैठने को कहा। उन्होंने घंटी बजायी एवं सिपाही को दो चाय भेजने के लिये कहा। पण्डित के मन में आशंकाओं के बादल छाने लगे। कुछ देर औपचारिक बातें हुई। इसी दरम्यान सिपाही चाय रखकर चला गया। चाय के सिप लेते हुये उन्होंने पण्डित से वार्ता प्रारम्भ की। कैलाश की आँखों में अनेक प्रश्न तैरने लगे थे। 

‘पण्डित! मुझे जेल में कार्य करते हुए वर्षों हो गये। असंख्य अपराधी मेरी आँखों के आगे से गुजर गये। अब तो ये आँखें भीड़ में भी अपराधी को ढूंढ लेती है। लेकिन जब भी मैं तुम्हें देखता हूँ, स्वयं अपराध बोध से ग्रस्त हो जाता हूँ। यह स्थान क्या तुम्हारे जैसे सज्जन लोगों के लिये हैं? ….. पण्डित! बुरा न मानो तो मैं यह जानना चाहूँगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि तुम्हें अपने सगे भाई का खून करना पड़ गया?’ 

पण्डित को पका बालतोड़ छू गया। स्मृतियों के शांत तालाब में किसी ने भारी पत्थर डाल दिया। उसकी आँखें अतीत में झाँकने लगी। वर्षो पुराना घाव हरिया गया। आँखों की कोर से आँसू हटाते हुए  बोला, ‘सर! खून तो मैंने किया ही नहीं। मैं ईश्वर की शपथ उठाकर कहता हूँ कि यह अपराध मैंनें कभी नहीं किया। मेरा छोटा भाई तो मेरी आँख का तारा था, भला मैं उसका खून क्यूँ करता?’ कहते-कहते उसका गला रुंध गया। 

‘फिर ऐसे कैसे हो गया पण्डित?’ कैलाश की आँखें फैलने लगी थी। 

‘दरअसल यह सजा मैंने सत्य एवं न्याय की राह में पायी। मेरी गाँव के ठाकुर से बिल्कुल नहीं बनती थी। वह एक दुर्दांत,क्रूर आततायी था। किसानों, खेतिहरों का भरपूर शोषण करता। भोले-भाले किसानों को बहलाकर अथवा डर बताकर उनकी जमीनें हड़प लेता। कइयों की जमीन पर उसने अतिक्रमण कर लिये। मैं गाँव में पढ़ा-लिखा व्यक्ति था।गाँव वाले मेरे पास गुहार लेकर आते। मैं उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास करता। उनकी उलझनें, कानूनी पेचीदगियाँं आदि दूर करने में उनकी मदद करता। ये सभी बातें ठाकुर के हितों एवं दुष्प्रयोजनों पर अंकुश लगाती। गाँव वाले मुंझे मसीहा मानते पर ठाकुर के लिये मैं आँख का काँटा बन चुका था। उसे मैं फूटी आँख नहीं सुहाता। 

एक बार ठाकुर ने धोखे से एक काश्तकार की जमीन पर अतिक्रमण कर लिया। उस गरीब ने अपनी पगड़ी ठाकुर के चरणों में रख दी। ‘मालिक’, ‘अन्नदाता’ जैसे ऊँचे शब्दों की दुहाई दी पर अहंकार एवं उन्माद से भरे ठाकुर ने उसकी एक न सुनी। थक-हारकर वह मेरे पास आया। उसे लेकर मैं जिलाधीश के पास गया। उन्होंने पटवारी को बुलाकर लताड़ा एवं काश्तकार को उसकी जमीन वापस दिलवायी। उसके बाद तो गाँव में मेरा सिक्का जम गया। एक से दो एवं दो से तीन सबको अपने हक मिलने लगे। ठाकुर जल भुनकर राख हो गया। बस यहीं से मेरे बुरे दिनों का श्रीगणेश हो गया। 

इसी दरम्यान मेरे छोटे भाई का प्रेमविवाह हुआ। यह प्रेम उनके बीच कब हुआ एवं कब पनपा, इसकी मुझे भनक भी नहीं लगी। विवाह के कुछ रोज बाद मेरे अनुज को पता चला कि उसकी पत्नी ठाकुर की रखैल थी। ठाकुर ने ही हमें जलील करने के लिए यह चाल चली थी। 

एक रोज ठाकुर ने मेरे अनुज को गढ़ में बुलवाया। वह वहाँ पहुँचा तो उसकी पत्नी ठाकुर की गोद में पड़ी थी। वह डायन जले पाँव की बिल्ली की तरह अपना धर्म बदलती थी। तैश में मेरे भाई ने ठाकुर को बुरा भला कहा। साँप की भाप भी बुरी। ठाकुर फुफकार कर उठा। मेरे अनुज की नसों में लहू उफन आया। कलेजे में हल जुत गये। सामने खड़े मौत के जबड़े को वह देख न सका। ठाकुर के इशारे पर गढ़ से उतरते ही उसके कारिंदे ने तलवार के कठोर प्रहार कर मेरे अनुज को मौत के घाट उतार दिया। खबर मिलते ही मैं दौड़ा-दौड़ा ठाकुर के गढ़ पहुँचा। खून से सनी तलवार लिए कारिंदा वहीं खड़ा था। मैंने उसके हाथ से तलवार झपटी। मेरी आँखों में खून उतर आया था। कारिंदा धावक की गति से चिल्लाता हुआ दौड़ा,…. इसने अपने भाई का खून कर दिया है एवं मुझे मारना चाहता है। इसी दरम्यान पुलिस आ गई। ठाकुर के कारिंदों ने गवाही दी कि खून मैंने ही किया है। मेरी अनुजवधु ठाकुर की रखैल ने भी मेरे खिलाफ गवाही दी। गाँव के लोग डर के मारे थाली के बैंगन की तरह ठाकुर की तरफ लुढ़क गये। पूरे गाँव में किसी ने ठाकुर के विरुद्ध गवाही नहीं दी। मसीहा मुजरिम बन गया। मेरा पूरा परिवार तबाह हो गया। पत्नी घुलकर काँटा हो गई। खेती खसम सेती। बाद में खेतों पर भी ठाकुर ने अतिक्रमण कर लिया। हताश मेरी पत्नी एवं जवान पुत्री गाँव छोड़कर लखनऊ चले आये। दोनों जस-तस घर के काम कर गुजारा करते हैं। मैंने कोर्ट में बहुत कहा पर गवाहों एवं सबूतों की ताकत पर टिका कानून मुझे इंसाफ नहीं दे सका। मेरी बीवी ने गहने बेचकर कानूनी लड़ाई लड़ी पर हर जगह मेरी हार हुई। आप जानते ही है बीस दिन बाद अगले माह के पहले सोमवार को मुझे फाँसी लगने वाली है। ब्लैक वारंट आ चुका है।’

इससे आगे सुनने का साहस कैलाश में नहीं था। वे ऑफिस छोड़कर बाहर चले आये। होनी अटल है। नियति के संकेतों की श्रृंखला में बंधा इंसान कर भी क्या सकता है? मनुष्य दैवमृगया नहीं तो और क्या है? सुख के पहाड़ पर खड़ा इंसान कब दुर्भाग्य की अंधी खाइयों में गिरता है, पता ही नहीं चलता। 

समय-सरिता दिन-रात के बीस मोड़ लेते हुए यूँ बह गयी। 

सुबह तीन बजे उठकर कैलाश तैयार हुए, वर्दी पहनी, कैप लगाई एवं बाहर आकर जीप में बैठ गये। ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट की। जेल परिसर उनके घर से करीब तीन सौ कदम दूर था। बारिश के दिन थे। घने काले बादलों में चाँद छुप-सा गया था। बादलों का शोर दिल दहला देता था। 

कल शाम ही पण्डित की पत्नी एवं बेटी उससे मिलकर गयी थी। दोनों बिलख-बिलख कर रो रहे थे। कैलाश वहीं खड़े थे। उनका कलेजा फटने लगा था। यह फंदा पण्डित के गले में नहीं, तीन निर्दोष लोगों के गले में पड़ने वाला था और यह कार्य कैलाश के नेतृत्व में होना था। 

कैलाश जेल पहुँचे। जेलर ने बताया कि सारी तैयारियाँ हो चुकी है। डाॅक्टर, जल्लाद, मजिस्ट्रेट, सभी सम्बन्धित अधिकारी एवं सिपाही एक मनुष्य का अंत करने के लिए समय पर पहुँच गये थे। पण्डित की अंतिम इच्छा कैलाश ने ही पूछी। मन बिलख-बिलख कर रोना चाहता था पर कर्त्तव्य के बाँध आँसुओं को रोके हुए थे। अंतिम इच्छा के रूप में उसने यही कहा, ‘सर! अपना दिल भारी मत करना। मैं जानता हूँ आप अत्यन्त संवेदनशील है। मेरी अंतिम इच्छा यही है कि मुझे फाँसी पर लटकाते समय आपकी आँखों से एक भी आँसू न निकले। मैं आपके चेहरे पर कर्त्तव्य का दर्प देखना चाहता हूँ।’

कैसी अद्भुत अंतिम इच्छा थी उसकी। सत्पुरुष मरते हुए भी कुछ देकर जाते हैं। संसार से पूर्णतः उऋण होकर जाना ही शायद उन्हें शोभा देता है।

काॅरीडोर से होते हुए सभी फाँसी स्थल के नीचे आकर खड़े हो गये। काॅरीडोर से वहाँ तक कुछ सीढ़ियाँ थी। ऊपर जाने से पूर्व पण्डित कुछ पल के लिये रुका। कैलाश की ओर देखकर बोला, ‘क्या आपको मेरी आँखों में जरा भी भय नजर आता है। सौ जन्म भी मिले तो सत्य की राह में मरना चाहूँगा।’

कैलाश के कानों में उबलता हुआ शीशा पिघल गया। शरीर निस्पंद हो रहा था। धमनियों में रक्त जम चुका था। 

पण्डित शांत भाव से चल कर फाँसी के तखते पर खड़ा हो गया। आँखें ऊँची कर उसने ‘ओम्’ का उच्चारण किया। उसके दोनों हाथ पीछे से बंधे थे। जल्लाद ने मुँह पर काला कपड़ा लगाया एवं गले में फंदा कसा। कैलाश के साथ खड़े मजिस्ट्रेट ने हाथ नीचे कर संकेत दिया। लीवर खिंचते ही पलभर में एक जीवित इंसान मृत्यु के झूले पर झूल गया। क्षणभर के लिये आकाश नीचे गिर गया। दीवारों के पाषाण तक भय से रोमांचित हो उठे।

कैलाश ने जेलर को बाकी सारी औपचारिकतायें पूरी करने के निर्देश दिये। 

तेज गति से चलकर वे बाहर आये। उनमें एक पल ठहरने की भी हिम्मत नहीं बची थी। अपनी सारी शक्तियाँ तो उन्होंने पण्डित की अंतिम इच्छा पूरी करने मे लगा दी थी। उसके शब्द अब भी उनके कानों में गूंज रहे थे, ‘सर! मेरी अंतिम इच्छा है कि आपके एक भी आँसू नहीं निकले….।’ 

ऊपर आसमान काले बादलों से भर गया था। तेज बूंदे टपकने लगी थी। गिरती हुई बूंदें मानो कैलाश से कह रही थी, ‘तुमने आज मनुष्यता को फंदे पर लटकाया है। तुम आँसू नहीं बहा रहे हो तो क्या, अभी आसमान इतना निष्ठुर नहीं हुआ है।’ 

यह फंदा समीचीन यक्ष-प्रश्न के गले में भी लटक रहा था। क्या फाँसी की सजा जायज है? अगर आँख के बदले आँख एवं हाथ के बदले हाथ लेने का सिलसिला जारी रहा तो यह दुनिया अंधी, लूली हो जायेगी। अगर जान के बदले जान ली गयी तो मनुष्यता का ही अंत हो जायेगा। मनुष्य फिर मनुष्य में कब झांकेगा? मनुष्य के विकास की संभावनाएं फिर कब जागृत होगी? 

कहीं दूर तेज बिजली कड़की थी। ड्राइवर कह रहा था, ‘सर! बादल फट गया है।’

यह प्रकृति का क्रोध था अथवा उसके भर आये हृदय का क्षोभ, इतना सोचने का विवेक अब कैलाश के पास कहाँ बचा था?

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17.09.2005

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