किसी को नीचा दिखाकर दुनिया में कोई ऊँचा नहीं हुआ, फिर भी कुछ लोग स्वभाव से ही टेढ़ी चाल चलते हैं। सरल, शांत और स्थिर पानी में भी जोंक हमेशा वक्र गति से चलती है। कुछ मनुष्यों में बुद्धि उल्टी बसी होती है।
माउंट आबू छोड़े बीस वर्ष से ऊपर हो गए, बैंक से रिटायर भी हो गया पर ‘दुर्जनसिंह’ की यादें आज भी मेरे स्मृति पटल पर अंकित हैं। बचपन के घाव के निशान की तरह कुछ यादें ताउम्र जिस्म का हिस्सा बन जाती हैं।
नौकरी के अपने नफे-नुकसान है। सबसे बड़ा फायदा तो यह है कि हर महीने हर हाल में पगार मिल जाती है। तरह-तरह के लोगों से मिलना होता है, और विशेषतः जब बैंक जैसी नौकरी हो तो अमीर से अमीर एवं गरीब से गरीब आदमी से आपका मिलना होता है अर्थात् जीवन का यथार्थ दर्शन समझने का मौका मिलता है एवं माया के विस्तीर्ण रूप की झलक भी करीब से देखने को मिलती है। जिन्हें हम उजियारों में रहने वाले कहते है, उनके मन का अंधेरा एवं जिन्हें हम अंधियारों में रहने वाले कहते हैं, उनके मन का उजाला देखकर आप ठगे-से रह जाते हैं। पाँच सौ रुपये किश्त जमा करवाने वाले किसान के मुख का आनन्द आप समझ सकते हैं। वह चार बार नोटों को गिन कर देता है। खरी कमाई का पैसा ऐसे ही हाथ से नहीं छूटता। समय की उसे कोई समस्या नहीं। कैशियर उसको रसीद देता है, पर वो दो बार पूछता जरूर है, बाबूजी, जमा हो गए हैं ना ! कैशियर की झिड़की खाकर भी वह अपने आपको आश्वस्त कर लेना चाहता है। अमीर आदमी को जमा करवाने में कोई तकलीफ नहीं। वह कैशियर के सर थैला पटकता है एवं कैशियर पलभर में रसीद दे देता है। दोनों के बीच की मौन मुस्कराहट संवाद की आवश्यकता ही मिटा देती है। माया तेरे कितने रूप हैं। तू चाहे छप्पन भोग करवाती है, तू चाहे तो गली-गली भटकाती है। नौकरी का नुकसान यह है कि हर तीन-चार साल में पाँव उखड़ जाते हैं। वृक्ष जड़ सहित उखाड़ कर कहीं और रोपण करना होता है। जड़ों से उखड़ने का दर्द नौकरी वालों से ज्यादा कोई नहीं जानता।
बहुत मिन्नतें करके जनरल मैनेजर से मैंने माऊण्ट आबू पोस्टिंग ली थी। इस बार मेरे गाँव में पोस्टिंग की बारी थी पर मैं जैसे-तैसे बच निकला। गांव की कठोर जिन्दगी में कौन नौकरी करना चाहता है, सभी को हिल-स्टेशन चाहिए। मेरा पूरा नाम रामचन्द्र माथुर है, उम्र भी चालीस के पार थी पर जी.एम. साहब ने यही कहा था, ‘‘माई ब्वाॅय, माउण्ट आबू तो तुम्हें दे दें पर टारगेट तो पूरे हो जाएंगे? स्टाफ रिलेशन तो ठीक रहेंगे?’’ मैंने एक आज्ञाकारी बालक की तरह ‘यस सर’ कहा। साहब की मेहरबानी, माउण्ट आबू पोस्टिंग मिल गई। तुरत-फुरत मैं परिवार को लेकर माउंट आबू आ गया। जोधपुर जैसा बड़ा शहर छोड़ने में भी मुझे कोई दिक्कत नहीं आई। प्रकृति प्रेम मेरे रग-रग में बसा था। अरावली के उन्नत शिखर, मदमस्त झीलें मुझे बरबस अपनी और खींच रही थीं। मैंने तुरन्त जोधपुर से विदाई ली और माउण्ट आ गया। नई जगह की पहली झलक ने ही मेरा मन हर लिया। ऊँची पहाड़ियों के बीच पसरा माउण्ट आबू मानो किसी मूर्तिकार ने इसे तराश कर निकाला हो। मकान, बैंक की तरफ से मिल गया, दोनों बेटियों का नयी स्कूलों में एडमिशन हो गया। छोटी क्लासेज तक स्कूल शिक्षा में एडमिशन में कहीं कोई दिक्कत नहीं आती। श्रीमतीजी के लिए ‘क्या काबा क्या काशी’, उन्हें तो अपना नया चौका ही बसाना था। हम दस रोज में सेटल हो गए। अब मेरा सारा ध्यान ऑफिस पर था।
माउण्ट आबू शाखा बहुत बड़ी थी, पूरे बीस का स्टाफ था। पाँच अफसर, पन्द्रह बाबू। काम की भरमार, सर उठाने को फुरसत नहीं।
किसी भी संस्था के प्रबंधक की उस संस्था में पहली प्रविष्टि बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। कई शातिर प्रबन्धक पहले ही दिन बिल्ली मार लेते हैं। मैं भी इसी मूड में था, पूरे रुआब से बैंक गया। मेरी चाल मेरे इरादों का संकेत दे रही थी। सभी स्टाफ सदस्यों ने खड़े होकर मेरा स्वागत किया, सभी अपने-अपने तरीके से अभिवादन कर रहे थे। सिर्फ कोने में एक स्टाफ मेम्बर यथावत् बैठा रहा। बैंक स्टाफ-यूनियन का नेता था वो। पहले तो मुझे लगा, उसे दरकिनार कर मैं अपनी सीट पर जाकर बैठ जाऊं, अपने आप मिलने आएगा पर पूर्व मैनेजरों से मैंने सुन रखा था कि वह बड़ा दुर्दांत आदमी है, मैंने स्वयं ही उससे मिलने में भलाई समझी। दुर्जना प्रथम पूज्यते। सज्जन की ओर ध्यान देने की जरूरत नहीं है, वे तो वैसे ही इस संसार के सृजक हैं, पर दुष्ट को साथ लेकर चलना पड़ता है। न जाने कब बिना कारण दाहिने-बांये हो जाए ? मैं उसकी ओर बढ़ा और बड़े उत्साह से उसके कंधे पर हाथ रखा। पूरे रौब के साथ वह खड़ा हुआ एवं पूरी दमदार आवाज में बोला, ‘‘दुर्जनसिंह’’। उसका नाम ही उसका आधा परिचय था। लम्बाई छः फीट से भी ऊपर, बड़ी-बड़ी फैली हुई रतनारी आँखें, तीखे नक्श, उम्र करीब पच्चीस वर्ष। एक भरा-पूरा विशाल व्यक्तित्व। उसकी आवाज में इतना जोश था कि मेरे रोंएँ हिल गए। उसके स्वभाव में स्वाधीनता कूट-कूट कर भरी थी, बहादुरी नस-नस से फड़क रही थी। निःसंदेह कुछ व्यक्ति धरती पर जीवन की उपस्थिति का अहसास देते हैं। सभी स्टाफ मेम्बर्स हमारे मिलन को आतुरता से देख रहे थे, जैसे आज ही जीत-हार का फैसला होना हो। खैर! स्थिति समझकर मैंने वहां खड़ा होना उचित नहीं समझा, चुपचाप अपने केबिन में चला आया। माथे पर पसीने की हल्की बूंदें उभर आई थी। भावी की कल्पना मेरे दिमाग में मूर्त रूप लेने लगी। पहला दिन मिलने-मिलाने की औपचारिकता में ही बीता। जैसे गेहूं के मुट्ठी भर दाने हाथ में लेकर साहूकार पूरे माल की गुणवत्ता पहचान लेते हैं, मुझे भी उसी रोज माउण्ट आबू शाखा में मेरा रण-क्षेत्र समझ में आ गया।
शाम घर पहुँचा तो कुछ बेचैन था, पिछले हर ऑफिस में मेरे प्रबन्धन की तारीफ हुई थी, लेकिन यहां माज़रा कुछ और नजर आ रहा था। दुनिया में हर इंसान की दो तरह की वेल्यू होती है, ‘सेंस वेल्यू’ अथवा ‘न्यूसेंस वेल्यू’ अर्थात् सृजन मूल्य एवं विनाश मूल्य। प्रबन्धन का सही अर्थ न्यूसेंस वेल्यू का ही प्रबंधन है। विनाश को रोकना या विनाश का प्रबंधन एक अर्थों में सृजन की स्थापना ही है। जंजीर की मजबूती उसकी सबसे कमजोर कड़ी पर निर्भर करती है। संसार में कहीं भी चले जाएँ आपको मित्र एवं शत्रु हर जगह मिलेंगे। लोग ऐसा सोचते हैं, जगह बदलने से उनकी तकलीफें कम हो जाएंगी, पर ऐसा होता नहीं। इस जीवन समरांगण में हर जगह ‘वही घोड़े-वही मैदान’ है। वस्तुतः अच्छे खिलाड़ी को भी मजा तभी आता है, जब सामने टक्कर का खिलाड़ी हो। मैंने उसी दिन प्रण कर लिया चाहे जितनी मुसीबतें क्यों न आएं, मैं दुर्जनसिंह को सबक सिखाऊंगा एवं उसे राह पर लाऊंगा। अगर इस नदी पर मैंने बांध बना दिया तो स्वयं उसकी जीवन-धुरी बदल जायेगी। शक्तिवान पुरुष असीम संभावनाओं से भरे होते हैं, बशर्ते उन्हें कोई सही मार्गदर्शक मिल जाए।
दूसरे दिन बैंक पहुँचते ही सबसे पहले मैंने मस्टर-रोल यानि हाजिरी रजिस्टर मंगवाया। दुर्जनसिंह को छोड़कर शाखा में सभी समय पर आ गए थे। मैंने बैंक के एक सीनियर क्लर्क मेहताजी को बुलाया और उनसे दुर्जनसिंह के बारे में पूछा। मेहताजी ने कहा, ‘‘सर! धीरे बोलिए, वो बदमाश तो रोज दो घंटे देरी से आता है, यही नहीं काम भी कुछ नहीं करता। शाम को रोज शहर के गुण्डों के साथ शराब पीता है, बैंक की अच्छी-अच्छी पार्टियों, शहर के बदमाशों एवम् यहां तक कि शहर की पुलिस से भी उसकी अच्छी पहचान है। सर! आप इसको मत छेड़िए, एक आदमी को कम मान लीजिए। इससे पंगा लेकर अपना जीवन खराब मत कीजिए। कीचड़ में पत्थर डालेंगे, छीटें आप पर ही आएंगे। आप अपना समय चुपचाप यहां शांति से निकाल लीजिए। पहले भी किसी मैनेजर ने इसको नहीं छेड़ा, आप भी चुप रहें, आगे आपकी इच्छा।’’ मेरे आत्माभिमान पर गहरी ठेस लगी। मेरे कर्तव्य एवं जमीर ने कहीं गहरे से मुझे पुकारा। मैंने मेहताजी को अपनी सीट पर जाने को कहा, एवं उसी दिन युद्ध की दुंदुभी बजा दी, कोई भी स्टाफ मेम्बर बिना सूचना समय के बाद आएगा तो वो अनुपस्थित माना जायेगा, मैंने यह बात जान- बूझकर बीच हाॅल में आकर कही। मैंने उसी समय मस्टर पर दुर्जन के नाम के आगे ‘अनुपस्थित’ लिख दिया। मेरा निर्णय मेरे दुर्दिनों का श्रीगणेश था।
उस दिन दुर्जनसिंह रोज की तरह दो घण्टे देरी से आया। मेहता ने घुसते ही उसे सारी बात बता दी। शाखा में प्रबंधन एवं यूनियन के बीच का वही सेतु था। दोनों अपनी-अपनी बात उसी के मार्फत कहते थे। हर संगठन में ऐसे लोगों की एक विशिष्ट भूमिका होती है। सारी बात सुनकर दुर्जनसिंह आगबबूला हो गया। जीवन में पहली बार किसी ने उसके अहंकार एवं शक्ति को चुनौती दी थी। जैसे शिव-धनुष टूटने पर परशुराम जनक की सभा में आए, दुर्जनसिंह सीधा मेरे कैबिन में आया, ‘लगता है सर, आप मेरे को जानते नहीं? मुझे अनुपस्थित घोषित करने की आपकी हिम्मत कैसे हो गई? अब आगे जो कुछ होगा उसकी जिम्मेदारी आपकी होगी? ’’ तेज आँखों से घूरकर वह वहाँ से चला गया। उसका चेहरा क्रोध से तमतमा रहा था।
इसके पश्चात तो युद्ध यौवन पर आ गया। कभी यूनियन की हाय-हाय, कभी बैंक की चाबियाँ इधर-उधर छुपा देना, कभी बैंक के डोक्यूमेन्ट्स गायब कर देना, जाने क्या-क्या नहीं हुआ। एक दिन केबिन में बैठा हुआ था, तो कोई आकर बाहर से पत्थर फेंक गया। पूरा शीशा टूट गया, मैं बाल-बाल बचा। ग्राहकों से मिलकर हेडऑफिस तक मेरी झूठी शिकायतों का अम्बार लग गया। दुर्जनसिंह जो चाहता, वही होता। कोई उससे विरोध लेने को तैयार न था। हर दिन एक नया शगूफा, हर बार तिरस्कार का एक नया तरीका तैयार होता। मेरे खून का प्यासा दुश्मन भी मेरे ऊपर इससे घातक वार न करता। युद्ध का नशा एवं जोश उसके हृदय में उबाल ले रहा था। उफ! उसके आघात कितने निर्दय थे। उसके शक्ति-क्षेत्र से सभी परिचित थे। मैं अकेला अलग-थलग पड़ गया। जनरल मैनेजर ने भी स्टाफ रिलेशन को लेकर मुझे लताड़ा। मेरे साथ था तो सिर्फ सत्य, ईमानदारी एवं न्याय की ताकत जिसने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मेरे हौसले को जिन्दा रखा। घर जाता तो बीबी-बच्चों से चिड़चिड़ करता। पत्नी तीखी होकर कहती,एक आप ही को फिकर है अनुशासन की, अब तक जो भी आए मूर्ख ही थे। उसकी बातें घाव पर नमक का कार्य करती, पर मेरे संस्कार मुझे हिम्मत नहीं हारने देते। गीता का ज्ञान मेरी आत्मा पर दस्तक देता, जहां सत्य है, सत्य का रखवाला अर्जुन है, वहीं कृष्ण है, वहीं विजय है। इस जीवन संग्राम में युद्ध तो तुम्हें करना होगा। विश्वास का एक कदम आगे बढ़ाने वाले को नियति स्वयं ही मंजिल पर बिठा देती है। मैंने पूरी शक्ति एवं विवेक से आगे बढ़ने का निर्णय लिया।
अगले दिन ईश्वर का नाम लेकर मैं शहर के जिलाधीश सत्यप्रकाशसिंह से मिलने गया। वैसे तो उच्च प्रशासनिक अधिकारी अधिकतर लोगों को टरकाने का काम करते हैं, शायद इसी में वो अपनी ऊँचाई का दर्शन करते हैं, पर सत्यप्रकाशसिंह एक अलग तरह के इंसान थे। सारा शहर उनके चरित्र एवं ईमानदारी का गुणगान किया करता था। चारित्रिक दृढ़ता इंसान के साहस को द्विगुनित कर देती है, इसीलिए इलाके में उनके अनुशासन की तूती बोलती थी। नाम के अनुरूप ही उनके गुण थे। मेरा सौभाग्य था उस दिन वे फुरसत में थे। मैंने उन्हें अपनी सारी व्यथा सुनाई एवं उनसे प्रशासनिक मदद मांगी। मैंने उन्हें बताया कि अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में अपनी आत्मा की आवाज पर मैं आपसे मिलने आया हूँ, और आप ही मेरा अंतिम सहारा हैं। हम दोनों में कुछ देर बात हुई एवं आगे की रूपरेखा बन गई। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा एवं बेफिक्री से बैंक जाने को कहा। उस समय मुझे वो ‘अनुशासन के मसीहा’ लग रहे थे।
दुर्जनसिंह अब समय पर तो आने लगा था, पर घायल शेर की तरह हर वक्त मौके की तलाश में रहता था। वह अपनी हार को जीत में बदलने की फिराक में था। मिट्टी हिल गई पर ढही नहीं थी। जली रस्सी में अब भी अकड़न मौजूद थी। रोज की तरह आज भी मैं ऑफिस में आकर बैठा ही था कि उसने सभी स्टाफ मेम्बर्स को साथ लेकर नारे लगाने चालू कर दिए, जो हिटलर की चाल चलेगा, वो कुत्ते की मौत मरेगा। बैंक में नारे गूंज रहे थे, बैंक को खुले एक घण्टा हो गया, सारी पब्लिक इकट्ठी हो गई, पर कोई स्टाफ मेम्बर काम करने को तैयार नहीं। मैं आवेश में केबिन से बाहर आया एवं दुर्जनसिंह को अपनी सीट सम्हालने को कहा। वह तैश में बोला, ‘‘तेरे जैसे कई आए-कई गए, मैनेजरों को मैं जूते की नोक पर रखता हूँ। एक गुण्डे को इशारा कर दिया तो कहीं नाली में लाश सड़ी हुई मिलेगी।’’ अपनी हार को जीत में बदलने के लिए उसने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया। उसे पूरा यकीन था आज साहब की पतलून ढीली हो जाएगी पर मैं इसी मौके की तलाश में था। आज सबकी गवाही में उसने अभद्र शब्दों का प्रयोग किया था। मैंने तुरन्त पुलिस को फोन किया, पुलिस बैंक में आयी एवं दुर्जनसिंह को घसीटते हुए ले गई। जिलाधीश ने मेरे इलाके के थानेदार को पहले ही निर्देश दे दिए थे। जो दशा शहर के गुण्डे की अपने मौहल्ले में पिटने से होती है, वहीं दशा दुर्जनसिंह की थी। उसका सिर झुक गया, आँखें गड गई, ऊपर की सांस ऊपर एवं नीचे की नीचे रह गई। मैं इतना कठोर निर्णय ले लूंगा, यह तो उसकी कल्पना से परे था। थाने में दुर्जनसिंह की अच्छी मरम्मत हुई।
उसी शाम मैंने जिलाधीश से पुनः सम्पर्क किया एवं उन्हें स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने मुझसे ‘प्रथम सूचना रिपोर्ट’ लिखवाने को कहा पर मैंने जिलाधीश से विशेष आग्रह किया कि मेरा उद्देश्य सिर्फ उसको सुधारने का है, वे उसे सुधरने का एक मौका दें। उसके परिवार के साथ मैं अन्याय नहीं करना चाहता था। सत्यप्रकाशसिंह ने अनुकंपा कर मेरी बात मान ली। सज्जनों का हृदय नवनीत की तरह होता है। उन्हें मेरी बात युक्तिसंगत लगी। हिदायत देकर दुर्जनसिंह को उसी रोज छोड़ दिया गया।
समय निरन्तर प्रवाहमान है। दिन बीते, महीने बीते एवं वर्षों ने भी दम तोड़ा। माउंट आये मुझे चार वर्ष हो चुके थे। आज की डाक खोली तो उसमें मेरे जयपुर स्थानान्तरण के आदेश थे। दुर्जनसिंह अब शाखा का सबसे अच्छा कामगार था। उस वाकिये के बाद उसका जीवन बदल गया। अहंकार एवं अभिमान की परतें टूट गई। उसके भीतर का दुर्जन अब मर चुका था। वहां अब एक विनम्र, कर्मठ सृजक ने जन्म ले लिया था।
मेरे विदाई समारोह में सबकी आँखें सजल थी। समारोह की सारी तैयारियां दुर्जनसिंह ने की। पूरे परिसर को फूलों से सजाया गया। विदाई की अंतिम सौगात, पुष्पहार पहनाते समय दुर्जनसिंह ने मेरे पाँव पकड़ लिए एवं बरबस रो पड़ा। उसके आँसुओं के तार बंध गए। विदाई संदेश में उसने यही कहा ‘‘सर! अब तक आए सभी मैनेजरों में मेरे जीवन को बदलने वाले तो आप ही आए। मैं सही अर्थों में आपका उपकृत हूँ, आपने मुझे नयी दृष्टि दी अन्यथा मेरा जीवन विनाश का प्रतिबिम्ब बन जाता। मैं भाव विह्वल हो उठा। उस समय उसको लेकर जैसे मेरा पुत्र-स्नेह जागृत हो गया। उसके कपोलों पर बहते प्रेमाश्रुओं में मेरी आत्मा भीग गई। गद्गद् मैंने उसे गले से लगा लिया।
संसार में अहंकार राजा रावण का भी नहीं रहा। यहाँ पाषाण भी पिघलते हैं। जीवन को समझने से भी कठिन है जीवन का निर्माण करना। हर युग का रावण उस राम की तलाश में है जो उसकी उच्छृंखलताओं पर अंकुश रख सके। सदियाँ बीत गई, अभी भी हर घोड़े को अपने ‘घुड़सवार’ की तलाश है।
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15.02.2002
