पकवान भरी थाली कमला ने छत की मुंडेर पर रखकर उसी गीत के साथ कौओं का आह्वान किया जो कभी उसकी सास ‘सावित्री’ अपनी सास के श्राद्ध दिवस पर गाया करती थी। जग दिखावे के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता ?
‘‘कागा अइयां मेरी मुंडेर…..
दिन चढ़ आया था। सूर्य की किरणों में अब पहले-सी गर्मी नही थी। जेठ से अश्विन तक तपते-तपते वे भी ठण्डे पड़ चुके थे लेकिन उनकी प्रकाश किरणों में अब भी आगत सर्दी को शिकस्त देने का यथेष्ट दमखम था। हारे थके ग्रीष्मदेव अब शिशिरदेवी का चुंबन लेने को बेताब थे। महीनों पहले उनकी बढ़ती आँच से रूठकर शिशिरदेवी जाने कहाँ विलुप्त हो गई। ग्रीष्मदेव अब अपनी गलती मानकर पुनः अपनी प्रेयसी को मनाने उसके द्वार पर खड़े थे।
कमला आज मुँह अंधेरे उठ गई थी। आनन-फानन तैयार होकर उसने खाना बनाया। चिरौंजी वाली खीर, देशी घी में तली पूरियां, काजू-किशमिश से भरा पुलाव, शुद्ध घी में भुनी आलू की सब्जी, दही का रायता आदि-आदि। मिठाई एवं नमकीन डाॅ. सोहन रात को ही ले आए थे। थाली में उसने पकवान सजाए तो सारा घर पकवानों की सौंधी महक से भर गया। डाॅ. सोहन भी अब तक तैयार हो चुके थे। दोनों उम्र में बराबर से थे। डाॅ. सोहन अट्ठाईस के पार एवं कमला अट्ठाईस तक पहुंची होगी, हाँ रूपरंग में वह डाॅ. सोहन से इक्कीस थी। डाॅ. सोेहन सामान्य कद काठी के, चेहरा गोल, रंग सांवला एवं छोटी आँखों वाले थे। नजर पैनी थी। आँखों पर लगा गोल्डन फ्रेम का चश्मा उनकेे व्यक्तित्व के कई दोष छिपा देता। कमला अन्य औरतों के मुकाबले अच्छी लम्बी थी। गौरवर्ण, लम्बा चेहरा, ऊँची नाक, मांसल देह, बड़ी-बड़ी आँखें एवं काले घने लम्बे बाल उसके रूप में चार-चांद लगाते। रूप में कहीं कमी नहीं थी।
कमला ने पकवान की थाली उठाई एवं छत पर जाने के लिए सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। उसके खुले बालों में अभी भी पानी की बूंदें शेष थी। डाॅ. सोहन उसके पीछे ऐसे चल रहे थे मानो कोई उन्मत्त नाग नागिन के पीछे दीवाना-सा चला आ रहा हो।
कमला ने चार-पाँच बार गीत को दुहराया पर कौआ नहीं दिखा। पक्षी भी शायद पात्रों को पहचान लेते हैं। उसने इधर-उधर देखा, हताश थाली डाॅ. सोहन के हाथ में थमा कर बोली, ‘‘अब तुम्ही पुकारो अपनी माँ को! जीते जी कौन-सा सुनती थी जो अब सुनेगी !’’
‘अरे, पुकारना आना चाहिए ! माँ जब दादी के श्राद्ध पर पुकारती तो कौवे दौड़े चले आते थे। जीते जी तुमने उसे कौन-सा सुख दिया जो अब तर्पण लेगी।’ डाॅ. सोहन व्यंग्य कसते हुए बोले। उन्हें मालूम था कमला तुरन्त जवाब देगी और हुआ भी वैसे ही।
‘पहले अपने दिल को तो टटोल लो! आप ही ने……’ कमला आगे बोलती इसके पहले डाॅ. सोहन ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर उसका मुँह दबाया एवं खींच कर नीचे ले गए।
‘जरा बोलने में ध्यान रखा कर ! कलमुँही ! दोनों …………..।’ डाॅ. सोहन दाँत भींचकर बोले। उनके चेहरे का रंग उड़ने लगा, त्यौरियों में बल पड़ गये।
‘पहले अपने गिरेबां में झाँको फिर दूसरों को ताना दिया करो।’ अन्तिम ब्रह्मास्त्र डालकर कमला रसोईघर में चली गई। डाॅ. सोहन को लगा जैसे उन्होंने कीचड़ में पत्थर डाल दिया। कमला की आदत को वे अच्छी तरह जानते थे पर अब विवश थे। हृदय मसोस कर रह गए। कलुष स्त्री के अधीन जीने वाले व्यक्ति का विवेक प्रायः विलुप्त हो जाता है।
भाग (2)
आत्मदेव ने रोज की तरह कपड़ों की गठरी बनाई, कंधे पर रखी एवं बाहर निकलते हुए बोला ,‘भाग्यवान ! रात देर तक लौटूंगा। नौ बजे तक चला आऊंगा। तीन मील चलकर पहुँचने में ही एक घण्टा लग जाता है।’
‘क्यूँ दिन भर पाँव रगड़ते हो ? इतना किसके लिए कमाना है। क्यूँ बच्चे की इतनी फिकर करते हो ! भाग्य में है तो स्वयं एक दिन कुछ बन जाएगा।’ सावित्री के शब्द आत्मदेव को पकड़ते उसके पहले ही वह घर से पचास कदम दूर होेता। एक ही धुन उसकेे सर पर सवार थी-सोहन को एक दिन डाक्टर बनाना है, उसका अच्छी जगह ब्याह करना है। एक दिन मेरा बेटा भी समाज में तनकर निकलेगा। उसके स्वप्न वर्तुल उसकी चाल और बढ़ा देते। वह चालीस पार था पर चाल में अभी भी जवानों-सी फुर्ती थी।
शहर से तीन मील दूर फौजी छावनी में वह रोज कपड़े बेचने जाता। फौजी सुबह ड्यूटी पर चले जातेे, उनकी बीवियों में अच्छे कपड़े पहनने की होड़ लगी रहती। वहाँ विशेष भाव-तोल भी नहीं होता। शहर में महाजनों की औरते पैसे-पैसे का हिसाब करती, इतना भाव-ताव करती कि नफा काफूर हो जाता। लेकिन छावनी की बात ओर थी। फौजियों की कमाई भी अनाप-शनाप थी। वो जमाने गए जब फौजी ईमानदारी के प्रतिबिंब होते थे। अब उन्हें भी बाहर की हवा लग गई है। हाँ, यह बात अवश्य है फौजी कमाते हैं तो खर्च भी करते हैं। फौजियों को गोरी चिट्टी, सजी-धजी बीबियां बहुत पसंद है। आत्मदेव जानता था रंगरूटों की तरह उनकी बीवियां भी दिमाग से अटेन्शन होती है, ज्यादा बहस नहीं करती, जरा-सी तारीफ करते ही पिघल जाती हैं।
तीन मील वो यूँ नाप लेता। सर्दी, गर्मी, पावस कुछ नहीं देखता। छावनी पहुंचते पसीने से तरबतर हो उठता। गठरी उतारकर अपने लाल गमछे से पसीना पोंछता, कमर से बंधी बोतल से पानी पीता फिर जोर से आवाज लगाता……. साड़ी वाला….. कपड़े वाला…..। एक-एक कर औरतें बाहर आती, थोड़ी देर में भीड़ लग जाती। आत्मदेव फैला-फैला कर कपड़े बताता। ‘बहनजी! यह आप पर बहुत फबेगा, इसमें आप हिरोइन लगेंगी….. यह कपड़ा आपके गोरे रंग पर खूब जमेगा। उसकी मीठी वाणी सबका मन मोह लेती। मात्र एक औरत को बेचने की तदबीर जुटानी होती। एक के खरीदते ही बाकी औरतें एक दूसरे को देखकर खरीद लेती। नारी मन की इस वृत्ति को वह ईश्वर का प्रसाद मानता। शाम होते-होते गठरी खाली हो जाती। खाली कपड़े को कन्धे पर डालकर वह फिर तीन मील चलकर घर आता। औलाद के लिए इंसान क्या-क्या नहीं करता? लक्ष्य आंखों के आगे हो तो इंसान थकता भी नहीं है। आत्मदेव का यूँ तीन मील आना-जाना रोज का नियम था।
घर आते ही सावित्री को रुपये सम्हलाता। माल खरीदने का काम सावित्री का था एवं बेचने का आत्मदेव का। रोज दोपहर सावित्री बाजार में कपड़े खरीदने जाती एवं आत्मदेव के घर पहुंचते दूसरी गठरी तैयार कर रख देती। फिर सीधा रसोई में होती। झटपट जैसे-तैसे खाना पकाती। पाककला में वह पारंगत नहीं थी,। अपनी इस कमजोरी को जानती भी थी पर सभी में सब हुनर नहीं होते। माँ बाप की इकलौती बेटी थी, ब्याह तक तो खाना पकाना भी नहीं सीखा। शादी के एक माह बाद सास चल बसी फिर कौन सिखाए ? लेकिन आत्मदेव उसके बनाये भोजन की इतनी तारीफ करता की उसकी आँखें भीग जाती। ‘सावित्री ! तुम कितनी अच्छी दाल बनाती हो…. क्या भाजी बनाती होे…. क्या रोटी सेकती हो !’ पति की मीठी वाणी उसके सारे दिन की थकान हर लेती। रात आत्मदेव सोता तो वह उसके पाँव दबाती। सावित्री के कोमल हाथों का स्पर्श आत्मदेव के दिन भर की पीड़ा हर लेते। कब सोता पता ही नहीं चलता। जीवन के दुःख एवं दुर्गम मार्ग भी अपनों के साथ कितने सुगम हो जाते हैं। प्रियजनों के साथ दुःख-सुख संगीतमय जुगलबंदी लगते हैं।
तब सोहन मात्र पाँच वर्ष का था। उसे पब्लिक स्कूल में भर्ती करवाना आत्मदेव के बूते के बाहर था। ऐसी विपन्नता में भी उस पर धुन सवार थी, चाहे मरना पड़ जाए, सोहन को अवश्य डाक्टर बनाऊँगा। दिन भर दौड़ता, यहाँ-वहाँ से उधार लेता, जैसे-तैसे घर चलाता पर बच्चे की पढ़ाई में कोई बाधा नहीं पड़ने देता।
पढ़ाई में सोहन ने भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, लगातार आगे बढ़ता गया। सोलह वर्ष का होते-होते जब उसका प्री-मेडिकल टेस्ट में चयन हुआ, आत्मदेव एवं सावित्री की आँखें छलछला आई। दोनों गंगा नहा गए। दोनों ने मोहल्ले में घूम-घूम कर मिठाई बाँटी। रात गर्व से आत्मदेव ने सावित्री सेे कहा, ‘सावित्री हम तो निहाल हो गए, सात पीढियों में भी कोई इतना नहीं पढ़ा। सोहन तो हमारे झोंपड़े का चिराग निकला।’
अब आत्मदेव का कर्म और भी कठोर हो गया। काॅलेज की फीस, सोहन के कपड़े, पुस्तकें और महंगी होने लगी। सावित्री अब घर पर कपड़े भी सीती एवं आत्मदेव बेचकर आता। खुद कष्ट पा लेते पर बच्चे को अपनी पीड़ा नहीं बताते।
आत्मदेव की मेहनत रंग लाई। अनुकूल समय प्रतिकूल परिस्थितियों के गर्भ में से ही निकलता है। उसके कारोबार में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की हुई। अपनी पहली दुकान का उद्घाटन हुआ तो वह विह्वल हो उठा। वहाँ भी दिन रात लगा रहता। कुछ ही वर्षों में उसने कारोबार कई गुना फैला लिया, समय बीतते एक शानदार कोठी बनाई एवं एक नई कार भी ली। लक्ष्मी आती है तो उसके पसार को रोकना मुश्किल हो जाता है। चंद वर्षों में ही वह शहर का धनी-मानी व्यक्ति बन गया।
इसी आपा-धापी में पाँच वर्ष बीत गए। जिस रोज सोहन डाक्टरी की डिग्री लेकर आया, दोनों गद्गद हो उठे। उस रात हुए जश्न में शहर के कई रईस शामिल थे। बाहर गाड़ियों एवं अन्दर मुलाजिमों का अंबार लगा था।
आत्मदेव के दिन बदल गए। उम्र के अंतिम पड़ाव में वह धन के अकूत खजाने पर बैठा था और यह सारा धन उसकी अपने मेहनत की कमाई थी।
अब उसे सोहन के ब्याह की चिन्ता सताने लगी। अब उसके भी ऊँचे-ऊँचे घरों से रिश्तेे आने लगे। आत्मदेव घंटों सोचता, सोहन का ब्याह ऐसे धूमधाम से करूंगा कि दुनियां देखेगी। रस्सी से बंधे बैल की तरह सोहन के मोहपाश में वह ऐसा बंधा था कि उसके अतिरिक्त किसी की न सोचता। पुत्र-मोह की इस विवशता में उसे स्वयं तक की सुध नहीं रहती थी। विवश इंसान अंधे की तरह अपना पाथेय स्वयं भी नहीं जानता। मोह के नागपाश ईश्वर ही खोलता है।
श्राद्ध के दिन थे। आश्विन कृष्ण पक्ष की तृतीया थी। आज ही के दिन आत्मदेव की माँ का श्राद्ध आता था। सावित्री ने सुबह जल्दी उठकर सारी तैयारी की। सास का साथ एक माह का था पर आत्मदेव की माँ होना उसके लिए बहुत बड़ी बात थी। पति जब परमेश्वर हो जाता है तो सास-श्वसुर देवी-देवता हो जाते हैं।
छत पर आत्मदेव एवं सावित्री दोनों कौओं का आह्वान कर रहे थे। सावित्री मोर-सी मीठी बोली में गा रही थी –
कागा अइयो मेरी मूंडेर,
देखूँ कब से तेरी टेर,
देना सासू को संदेश,
तोर बिन सूनी दुनिया।।
देखते-ही-देखते कौवे लपक-लपक कर आने लगे। झपट कर थाली से तर्पण लेते और उड़ जाते। सावित्री एक अबूझ आनंद से तृप्त हो जाती।
भाग (3)
श्राद्ध गए अभी दो माह बीते होंगे। एक दिन सोहन एक अनजानी लड़की लेकर घर आया। कुछ देर, असमंजस, दोनों बाहर खड़े रहे। आत्मदेव एवं सावित्री कुछ पूछते उसके पहले ही सोहन ने कहा, ‘बाबा ! मैंने इससे ब्याह कर लिया है। यह मेरे दोस्त की बहन है, बीए तक पढ़ी है।’ सोहन का मित्र अनुपम पीछे एक कुटिल मुस्कराहट के साथ दाँत भीचे यूँ खड़ा था मानो मौन होकर मसान जगा रहा हो। सोहन पढ़ा-लिखा जरूर था पर विवेक शून्य था। उसके दोस्त एवं उसकी बहन ने आते-जाते उसे जाल में डाल दिया। सोचा आत्मदेव विरोध करेगा, अतः दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली। आत्मदेव एवं सावित्री सहमकर जड़ हो गए।
आत्मदेव एवं सावित्री ने उनका औपचारिकतावश स्वागत किया पर अब दोनों को अपना भविष्य हथेली पर रखे आँवले की तरह स्पष्ट हो गया। आत्मदेव के सारे मंसूबे ढह गए। पति-पत्नी दोनों पर जैसे बिजली गिरी। क्षण भर के लिए जमीन रुक गई , आँखों के आगे आसमान घूमने लगा।
दिन, महीने बीतते गए। आत्मदेव का मन अब घर में जरा भी नहीं लगता। वह दिन पर दिन सूखने लगा। कहाँ बुढापे में भी तीखा-बाँका लगता था पर अब तो पसलियाँ गिन लो। दुकान नौकर ही सम्हालते। वह अक्सर संतों के यहां डोलता फिरता। बुढापा यूँ बेरी बनकर आएगा ऐसा तो उसने सोचा भी नहीं था। अधमरे पशु की तरह वह निढाल हो गया। रात सोता तो सोचता मैंने सोहन के लिए कितना किया एवं यह कितना निकृष्ट निकला ! सारी उम्र ऐसे रखा जैसे पलकें नेत्रों को रखती है पर इसने तो बिच्छू की तरह डस लिया। क्या माँ-बाप को यूँ दरकिनार किया जाता है ? उसकी आत्मा चीख-चीख कर ईश्वर से कहती, प्रभु! यह तेरा कैसा विधान है? सोहन के शब्द उसके हृदय में शूल से चुभते। वह विषाद के मारे बेहाल हो जाता। दिन-रात ईश्वर से मौत मांगता, मरे तो जंजाल छूटे। विधाता की सभी करतूतें विचित्र है। अमृत तो सिर्फ सुनने में आता है, देखा नहीं गया। बगुले, उल्लू यत्र-तत्र है पर मानसरोवर के हंस कहीं नहीं दिखते।
शादी के बाद कमला ने तेवर दिखाए। दोनों को माँ-बाप फूटी आँख नहीं सुहाते। बूढे माँ-बाप उनकी आँख का काँटा बन गए। दोनों धन हथियाने के नित नए उपाय करते। आत्मदेव को स्थिति भाँपने में जरा भी देर नहीं लगी। इसी दुख में वह एक दिन चल बसा। आत्मदेव के वियोग में सावित्री सूखी लकड़ी हो गई। आयु के इस शुष्क रेगिस्तान में आए भीषण तूफान ने उसकी सारी तरलता सोख ली।
अब सोहन एवं कमला के मार्ग का एकमात्र काँटा सावित्री थी। वह भादों की रात थी। चारों और घटाटोप अंधकार छाया था। घने काले बादलों ने आसमान को ढक-सा लिया था। रह-रह कर चमकने वाली बिजलियांँ एवं बादलों का शोर दिल दहला देता था। अंधकार का दानव समूचे प्रकाश को निगल कर भी थका नहीं था। पेड़ पौधे मानो किसी अज्ञात आशंका से भयभीत होकर स्तब्ध खड़े थे। पशु-पक्षी यहां तक कि मोहल्ले के कुत्ते भी दुबके पड़े थे। प्रकृति सन्नाटों के साये में मूक सांसें ले रही थी। घर में कभी-कभी सावित्री की खांसी की आवाज भर सुनाई देती थी।
रात दोनों पति-पत्नी में घुसर-फुसर हुई। दोनों का दिमाग एक भीषण संकल्प से आप्लावित हो उठा। कमला ने डाॅ. सोहन के कंधे पर हाथ रखकर उसकी शक्ति को स्फूर्त किया एवं डाॅ. सोहन ने अपनी ही माँ को जहर का इंजेक्शन दे दिया। सावित्री ने निधन के पूर्व पल भर के लिए आँखें खोली एवं फिर शायद यह सोचकर बंद कर ली कि इस दुनिया में अब देखने को क्या बचा है। दूसरे दिन सारे मौहल्ले में उसके फूड पोइजनिंग से मरने की खबर फैलायी गई। इस घटना के पश्चात् दोनों के आँखों की चमक और थी। लोक दिखावे के लिए दोनों ने माँ-बाप के नाम का एक अस्पताल भी बनवा दिया।
कौए अब कैसे आएंगे हमारी मुंडेरों पर? जीते जी जिन्हें हम पानी का घूंट नहीं पिलाते, मृत्यु के पश्चात् श्राद्ध एवं तर्पण का क्या औचित्य है ? हम बुजुर्गों को जीते जी आदर दें तभी उनकी सद्गति होगी। कौए तब आएंगे हमारी मुंडेरों पर। पंछी तब चहकेंगे हमारी छतों पर।
इस बात को भी पाँच वर्ष से ऊपर हुए। हर वर्ष की तरह आज भी सावित्री का श्राद्ध-दिवस था। कमला अब तक रसोई में चली गई थी। डाॅ. सोहन अस्पताल जाने की तैयारी कर रहे थे। थोड़ी देर बाद कमला पकवानों से भरी थाली परोस कर लाई एवं उसे डाईनिंग टेबल पर रखा। डाॅ. सोहन के गले में बाहें डालकर शरारत भरी आँखों से बोली, ‘अब तक नाराज हो क्या ?’
घर की दीवारें एक उन्मुक्त अट्टहास से गूंज रही थी ।
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04.02.2003
