गुलाटी साहब जब भी आते, घर में बहार आ जाती। जैसे चन्द्रमा के उदय होने से रात रोशन होती है, उनके आते ही सबके चेहरे प्रसन्नता से खिल जाते। दुनिया के रंजोगम अब इस कदर बढ़ गए हैं कि हर घर को मुस्कुराहट भरे चेहरों का ही इंतजार है।
उन्हें सही अर्थों में विनोदवेत्ता कहना चाहिए, उनकी हर बात में विनोद टपकता। स्वभाव से रसिया थे, बात से बात निकालते, रोते हुए को हँसा देते। घर का माहौल जब कभी गमगीन अथवा गंभीर होता एवं सौभाग्य से उस वक्त गुलाटी साहब आ जाते तो लगता जैसे सूखे में सावन आया हो। जब भी आते उनके साथ रस की फुहार आती।
गुलाटी साहब हमारे घर से थोड़ी दूर हमारी ही काॅलोनी में रहते थे। स्वयं यूनिवर्सिटी में रसायनशास्त्र के प्रोफेसर थे एवं पत्नी आकांक्षा सरकारी अस्पताल में डाॅक्टर। ऐसी जोड़ी तो हजारों में एक दिखती है, लोग देखकर जलते थे। विद्वान लोगों के हिस्से में लक्ष्मी कभी भूलकर ही आती है। भृगु महाराज ने लक्ष्मीकांता विष्णु की छाती पर लात क्या मारी, तब से लक्ष्मी का रूखापन विद्वानों एवं सज्जनों के प्रति आज भी बदला नहीं है। लेकिन गुलाटी साहब की तकदीर विधाता ने सोने की स्याही से लिखी थी, यहां तो मानो लक्ष्मी-सरस्वती दोनों आकर पसर गई हों। दोनों को विरासत में अकूत संपदा मिली थी एवं प्रतिमाह दोनों के वेतन की मोटी रकम नदी के अनवरत प्रवाह की तरह बहती थी। आकांक्षा भी शिक्षा, रूप-गुण में गुलाटी साहब के बराबर थी तिसपर मृदु व्यवहार एवं प्रखर बुद्धि उसके रूप में चार चांद लगाते। शादी किये सात वर्ष हुए, परिवार अब दोगुना था, बड़ा लड़का अभिजीत पाँच वर्ष का एवं उससे तीन वर्ष छोटी बेटी मृदुला। बच्चे उनके जीवन में बहार की तरह आए। दोनों ईश्वर की कृपा से मालामाल थे। बस, नजर न लगे ऐसे परिवार को।
मैं अक्सर पत्नी राधा को आकांक्षा का उदाहरण देता। वह जब भी अधिक काम को लेकर उलाहना देती, मैं उसे घेरने के लिए आकांक्षा का हवाला देता, ‘‘देखो! इतनी पढ़ी-लिखी है, सुबह-शाम अस्पताल जाती है, घर का काम भी करती है, प्रैक्टिस भी करती है एवं गुलाटी साहब को भी प्रसन्न रखती है। क्या आसमान सिर्फ तुम्हारे सिर पर ही गिरा जा रहा है? नाम तो हमारा कृष्ण-राधा है पर हकीकत में प्रेम वहाँ बसता है।’’ मेरा उत्तर सुनकर राधा की आँखें लाल हो जाती, तमक कर कहती, ‘‘पराई थाली में घी ज्यादा दिखता है। अपनी बीवी सबको बासी लगती है।’’
‘‘चुप भी करो! डाॅ. आकांक्षा के नाम से तुम्हारा रक्त क्यूं जलता है? किसी से अच्छी बात सीखने में कोई हर्जा है क्या?’’
‘‘तुम गुलाटी साहब से अक्ल क्यूं नहीं लेते? कैसे अपनी पत्नी को सहेज कर रखते हैं, घर के काम में भी कितना हाथ बंटाते हैं, फिर भी मुस्कुराते रहते हैं। पहले तुम उनके जैसे हंसमुख बनो, फिर मैं भी सुधर जाऊंगी। आपको तो शायद मालिक ने पैदा ही रूखा एवं रुआँसा किया है। जरा-सा काम का क्या कह दिया, लगे भाषण झाड़ने। बात तो कहनी ही पड़ती है। शहर में धुआँ बंद करो, राजाजी की आँखें जलती है, यह भी कोई बात हुई? सारे दिन जली-कटी सुनाते हो, जैसे बाँदी ब्याह कर लाये हो।’’
मुझे उसके उत्तर में दम लगता पर पुरुष अपना अभिमान यूं थोड़े छोड़ते हैं। स्वयं को पराजित होते देख सीधा उसके मर्म पर चोट करता, ‘‘अब चुप भी रहो, जबान लड़ाने के अलावा भी तुम्हें कुछ आता है? आकांक्षा का चौथाई भी कमाकर बता दो तो मान जाऊं।’’
बस, इससे आगे उसकी हिम्मत न होती, इसका उत्तर उसके पास न होता। वह विवश चुप हो जाती। वो कौन-सी आकांक्षा की तरह खुद कमाती, जो रोब दिखाती।
आर्थिक परतंत्रता, स्त्री पराधीनता की जड़ है। पुरुष ने सदैव इस कमजोर नस से ही स्त्री को दबाया है। कौन-सी खुशी थी जो राधा ने मुझे नहीं दी पर औरत अपना कलेजा भी निकालकर रख दे तो भी पुरुष का पाषाण हृदय नहीं पसीजेगा।
पिछले कई दिनों से गुलाटी साहब हमारे घर नहीं आए। मैंने सोचा, आज इतवार है, दोनों की छुट्टी है, मैं ही जाकर खैर-खबर ले लेता हूँ। गुलाटी साहब से मिलना तो ‘आम के आम गुठली के दाम’ वाली बात थी। उनसे मिलना भी हो जाएगा एवं उनके विनोदी स्वभाव का आनन्द भी ले लेंगे। खुल के हँसे भी बहुत दिन हो गए थे। अब तक तो उनके पास कई नई बातें इकट्ठी हो गई होगी।
गुलाटी साहब का घर मेरे घर से कोई पचास कदम पर होगा। मैं तुरन्त पहुँंच गया। घर क्या था एक आलीशान बंगला था। बाहर लम्बा चौड़ा गार्डन, तरह-तरह के फूलों से लदे पौधे, रंग-रोगन किये गमले, बीच में फुव्वारा छोड़ती संगमरमर में गढ़ी स्त्री की मूर्ति, जैसे बहिश्त का बाग हो। गार्डन से ही दिखने वाले ड्राईंगरूम की शोभा भी उतनी ही निराली थी। दो बड़े-बड़े सोफा-सेट्स, कीमती लटकते हुए फानूस, फर्श पर कश्मीरी कालीन एवं बड़े-बड़े फूलदान। ड्राईंगरूम के आगे ही एक छह फुट लंबा लकड़ी का नक्काशी किया पगड़ी बांधे चौकीदार, जैसे जीवंत प्रहरी खड़ा हो। इतना शानदार ड्राईंगरूम काॅलोनी में शायद ही किसी का हो। खुदा ऐसे भाग्य सबको दे, पिछले जन्म में गुलाटी ने बहुत पुण्य किये होंगे।
मैं गुलाटी साहब के घर में पहले कई बार आया हुआ था। ड्राईंगरूम खुला पड़ा था, पर वहां कोई दिख नहीं रहा था। मैं सहज रूप से ड्राईंगरूम की तरफ बढ़ा एवं गुलाटी साहब को पुकारने ही वाला था कि बेडरूम से गुलाटी साहब एवं आकांक्षा की तेज आवाजें सुनाई दी। मैंने पदचाप धीरे किए एवं कान तेज। दोनों में बहस क्या हो रही थी, युद्ध के नगाड़े बज रहे थे। नैतिक स्तर पर पड़ोसी के दुःख से मुझे दुःखी होना चाहिए पर न जाने क्यूं यहाँ मुझे सुकून मिल रहा था। सबसे पहली बात तो मुझे यह समझ में आई कि धोती में सब नंगे हैं, सभी मिट्टी के पुतले हैं। दुःख मेरे ही घर में नहीं है, उसका विस्तार सर्वत्र है, यहां तक कि खिलखिलाकर हँसने वाले गुलाटी के यहां भी। राधा ठीक कह रही थी, पराये घर में सुख अधिक दिखता है। सभी लोग अपने बदबूदार गद्दों के ऊपर सफेद चद्दर लगाये हुए हैं। हर फूल में कांटे हैं, सुख कहीं भी संपूर्णता में नहीं है। विधाता का बँटवारा निष्पक्ष है। अगर सुख भोगना है तो उसे उसके दोषों के साथ भोगना पड़ेगा। फूल से उसके कांटे अलग नहीं किये जा सकते। जन्मपत्री में राहु-केतु कहीं तो बैंठेंगे ही।
बेडरूम के अन्दर गुलाटी साहब एवं आकांक्षा के बीच विवाद चरम पर था, बस यूं कहिए जूतियाँ चल रही थी। दोनों अपने-अपने दिल का धुआँ निकाल रहे थे। लोग सही कहते हैं, जो जितना हँसता है उससे कहीं अधिक उसे रोना पड़ता है। इतने बुद्धिमान दम्पति के बीच में मत-मतान्तर ? मैंने तो सुना था विद्या विनय की जननी है। होना तो यह चाहिए था कि इतने वर्षों का सम्बन्ध आत्मिक समरसता एवं इत्मीनान का रूप धारण करता पर यहां तो उल्टा माजरा था। फलों को पक कर जहां रसीला होना चाहिए था, वहाँ सड़ांध आ रही थी। दोनों एक दूसरे पर तर्कों के घूंसे दन रहे थे।
गुलाटी: ‘‘कल रात तुम फिर देरी से आई? मुझे तुम्हारा देर रात पार्टियों में पराये मर्दों के साथ जाना अच्छा नहीं लगता। घर की भी कोई मर्यादा है, बच्चे बड़े हो रहे हैं, लोग क्या सोचेंगे? तुम्हारे प्रमोशन के लिए क्या जरूरी है कि तुम अपने बाॅस लोगों को पार्टियां दो। इन लोगों को मैं अच्छी तरह समझता हूँ। अभी थोड़े दिनों में दाना बिखेरने लगेंगे। दो दिन में सामाजिक प्रतिष्ठा धूल चाटते नजर आएगी।’’
आकांक्षा: ‘‘भाड़ में जाए समाज। लोगों को जो सोचना है, सोचने दो। अगर आप अपने बाॅस लोगों के साथ रात पार्टी पर जा सकते हैं तो मैं क्यों नहीं जा सकती। अगर आपके स्त्री-मित्र हो सकते हैं तो मेरे पुरुष-मित्र क्यों नहीं हो सकते? आप कभी विश्वास नहीं करते, ख्वामख्वाह शक करते हैं। सिर्फ इसलिए कि मैं स्त्री हूँ, मुझे वो करने का हक नहीं जो आप करते हैं। नौकरी के अपने नियम है। अगर ऑफिस के काम से जाना है तो मैं जरूर जाऊंगी, और जिसके साथ जाना है जाऊंगी चाहे वो स्त्री हो या पुरुष।’’
गुलाटी: ‘‘लेकिन सामाजिक मर्यादा एवं बंधन भी तो उतने ही जरूरी हैं, उनकी अनुपालना भी करनी ही होगी। समाज किसी को कोई रियायत नहीं देता। हम भीड़ से अलग खड़े नहीं हो सकते। आज नहीं तो कल लोग जरूर कहेंगे। इस समाज में रहना है तो इसी समाज के नियम मानने पड़ेंगे। यहां रहकर अमेरिका के नियमों के हिसाब से कैसे जिया जा सकता है? आगे बढ़ने की लालसा एवं तृष्णा के चक्कर में हम हमारी संस्कृति से विमुख नहीं हो सकते। जरा-सा बदनाम होते ही जीवन रेत के महल की तरह बिखर जाएगा। ऐसे लोगों को दूर से ही सलाम करो तो अच्छा है।’’ गुलाटी का स्वर काँप रहा था।
आकांक्षा: ‘‘यह कैसा समाज है जो औरतों को कोल्हू की तरह पीस डालना चाहता है। यह समाज है या भूत? अस्पताल में काम करो, प्रेक्टिस करो, घर में काम करो, बच्चे पालो एवं फिर पतियों की गुलामी करो। समाज के नियम उस जमाने के है जब आदमी हल चलाता था एवं औरत घर की चारदीवारी में बंधी रहती थी। तब औरत निपट निरक्षर खूंटे से बंधी गाय होती थी। इतने युगान्तर के बाद कल के नियम, आज कैसे लागू किये जा सकते हैं? अगर औरत का कार्यक्षेत्र बदल गया है तो उसके प्रति समाज को दृष्टि भी बदलनी होगी, आदर्शों एवं स्वातंत्र्य की नई परिभाषा लिखनी होगी। क्या स्वातंत्र्य का अर्थ चारित्रिक हनन है? अपनी आत्मा से ईमानदारी से पूछिए,क्या मेरे वेतन के बिना इतने सुख आप पा सकते थे? सुख सुविधाएँ तो आपको सहर्ष स्वीकार हैं पर बदलने के लिए आप जरा भी तैयार नहीं। नौकरी करने वाले पुरुष में जो गुण आप डाईनेमिज्म के रूप में देखते हैं उसे नौकरी करने वाली स्त्री में क्यों नहीं देखते?’’ आकांक्षा और तीखी होकर बोली।
गुलाटी: ‘‘तुम होश में बात करो। आजकल कुछ ज्यादा ही तेवर चढे़ हुए हैं। तुम्हारे वेतन की अतिरिक्त कमाई आती है तो तुम भी अतिरिक्त सुखों में हिस्सेदार बनती हो। मैं क्या अकेले ही तुम्हारी तनख्वाह हजम करता हूंँ। तुम नौकरी छोड़ दो, मैं सब सम्भाल लूंगा।’’
आकांक्षा: ‘‘तुम नौकरी क्यों नहीं छोड़ देते। मैं सब सम्भाल लूंगी। मेरा भी कोई व्यक्तित्व है, मेरी भी अपनी मानसिक क्षमताएँ एवं मानसिक खुराक है। अगर आप एक निपट, गंवार घरेलू लड़की के साथ ही सुखी रह सकते थे तो एक डाॅक्टर के साथ शादी क्यों की? लड़की तो आपको शो-पीस की तरह पढ़ी-लिखी, कमाऊ चाहिए पर नकेल में बंधी हुई।’’
गुलाटी साहब आकांक्षा के उत्तर से सकते में आ गए थे। ऊपर से नीचे पसीने से तर थे। डाॅ. आकांक्षा के उत्तर सटीक, तर्कसिद्ध एवं सीधी चोट करने वाले थे। बाहर खड़ा मैं सोच रहा था कि जो व्यक्ति हर समय हंसता एवं हंसाता है, क्या उसकी जिंदगी में इतने दुःख है? क्या गुलाटी ज्यादा स्मार्ट तो नहीं बन रहा? कभी खुद के भीतर भी झांककर देखा है उसने?
मैं चुपचाप ड्राईंगरूम से बाहर आया एवं डोर-बेल बजा दी। वक्त की नज़ाकत के अनुरूप यही व्यवहार मुझे उचित लगा। अंदर से गुलाटी साहब एवं आकांक्षा एक कृत्रिम मुस्कुराहट लिये बाहर आए। आकांक्षा तो मुझे नमस्कार कर चाय बनाने चली गई, मैं और गुलाटी वहीं बैठ गए। आज तमाम प्रयासों के बाद भी उसके मुख से मुस्कुराहट गायब थी। ऐसा लग रहा था वो रोना ही चाहते हैं पर मुस्कुरा रहे थे। मुस्कुराहट एवं रुदन के मध्यान्तर पर खड़ा उनका चेहरा उनकी अंतर्वेदना की कहानी कह रहा था। दरअसल मेरा आना उन्हें खल रहा था। मैं स्वयं अपनी स्थिति पहचान रहा था, वक्त का तकाजा देखकर मैंने बात बदलने की कोशिश की।
‘‘आजकल आपके विभाग के क्या हाल हैं? नौकरी कैसी चल रही है?’’ मैंने शांत स्वर में पूछा।
‘‘नौकरी में क्या रखा है, गर्ग साहब! खूब मेहनत करो और गिनकर पैसे लो।’’
‘‘अजी, प्रोफेसरी में ऐसा कहाँ है! आपकी नौकरी तो बादशाही है। चार पांच पीरियड्स लो और मस्त रहो। जवान बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते आप भी जवांदिल रहते हैं। यहां धंधे में तो हर वक्त जान साँसत में रहती है।’’
‘‘अजी वो जमाने गए। अब तो सरकार पूरा निचोड़कर वेतन देती है।’’ गुलाटी ने लम्बी सांस भरते हुए कहा।
‘‘और, मिस सक्सेना के क्या हाल हैं?’’ मैंने अर्थपूर्ण मुस्कुराहट के साथ अन्तिम पैंतरा डाला।
अंतिम बात सुनते ही गुलाटी गुलाच खा गया। माथे पर पुनः पसीने की बूँदें चमकने लगी। चेहरे पर मुहर्रम छा गया। इतने में आकांक्षा ट्रे में चाय लाते नजर आई। गुलाटी ने मुझे तुरन्त पास खींचकर कहा, ‘‘यह नाम भी इस घर में कभी नहीं आना चाहिए, बस ये समझ लो हत्या हो जाएगी।’’ जब तक हमने चाय समाप्त की, गुलाटी का मन एक अकल्पनीय भय से भयभीत था। चेहरा धुले हुए कपड़े की तरह सिकुड़ गया था। दुर्बल आत्मा चेहरे की सारी कांति, स्थिरता एवं तेज हर लेती है।
आदमी कितना ही चतुर क्यों न हो, ईश्वर हर बात पर कादिर है। जाहिर एवं पोशीदा हर चीज से खबरदार है। जो दूसरों को धोखा देते हैं, वो इस बात से बेखबर होते हैं कि वो स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं।
आज से तीन वर्ष पहले शहर की एक होटल के कमरे से, मैंने गुलाटी एवं मिस सक्सेना को देर रात निकलते हुए देखा था। अपने किसी ग्राहक से मिलने मैं वहां गया हुआ था। मिस सक्सेना तीस वर्ष की कुंवारी रूपसी थी एवं गुलाटी के साथ ही उनके विभाग में काम करती थी। वह एक खुले दिमाग की, बिंदास, दबंग महिला थी, गुलाटी साहब उसकी रूप बगिया के भंवरे थे। जब भी मौका मिलता अथवा जब भी डाॅ. आकांक्षा शहर से बाहर होती, दोनों कहीं न कहीं मिल लेते थे। मुझे देखकर गुलाटी की हालत ऐसी थी जैसे कोई कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़ा गया हो। बाद में गुलाटी ने स्वीकार किया कि पिछले कुछ दिनों से वह उसके इश्क में है एवं मुझसे वादा लिया कि यह बात मैं गोपनीय रखूंगा। एक सच्चे मित्र की तरह यह बात मैंने नितांत गोपनीय रखी, यहां तक की मेरी हमराज राधा को भी नहीं बताई। एक तो राधा के पेट में इतनी पाचन क्षमता नहीं थी कि वो इतनी रसभरी बात को पचा सकती, दूसरे फिर मैं आकांक्षा के हवाले से उसे छेड़ता कैसे?
चाय खत्म होते ही गुलाटी साहब ने कहा, ‘‘आओ यार! थोड़ा घूम के आते हैं, अंदर बहुत सफोकेशन है।’’ मैं उसके मन की बेचैनी समझ रहा था। हम दोनों घूमने निकले, कुछ देर तो चुप रहे पर चोर की दाढ़ी में तिनका कहां तक छुपता। गुलाटी साहब ने पुनः उसी प्रसंग को छेड़ा, ‘‘यार गर्ग! आज तो तुमने होश उड़ा दिए। आकांक्षा सुन लेती तो दुर्गत बन जाती।‘‘
‘‘तुम भी कमाल करते हो यार! ये बातें भी कोई कहने की होती हैं, ये तो लाईफ के सिक्रेट्स होते हैं। मैंने तो ऐसे ही विनोदवश पूछ लिया था, आकांक्षा भाभी तो अंदर ही थी।’’
‘‘अरे वो अंदर होती है तब भी उसकी आत्मा बाहर होती है। दीवारों के भी कान होते हैं, थोड़ा समझाकर यार! अगली बार भूल से भी ऐसा मजाक नहीं करना। तुम तो कई बार पांव के नीचे की चादरखींच लेते हो।’’
उसके बाद कई देर तक गुलाटी मेरे बच्चों, उनकी पढ़ाई एवं मेरी गृहस्थी के बारे में पूछता रहा। आज मेरे धंधे के बारे में भी उसने बहुत रुचि ली, यही नहीं अपने एक प्रशासनिक अधिकारी मित्र से मुझे सीमेंट का एक बड़ा ठेका दिलाने की भी बात की। मेरे मुँह को चुप रखने के लिए लड्डू ठूंसने का उसने भगीरथ प्रयत्न किया पर मन में तो यही सोच रहा था, कहां ये कील पांव में चुभ गई, न जाने कहां से यह शैतान की तरह टपक पड़ा।
घर लौटते हुऐ मैं सोच रहा था, आदमी कितने ‘डबल स्टैण्डर्ड’ के साथ जीना चाहता है। अपनी स्त्री को लेकर तो वह इतना पजेजिव है जैसे वह उसकी सम्पत्ति हो। उसकी जरा-सी स्वाधीनता उसके तन-मन में आग लगा देती है। यही नहीं स्त्री के सम्मान के प्रश्न को लेकर आदमी अप्रत्यक्ष रूप से स्त्री की गर्दन पर सवार हो जाना चाहता है, लेकिन स्वयं कभी आत्ममंथन एवं आत्मावलोकन नहीं करना चाहता। उपदेश देना जितना सरल है, आचरण उतना ही कठिन। वर्तमान में नौकरीशुदा स्त्रियों की गृहिणियों से भी अधिक दुर्दशा है। उनकी भूमिका दोहरी है। उन्हें नौकरी भी करनी है एवं अपनी हदें भी पहचाननी हैं। लेकिन आदमी अभी भी पुराने संस्कारों एवं रूढ़ियों में जकड़ा हुआ है। हम स्त्री को नौकरी करने की स्वाधीनता तो देना चाहते हैं, उसकी नौकरी से प्राप्त लाभ भी हमें सहर्ष स्वीकार हैं पर उस व्यवस्था को नकारते हैं जो हमारे सोच में परिवर्तन चाहती है। पुरुष दोनों हाथों में लड्डू चाहता है।
ये ‘डबल स्टैण्डर्ड’ कैसे चलेंगे?
कब ये ‘हदें’ बदलेंगी?
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24.10.2002
