पुटियापीर

इस दुनिया में किसको फुरसत है? सभी ऐसे भागे जा रहे हैं मानो संसार उनके भरोसे ही चल रहा है। अरे भई, यह दुनिया तुम्हारे पहले भी चल रही थी, तुम्हारे बाद भी चलेगी, जरा थम तो लो। थमोगे तभी तो ना पता पड़ेगा कि तुम दुनिया को चला रहे हो या दुनिया तुम्हें चला रही है, तुम संसार को भोग रहे हो या संसार तुम्हे भोग रहा है, तुम इसे छका रहे हो या खुद छक रहे हो।

अब सूरज को ही लो। अभी-अभी तो पूर्वांचल पर उसका मुँह निकला था और देखते-देखते कितना चढ़ आया। अब आँखें फाड़े यूँ देख रहा है मानो दुनिया उसी के भरोसे चल रही है।

स्कूल के बच्चे कंधे पर भारी बस्तों को लादे टैक्सियों की ओर ऐसे लपक रहे हैं मानो सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को वे ही ढो रहे हैं। कौन जाने वे ढो रहे हैं या खुद ढह रहे हैं। टैक्सी वाला, दूध वाला, अखबार वाला एवं तरकारी वाला सबका यही आलम है। इन सबको तो एक तरफ रखो मेरे घर में भी तो यही माजरा है।

सरोज सुबह से काम पर लगी है। उसके माथे पर आई पसीने की बूंदें बता रही हैं कि कितने काम उसके सर में घूम रहे हैं । ओह बाबा! कितना काम होता है इन औरतों के पास और उतनी ही शक्ति भी। इतना काम मर्दों पर आन पड़े तो बेचारों का दम निकल जाए। क्या गृहस्थी की गाड़ी औरतों के भरोसे ही चलती है? पर मुझे क्या, मैं क्यों पड़ूं इस पचड़े में। अपने तो अखबार खोलो और चाय की चुस्कियों के साथ खबरों का स्वाद लो। सरोज का काम सरोज जाने।

सरोज अब रसोई में खड़ी तरकारी छील रही थी। रोज सुबह छः बजे उठती है फिर कामों की एक अनंत शृंखला प्रारंभ हो जाती है। घर का झाड़ू, पौंछे, बर्तन साफ करना, दूध लाना, सब्जी खरीदना, चाय बनाना एवं फिर खाने की तैयारी। बच्चों का बैग और बनाओ , बच्चों को भी तैयार कर स्कूल भेजना होता है, पर हाँ, बड़बड़ करते हुए सारा काम कर लेती है। रविवार को भी निज़ात नहीं। उस दिन और नई तरह के काम होते हैं। कभी मेरे सर में मालिश करती है, कभी बच्चों के, तो कभी स्पेशल डिश की तैयारी में जुट जाती है।

आज उसका मूड कुछ उखड़ा हुआ लगता है। सुबह से कहे जा रही है, ‘‘थोड़ा काम में मदद किया करो, मर जाऊंगी तो याद करोगे।’’

‘‘दुनिया में काम करते हुए कोई नहीं मरा, जो मरा वह बेगारी में ही मरा।’’ मैंने अखबार पढ़ते हुए उत्तर दिया।

‘‘तुमसे तो बात करना बेकार है। जब देखो अखबार और किताबों में आँखें गड़ाये रहते हो। रोटी की जगह अखबार खाने से पेट भर जाएगा क्या?’’

‘‘अरे, हम भी तो सारे दिन ऑफिस में पिलते हैं, वहाँ हम तुमसे हाथ बँटाने का कहते हैं क्या !’’ मैंने मखमली जूती मारते हुए कहा। 

‘‘मालूम है वहाँ कितना काम करते हो। हर तीसरे रोज तो सरकार छुट्टी कर देती है। शनिवार, रविवार फिर अवकाश। सरकारी बाबू कितना काम करते हैं मुझे मालूम है।’’

‘‘अरे जलती क्यूँ हो? अपना-अपना भाग्य है। जुत-जुत करे बैलवा, बैठे खाय तुरंग। और फिर इतना ही बाबुओं पर खीझती हो तो अफसर ढूंढ लेती ना।’’

मैंने गोली पर गोली चढ़ाने की कोशिश की पर कोई फायदा नहीं हुआ, उल्टे वह बिफर पड़ी। 

‘‘मेरे तो बहुत रिश्ते आये थे अफसरों के। तुम्हारे बाप ने ही आकर नाक रगड़ी थी मेरे बाबूजी के पास। पुरानी दोस्ती की दुहाई दी तब बाबूजी पिघले। तब तो कहते थे दो साल में अफसर बन जाएगा, यहाँ बीस साल से बगलें झाँक रहे हैं।’’

‘‘मुझे नहीं चाहिए प्रमोशन। हर तीसरे साल ट्रांसफर। कौन जगह-जगह भटके। अपना शहर सबसे भला। अफसरी का हलवा अफसरों को मुबारक !’’

‘‘किसे बेवकूफ बनाते हो ! हलवा खाने को मुँह चाहिए। फिर प्रमोशन का इम्तहान देने हर बार क्यूँ जाते हो?’’

यह बात सच थी। मेरे पास इसका तोड़ नहीं था। आज वह व्यस्त भी थी। ज्यादा छेड़ने का मतलब था कुछ काम और पकड़ो यानि रविवार बरबाद। 

मैंने चुप रहना ही मुनासिब समझा। कई बार बोलने वाला ही उठकर कुण्डा खोलता है।

मुझे याद है माँ भी पिताजी को कई बार ऐसे ही कोसती थी। वह भी दिन-रात काम में लगी रहती थी। तब काम होता भी बहुत था। सुबह उठकर आटा तक पीसना होता था। फिर चूल्हा फूँको। मुझे अब भी याद है उन लकड़ियों को फूँकते-फूँकते माँ की साँस उखड़ जाती थी। पहले कौन-से मिक्सर और प्रेशर कुकर थे। तब आमरस बनाना एक घण्टे का काम होता। दालें देगचियों में दो-दो घण्टे चढ़ती थीं। मिक्सर, प्रेशर कुकर, गैस चूल्हा एवं वाशिंग मशीन ने गृहिणी का जीवन बदल दिया है। युग लेकिन कोई हो औरतों ने हर युग में जताया है कि घर उनके भरोसे चल रहा है। आदमी है भी तो कुत्ते का बच्चा। उसके भी तो औरत से कितने प्रयोजन होते हैं। कई बार तो बुद्धू की तरह उसकी हर बात मान लेता है। यही नहीं सयानी औरतें बंद कमरों में मर्दों से पाँव तक दबवा लेती हैं । कहते हैं रणक्षेत्र में जौहर दिखाने वाले सूरमा भी स्त्री के भ्रूकटाक्ष के आगे हार जाते हैं। युद्ध में रणधीर एवं बेडरूम में रणछोड़। तभी तो औरतें नकचढ़ी हो गई हैं।

माँ जब भी बाबूजी पर चिल्लाती तो बाबूजी अक्सर दबे होठों एक गीत गुनगुनाते। ‘पुटिया रे तेरो दर्द बड़ो………’ फिर मुस्करा कर इसी गीत में एक पंक्ति जोड़ते, ‘पुटिया रे तेरो भेद बड़ो।’ मैंने एक बार उनसे इसका अर्थ पूछा तो वे टाल गए। बस इतना ही कहा कुछ बातें मात्र समझने की होती हैं, उन्हें समझाने में तूफान उठ जाते हैं। ऐसा गूढ़ उत्तर सुनकर मेरे मन की जिज्ञासा और तीव्र हो गई थी। आखिर यह पुटिया का इतना बड़ा दर्द क्या है, इतना बड़ा भेद क्या है? क्या है आखिर यह पुटियापीर ? मैंने कई बार प्रयास किया पर बाबूजी ने नहीं बताया। एक बार मैंने जिद की तो चश्मे के पीछे बड़ी-बड़ी आँखें घुमाते हुए बोले, ‘‘बरखुरदार! रोटियों से जाओगे।’’ तब उनकी आँखें भय, विस्मय एवं आश्चर्य से लबालब थी। उसके बाद मेरी हिम्मत नहीं हुई। हाँ, बाबूजी की वंश परम्परा को मैंने उनके निधन के बाद भी जारी रखा। आज भी सरोज व्यस्त होकर चिड़चिड़ करती है तो मैं उसी गीत को गुनगुना लिया करता हूँ, ‘पुटिया रे……….’ हालांकि इसके मायनो से मैं, सरोज एवं बबलू तीनों बेखबर है। हाँ, इतना अवश्य है बबलू की आँखों में वही जिज्ञासा उभरती है जो कभी मेरी थी। आठ साल का बच्चा अधिक जिज्ञासु होता है। एक बार उसने माँ से पूछा भी तो सरोज ने यही उत्तर दिया, ‘‘तानसेन की औलादें हैं, कुछ तो राग अलापेंगी ही।’’

दस बजने को थे, मैंने ऑफिस की राह ली। आज ऑफिस में बहुत काम था, मैं सारे दिन कार्य में उलझा रहा। 

दिन यूँ ही बीत गया। सूर्य भी दिन भर तप कर साँझ होते-होते संध्या के शीतल आगोश में चला गया। 

रात मेरी छाती को अंगुलियों से कुरेदते हुए सरोज के मन-मस्तिष्क में क्या था, भगवान जाने। त्रियाचरित्र कितना अगम एवं अगाध है। इतनी समीप होने पर भी वह आदमी की पार्थिव पकड़ से कितनी दूर है !

अपने उत्तंग उरोज मेरी छाती से सटाते हुए बोली, ‘‘अनिमेष! काम करते-करते थक जाती हूँ।’’

‘‘ठीक कहती हो सरोज! तुम नहीं हो तो घर की लुटिया डूब जाए।’’

ऐसी विकट मादक परिस्थिति में भला मैं और क्या कहता।

‘‘सच कहते हो!’’ वह और नजदीक आकर बोली।

‘‘तेरी कसम! मुझे समझ में नहीं आता जहाँ औरतें नहीं होती, वहाँ घर कैसे चलते हैं।’’ उसके कंधे पर पड़े मेरे दायें हाथ की प्रथम दो अंगुलियों से अण्टी बनाते हुए मैंने उत्तर दिया।

‘‘फिर यह पुटिया वाला गाना गाकर क्यूँ चिढ़ाते रहते हो।’’

‘‘हद हो गई, तुम जानती हो इसका मतलब क्या है?’’

‘‘क्या है?’’

‘‘तुम अन्य औरतों से बहुत सुन्दर हो। इस भेद को जानकर दुनिया के अन्य पुरुषों की छाती दर्द से भर गई है………..अब बेटे के सामने तो कोड वर्ड में गाना पड़ता है ना।’’

‘‘अब समझी! शैतान कहीं के!’’ कहते-कहते वह खिलखिलाकर हँस पड़ी।

उसकी हँसी मानो चन्द्रकिरणों का तिरस्कार कर रही थी। गोरा खिला रंग उसके रूप में चार चाँद लगा रहा था। अब मैं उसे आँखें गड़ाकर देखने लगा था। आज भी कितनी कमसिन थी वह। आँखें मानो कामदेव की दो मछलियाँ हो, उसमें लगा काजल तो स्वयं घटाओं ने नीचे उतरकर लगाया होगा। अरुण अधर, ऊँची छातियाँ एवं सुंदर गहरी नाभि मानो किसी ने उस पर मेरी सौभाग्यलिपि अंकित कर दी हो। क्या ब्रह्मा ने अपनी सारी निपुणता को स्त्री के सृजन में स्थिर कर दिया था?

चाँद अब आसमान में यूँ चढ़ रहा था जैसे हर पैग के साथ शराबी का नशा चढ़ता है। जिसका सामीप्य पाकर यति, योगी एवं तपस्वी तक डिग जाते हैं, मैं क्षुद्र गृहस्थ भला कैसे संयम रखता! मुझे नहीं मालूम मैंने क्या खोया, क्या पाया। विदेह शरीर क्या खाक लेखा-जोखा रखेंगे।

इन्हीं दिनों हमारे पड़ौस में एक नये किरायेदार श्री गहलोतजी आए। शहर के जंतुआलय में चीफ अफसर थे। अच्छे पड़ौसी की तरह एक दो बार मैं उनके घर गया। वे भी हमारे घर आये। जब भी आते तो कहते, कभी जंतुआलय आओ। पशु-पक्षियों के व्यवहार आदि के बारे में इंसान को जानना चाहिए पर वही बात, एक तो इस जगत में फुरसत किसको है, दूसरे गहलोत सा की दो आदतों से मुझे कोफ्त थी। एक तो उनकी तेज हँसी, बिल्कुल रावण की तरह, दूसरे वे जब भी मूड में होते, जोर से कंधे पर हाथ मारते। 

इस बार ‘समर वेकेशन’ में श्रीमती जी एवं बबलू ननिहाल गए तो मैं अकेला रह गया। पड़ौसी गहलोत जी की बीवी भी बच्चों सहित पीहर गई हुई थी। 

आज सुबह बगीचे में पानी दे रहा था कि गहलोत सा मुख्य द्वार खोलकर अंदर आए। मैंने अपने कंधे को सम्भाला। पास आते ही उन्होंने कंधे पर हाथ मारा एवं जोर से बोले, ‘‘अनिमेषजी! आज शाम का क्या प्रोग्राम है?’’ मैं कुछ कहता उसके पहले ही बोले, ‘‘ऐसा करना, शाम चार बजे जंतुआलय आ जाना। वहीं से एक फार्म हाउस पर चलकर डिनर करेंगे।’’ जाते-जाते एक बार फिर कंधे पर हाथ मारते हुए जोर से हँसे, ‘‘अनिमेषजी! कुछ दिन मजे मारलो। अभी औरतें चार-पाँच रोज में वापस आती नजर आएंगी। लेकिन एक बात ध्यान रखना, समय पर आना, आई लव पंकचुएलिटी !’’

मैं नियत समय पर पहुँच गया।

गहलोत साहब मुझे विभिन्न पक्षियों एवं पशुओं के बारे में बता रहे थे। ‘‘यह बोनेट बंदर है। इसके आगे के दो दाँत बहुत तीखे होते हैं। यह लाल मुँह का होता है। अगर कोई इसको पीट दे अथवा आहत कर दे तो यह मात्र गंध से उसका मीलों पीछा कर लेता है। जब तक अपने शत्रु पर प्रतिघात न कर दे, यह चैन से नहीं बैठता। जंतुआलय में इसको पीटने की सख्त मनाही है। बंदरों की अनेक प्रजातियाँ होती हैं। काले मुँह का हनुमान लंगूर होता है। पूरी टोली में यह अकेला नर होता है, बाकी सभी मादाएं होती हैं। एक टोली में कभी दो नर बंदर नहीं होते। काले मुँह का बंदर कभी लाल मुँह के बंदर के साथ नहीं रहता। यहाँ भी मनुष्यों की तरह काले-गोरे के आधार पर जंग छिड़ी हुई है। इसी तरह रीछ के पिंजरे के आगे आकर उन्होंने बताया कि रीछ धन्वंतरि होता है। यह जंगल का आयुर्वेदाचार्य है। यह जिस पौधे को सूंघता है, उसका औषधीय महत्त्व अवश्य होता है। यह मिलता भी ऐसी जगहों पर है जहाँ ऐसे पौधे हो जैसे पहाड़ों की तराई आदि। आयुर्वेद के रिसर्च स्कोलर इन भालुओं की गतिविधियों पर नजर रखते हैं।’’ हर पिंजरे के आगे उन्होंने एक विशिष्ट बात बताई। ‘‘शेर अकेला रहना पंसद करता है एवं शेरनी से मात्र मेटिंग सीजन में वर्ष में एक बार मिलता है। वुडपेकर पेड़ को चोंच मार-मारकर घौंसला बनाता है एवं उसी लकड़ी को खाकर पेट भर लेता है। लवबर्ड मात्र नदियों से बहकर आई फ्रेश मिट्टी को खाता है। घड़ियाल अपने शिकार को हमेशा मुँह की तरफ से निगलता है। लकड़बग्गा जंगल की सफाई करने वाला होता है। जंगल की जूठन, सड़े गले सभी तरह के मांस को वह हजम कर जाता है। चीता पेड़ पर चढ़ सकता है पर शेर नहीं। शेर की बिल्ली मौसी ने शेर को यह गुर नहीं सिखाया अन्यथा जंगल में कोहराम मच जाता।’’

उनकी बात सुन-सुनकर मैं मुग्ध हो रहा था। वे बिना रुके बोल रहे थे। 

उसके बाद मैंने कई अन्य प्रकार के पक्षी देखे। रंग-बिरंगे, सुंदर पंखों वाले पक्षी। सारस, चिड़ियाँ, बगुले, हंस, बतख, आदि-आदि। अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ तैरती हुई बतख कितनी प्यारी लग रही थी। जितनी तरह के पक्षी उतनी तरह की चोंचें। गहलोत साहब ने बताना जारी रखा, ‘‘पपीहा मात्र बारिश का पानी पीता है, वही पानी जो सीधा  उसकी  चोंच में गिरता है। कुरजां एवं अन्य प्रवासी पक्षी अधिकतर झूले के आकार में झुण्डों में उड़ते हैं। यह पक्षी सर्दियों में हजारों मील से आते है, यहाँ बच्चे पैदा करते हैं एवं फिर बच्चों के साथ उड़ जाते हैं। अगले वर्ष यही पक्षी पुनः अपने बच्चों के साथ आते हैं।’’ इसी तरह गोड़ावण के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘गोडावण एक दुर्लभ पक्षी है। कहते हैं यह विरहनियों को स्वप्न में आकर उनके परदेश गए पतियों के बारे में बताता है। थार में तो इसके मंदिर भी है एवं वहाँ यह पूजा जाता है।’’

तभी मेरी नजर एक ऐसे पक्षी पर पड़ी जो उल्टा पड़ा था। उसके दोनों पंजे आसमान की ओर सीधे खड़े थे। पहले मुझे लगा वह कोई मरा हुआ पक्षी है। थोड़ी देर बाद कुछ हिला तो मैं आश्वस्त हुआ कि वह जिंदा है। वह मात्र पीठ के बल हिल रहा था पर जब भी ठहरता उसके पाँव आसमान की ओर होते। मैंने कौतुकवश गहलोत साहब से उसके बारे में पूछा तो वे आसमान की ओर मुँह कर जोर से हँसे। मेरे कंधे पर अब तक की सबसे तेज थाप देते हुए बोले, ‘वह पुटिया पक्षी है। इसे टिटिहारा एवं अन्य कई नामों से भी पुकारा जाता है।’’

पुटिया नाम सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए। वर्षों की दबी जिज्ञासा जाग उठी। कोई और मौका होता तो मैं इतना तेज कंधे पर मारने के लिए गहलोत साहब को आडे हाथों लेता पर पुटिया पक्षी पर पड़ती थाप मुझे बहुत मीठी लगी। 

मैं विस्मय से आँखें फाड़े गहलोत साहब को सुन रहा था। मेरी जिज्ञासा थम नहीं रही थी। वे बता रहे थे, ‘‘अनिमेषजी! यह एक अद्भुत पक्षी है। यह बहुधा आसमान की तरफ अपने पाँव करके पड़ा रहता है। किंवदंती है कि सदियों पूर्व इसे भ्रम हो गया था कि आसमान इसी के पंजों पर ठहरा हुआ है। आज भी यह उसी भ्रम में जी रहा है। इस पुटियापीर का कोई इलाज नहीं।’’

क्या लाजवाब उत्तर था। अब मेरी वर्षों पुरानी पहेली का समाधान हुआ। गृहस्थी की गाड़ी तो दो पहियों पर ही चलती है पर स्त्री को एवं शायद कहीं-कहीं पुरुषों को भी सदैव यह भ्रम रहता है कि गृहस्थी का विशाल गगन वही सम्भाले हुए हैं। यह स्थिति अन्य अनेक जगहों पर भी है। कई जगह बाबू यह सोचते हैं कि ऑफिस वे चला रहे हैं, कई अधिकारी यह सोचते हैं कि देश वे चला रहे हैं, कई राजनीतिज्ञ, व्यवसायी, चिंतक, तपस्वी, योगी एवं मनस्वीजन तक इस भ्रम का शिकार हैं। पुटियापीर घर-घर, गाँव-गाँव, शहर-शहर एवं देश-देश तक में फैला हुआ असाध्य रोग है। इसका इलाज तभी संभव है जब इन व्यामोहों के अंधकार का दलन हो, बोधगम्यता के सूर्य द्वारा।

सरोज भी इसी रोग का शिकार थी। यकायक मेरे दिमाग में एक विचार कौंधा। इस बार मैंने जोर से हँसकर गहलोत साहब का कंधा थपथपाया, ‘‘गहलोत साहब, यू आर ग्रेट! आपकी जी.के. कितनी पावरफुल है !’’

गहलोत साहब की आँखों की चमक द्विगुनित हो गई थी।

सरोज एवं बबलू वापस आए तो मैंने मेरे नव विचार को अमली जामा पहनाने का निर्णय लिया। इस बार मैंने घर के सारे काम करने के लिए महरी की व्यवस्था की। कुछ ही दिनों में महरी झाडू, पौछे, बर्तन साफ करना, कपड़े धोना एवं रसोई के काम भी करने लगी। मैंने अपने छोटे-छोटे काम जैसे जूते पाॅलिस करना, स्कूटर साफ करना, कपड़े प्रेस करना भी उसके हवाले किए। फकत एक हजार रुपये में सारा तनाव समाप्त। मुझे लगा इस बहाने सरोज को विश्राम भी मिलेगा एवं यह समझ भी बनेगी कि गृहस्थी का रथ दोनों पहियों पर टिका है।

लेकिन स्थिति उल्टी हो गई। वह और चिड़चिड़ी हो गई। उसका अस्तित्त्व ही इन कामों से था। अब किस बहाने वो मुझे डाँटती। मैं जब भी महरी को मेरे निजी कार्य जैसे जूते पाॅलिश करना, बटन टांकना, खाने की थाली लगाना, दूध बनाना इत्यादि देता तो सरोज का रोआं रोआं जल जाता। कुढ़न चेहरे पर आ जाती, कई बार भृकुटियाँ तन जाती। उसकी चिड़चिड़ाहट हर दिन बढ़ने लगी। मैं मन-ही-मन प्रमुदित होकर ढोल बजाता।

आज इतवार था। मैं बेतकल्लुफी से डाइनिंग टेबल पर चाय की चुस्कियाँ लेते हुए अखबार पढ़ रहा था। महरी ने आधे काम निपटा लिए थे। मैं मेरे निजी कार्यों के लिए भी उसे जब-तब कहता जा रहा था………. ‘जरा पानी पिलाना, दूध बनाना, ब्रेकफास्ट लगाना आदि-आदि।’ सरोज के पास अब काम ही क्या बचा था। वह मेरे पास ही बैठी अखबार के पन्ने उलट रही थी। उसकी आँखें अखबार में थी पर मन में बवण्डर उठ रहे थे। उसका बस चलता तो वह अखबार पढने की बजाय खा जाती।

बैठे-बैठे मुझे लगा आज सिर में तेल मालिश रह गई। बहुधा इतवार को सरोज यह काम करती। आज उसका रौद्र रूप देखकर मेरी कहने की हिम्मत नहीं हुई। मैंने हिम्मत कर महरी से कहा, ‘‘जरा मेरे सर में तेल तो लगा दे।’’

मेहरी ने तेल लगाना प्रारंभ किया। जब उसकी अंगुलियाँ मेरे बालों में घूमने लगी तो मैं एक दृश्य देखकर स्तब्ध रह गया। मानो एक भयंकर विद्युतपात हुआ। सरोज झाडू लेकर महरी पर पिल पडी थी, ‘‘साहब के सिर पर मालिश करने की तेरी हिम्मत कैसे हुई ? अब छाती से भी चिपकाले।’’ उसकी आँखों से चिंगारियाँ बरस रही थीं।

‘‘साहब ने ही तो कहा था।’’ महरी डरते हुए बोली।

‘‘अरे साहब, बिस्तर पर सोने का कहेंगे तो सो जाएगी क्या? मर्दों की तो जात ही बुरी। दफा हो यहाँ से! आज के बाद शक्ल दिखी तो काट डालूंगी।’’

महरी मुँह में पल्लु दबाकर भागी।

सरोज का क्रोध थमा तो वह चुपचाप उठकर मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई। 

अब श्रीमतीजी की कोमल अंगुलियाँ मेरे सर में घूम रही थी। मैं फिर वही गीत गुनगुना रहा था……. ‘‘पुटिया रे तेरो दर्द बड़ो…….’’

हाँ, इस बार मैं इस गीत के मर्म को जानता था। 

सरोज दबे होठों मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। भला पति रूप की प्रशंसा करे एवं स्त्री खुश न हो।

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17.05.2006

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