जिस दीये की लौ ईश्वर की कृपा के साये में सुरक्षित हो, उसे कौन बुझा सकता है?
‘छोटू उस्ताद’ न तो किसी दाँव-पेच सिखाने वाले पहलवान का नाम है, न ही किसी शहर-मौहल्ले के ऐसे शातिर गुरु का, जिसके कई शागिर्द हो। यह नाम तो मैंने ही प्यार से उसका रख दिया था। उसका असली नाम तो ‘आनन्द’ था, पर उसके छोटे कद एवं गठे शरीर को देखकर मैंने ही उसका नया नामकरण छोटू उस्ताद कर दिया था। उसके रूप, गुण के अनुरूप यह नाम उस पर फबता भी था।
गत दो वर्षों से रोज सुबह सब्जी लाने की ड्यूटी मेेरी ही थी। दो वर्ष पहले, दो-चार रोज उच्च रक्तचाप क्या हो गया, डाॅक्टर ने सीधी हिदायत दे दी, ‘‘उपाध्याय साहब ! कल से ही दो-तीन किलोमीटर ‘मोर्निंग वाॅक’ चालू कर दीजिए वरना और कई बीमारियाँ बिन बुलाये चली आएंगी। बस यह समझ लीजिए उच्च रक्तचाप, ट्रेफिक सिग्नल की हरी और लाल बत्ती के बीच की पीली बत्ती है। अगर चालीस के पार चैन से जीना है तो घी तेल बंद, एवं मोर्निंग वाॅक शुरू।’’ डाॅक्टर तो कहकर चला गया पर घबराहट विरासत में छोड़ गया। कई हृदय रोगियों की दुर्दशा मैंने देखी थी। रोज सुबह ऑफिस जाते वक्त कई बार, मोर्निंग वाॅक से लौटते ऐसे लोगों के दर्शन होते थे। दार्शनिक आँखें, सर पर टोपी, हाथ में छड़ी एवं मुख पर कृत्रिम मुस्कराहट स्वयं उनकी दास्तां बयां करती। सूर्योदय के समय भी उनके चेहरे पर सूर्यास्त नजर आता फिर दिन में तीन-तीन बार नियम से टेब्लेट्स लो, हर सप्ताह डाॅक्टर को चैक-अप करवाओ। यही नहीं जेब में हर समय एक जीवन रक्षक गोली ‘आईसोरबाईब’ रखो, चाहे आप बाथरूम में ही क्यूं न हो। अपने लिए भी बोझ और घर वालों के लिए भी। बार-बार घर वालों को हिदायत और देना, देखो! मैं मर जाऊँ तो गुड़िया की शादी अच्छी जगह करना, गुड्डू का ध्यान रखना, बेटे-बहू को प्रेम से रखना , मेरी तस्वीर यहां दीवार पर लगाना, रोज साफ करना, ऊपर चंदन की माला पहनाना, आदि-आदि। कई रोगियों को तो मैंने शोक-सन्देश तक तैयार करते देखा था। वे साथ में खिंची हुई दो पासपोर्ट साईज फोटो भी रखते थे। पता नहीं बेटे-बहू को समय पर क्या जंचे, बिना फोटो ही शोक-सन्देश दे दें, मरने के बाद बाप थोड़े ही देखने आता है।
कल्पना ने यमदूत रच डाले। लगा अपने दूतों के साथ भाले-बरछी लिये, भैंसे पर विराजमान यम मेरे दुर्भाग्य की गदा हाथ में लिए द्वार पर ही खड़ा हो। श्रीमतीजी ने मोर्चा और सम्हाला, ‘‘मैं रोज कहती थी, खाने पीने का ध्यान रखा करो, वर्जिश किया करो, पर किसे परवाह है। घर की मुर्गी दाल बराबर। अब तो मुझे ही खबर लेनी होगी।’’ कल से रोज सुबह फल-तरकारी लेने सब्जी-मण्डी जाया करो वरना मैं अब सब्जी बनाने वाली नहीं। इस बहाने घूमना भी हो जायेगा एवं सेहत भी ठीक रहेगी।’’ ऐनक के पीछे उसकी आँखों में रुआब अधिक एवं करुणा कम नजर आ रही थी। शादी के कुछ वर्षों तक पत्नी प्यार देती है, फिर निर्देश एवं बाद में आदेश। बच्चे ज्यों-ज्यों जवान होते हैं, बीबी अपने पीछे एक खड़ी फसल तैयार देखती है। धीरे-धीरे उसके निर्देश, आदेश में परिवर्तित हो जाते हैं।
एक आज्ञाकारी पति की तरह दूसरे दिन से ही मैंने सब्जी-मण्डी जाना प्रारंभ कर दिया। मोर्निंग वाॅक वास्तव में एक विलक्षण अनुभव था। उगते हुए सूर्य, कलरव करते पक्षी, उल्लास से अपने काम पर जाते मजदूर, वर्जिश करते जवान, चित्ताकर्षक मालूम होते। जब भी उगते हुए सूर्य को देखता मेरा आह्लादित मन परमात्मा के प्रति श्रद्धा से भर उठता। सुबह प्रकृति का सौन्दर्य चरम पर होता है। लगता प्रकृति की भाषा ही परमात्मा की भाषा है।
पहले दिन ही सब्जी-मण्डी में अपने ठेले पर खड़े, एक लड़के ने मेरा मन मोह लिया। उम्र बारह-तेरह वर्ष, गठा शरीर, आत्माभिमान से भरी बड़ी-बड़ी आँखें, कन्धे पर गमछा लगाये वह बरबस लोगों का ध्यान खींच लेता। सब्जियों पर पानी छिड़कते अपनी बोली से बलात् भीड़ का ध्यान अपनी ओर कर लेता, ‘‘बाबूजी, फलों का राजा आम लीजिए! गुजरात की ‘केसर केरी’ है, खाकर बूढ़े भी जवान हो जाते हैं। इलाहाबाद के अमरूद लीजिए, मेम के गाल जैसे कश्मीर के सेव, ताज लगा बैंगन लीजिए, शिमला की रानी हरी मिर्च लीजिए।’’ जाने क्या-क्या बोलता ही जाता था। उसकी उपमाएँ साहित्यकार को भी लजाती। वाणी में वशीकरण मंत्र बसा था, आँखों में सम्मोहन का जादू। मैं झोला हाथ में लिए बरबस उसकी ओर बढ़ा।
‘‘आम क्या भाव हैं? केसर असली तो हैं?’’
‘‘सही असली हैं बाबूजी! यहां नकली माल बेचते ही नहीं। लकड़ी की हाण्डी बार-बार नहीं चढ़ती।’’
‘‘और ये सेव क्या भाव हैं?’’
‘‘भाव क्या पूछते हैं बाबूजी, आप तो शक्ल से दानी लगते हैं। बच्चा दो पैसे ज्यादा कमा लेगा तो पुण्य आपको ही लगेगा।’’
‘‘छोटू उस्ताद!’’ यकायक मेरे मुँह से यह सम्बोधन निकला। उसके बोलने का अंदाज ही कुछ ऐसा था। विलक्षण वाक्पटुता से भरी उसकी जिह्वा थी। उसके बाद से तो मैं उसे छोटू उस्ताद ही कहने लग गया। एक बार उसने कहा भी, ‘‘बाबूजी, मेरा नाम तो आनन्द है पर आप छोटू उस्ताद कहते हो तो मुझे बहुत अच्छा लगता है।’’ उसकी बाल-सुलभ बातें मुझे प्रसन्नता से सराबोर कर देती। यथा नाम तथा गुण, नाम के ठीक अनुरूप वह सदैव हंसता, मुस्कुराता, आनंद बिखेरता नजर आता। अब मैं उसका पक्का ग्राहक हो गया। शुरू-शुरू में आस-पास के ठेले वालों ने मुझे तोड़ने की कोशिश भी की, पर छोटू उस्ताद का कोई ग्राहक टूटने वाला नहीं था। एक समय के बाद मैंने उससे भाव-ताव करना भी बंद कर दिया। दरअसल सहज व्यापारिक वृत्ति के कारण प्रारंभ में मैंने होशियारी दिखाते हुए भाव-ताव भी किया पर बाद में मेरे अन्तर्मन ने ही इस पर रोक लगा दी। ठेकेदारी के धंधे में भगवान ने छप्पर फाड़कर आमदनी दी थी। सोचता, इंसाफ को खा जाने वाले, रिश्वतखोर सरकारी अफसरों की जेबें भी जब गर्म करनी पड़ती है तो इस बालक ने ऐसा क्या किया है ? यह कोई उम्र है इसके कमाने-खाने की? अभी तो इसके खेलने-कूदने, पढ़ने के दिन हैं फिर भी मेहनत करके यह न जाने किस मजबूरी का मारा कमरतोड़ मेहनत कर रहा है? क्या मेरे बच्चे को मैं इस स्थान पर देख सकता हूँ ? अगर ये दो पैसे ज्यादा कमा लेगा तो अच्छा ही है, मेरी लापरवाही के कारण कुछ तो उसकी दुविधा कम होगी। उससे भाव-ताव करने के लिए मेरी आत्मा ने निषेध कर दिया।
हमारी मुलाकातें धीरे-धीरे स्नेह में बदल गई। मेरे हृदय में उसके प्रति एक ऐसा स्नेह अंकुरित हो रहा था जो स्वयं मेरे लिए अवर्णनीय है। उसके मंत्र-मुग्ध हाव-भाव मुझे भावुक कर देते, लगता किसी पूर्व जन्म में वो मेरा ही अंश हो। एक बार उसकी बिक्री नहीं हो रही थी तो मैं जानबूझकर कुछ रुपये छोड़ आया। थोड़ा ही आगे बढ़ा था कि वो बेतहाशा दौड़ता हुआ मेरे पीछे आया। तपाक से बोला, ‘‘बाबूजी, आप इतने सारे रुपये ठेले पर भूल आए हैं।’’ उसके चेहरे पर बिखरा संस्कारों का आलोक मुझे गद्गगद् कर गया। इतनी तकलीफ में भी उसकी नीयत नहीं बदली, इस विपन्नता में भी वह नहीं डिगा। एक बार मैं उसके लिए गुड्डू के पुराने कपड़े भी ले गया। गुड्डू उसकी ही उम्र के आस-पास था, पर उसने लाख कहने पर भी कपड़े नहीं लिये, ‘‘माँ-बाबूजी ने मना कर रखा है।’’ उसकी सीधी बात सुनकर मैं झेंप गया। मुझे दुःख न हो अतः मुस्कुराते हुए बोला, ‘‘इस दिवाली पर आपसे नया पेन्ट-शर्ट लूंगा, जैसे आपका गुड्डू आप से लेता है।’’ स्वाभिमान के उस पहाड़ के आगे मैं नतमस्तक हो गया। इतना कष्ट सहकर भी गरीबी उसकी आत्मा का पतन नहीं कर सकी, जमीर अब भी जिन्दा था।
मैं वर्षों से निर्माण कार्यों के सरकारी ठेके लेने का कार्य करता था। सौभाग्य से इस बार एक बहुत बड़ा काॅन्ट्रेक्ट हाथ लगा। इतना बड़ा ठेका मिलना मेरी कल्पना से भी परे था, लगा जैसे लाॅटरी लग गई। मेरे कार्यक्षेत्र में भी अंगदी पाँव जमाने का यह सुनहरा मौका था। मैं दिन-रात काम में लग गया। काम की आपा-धापी में एक माह तक सब्जी लेने नहीं जा सका। सुबह-सुबह छोटू उस्ताद मेरे ख्यालों में कई बार आता, मोर्निंग वाॅक का आनन्द भी मुझे पुनः पुकारता पर यह काॅन्ट्रेक्ट मेरी प्रतिष्ठा का प्रश्न था। एक माह में मैंने काम की पूरी योजना बना ली। काम मुलाजिमों एवं अन्यों में बाँट दिया। अब मुझे सिर्फ देखभाल करनी थी। मैंने पुनः मोर्निंग वाॅक एवं सब्जी लाने की ड्यूटी प्रारंभ करने का निश्चय किया।
अगली सुबह मैंने सब्जी मण्डी की राह ली। छोटू उस्ताद से मिलने की उत्कण्ठा मेरी चाल को और तेज कर रही थी। मैं सीधा वहीं पहुँचा जहां वह रोज ठेला खड़ा करता था पर देखकर हैरान रह गया-वहाँ छोटू उस्ताद नहीं था। मैं उसे ऐसे ढूंढने लगा जैसे स्वयं मेरा पुत्र भीड़ में खो गया हो। अजीब से विचार मेरे मन में कौंधने लगे। उसके बारे में जानने को मैं अधीर हो उठा। मैंने पास खड़े ठेले वाले से पूछा, ‘‘छोटू उस्ताद कहां है?’’ सभी ठेले वाले जानते थे कि मैं उसे छोटू उस्ताद कहता हूँ। उत्तर मिला, ‘‘बाबूजी, वह बीस दिन से बीमार है, उसे जन्म से ही दिल की कोई बीमारी है। इन दिनों साँस लेने में भी बहुत परेशानी होती है, बस खटिया ही पकड़े है। ’’ विस्मय से मेरी आँखें फैल गई, मन काँप उठा। ठेले वाले से पता लेकर मैंने छोटू उस्ताद के घर की राह ली। मैं यह सोच कर परेशान था कि उसने अपनी बीमारी का जिक्र क्यों नहीं किया? इतनी बीमारी में भी वह सदैव हँसता, मुस्कुराता, महकता हुआ फूल नजर आता था। अपनी दुरवस्था एवं जख्मों का उसने कभी बयान नहीं किया। मुझे स्वयं पर भी बहुत गुस्सा आ रहा था कि मैंने उसके बारे में जानने की कोशिश क्यों नहीं की ? मेरी निष्ठुरता मुझे धिक्कार रही थी।
मैं उसके घर पहुँचा। छोटू उस्ताद एक खटिया पर पड़ा गहरी सांसें ले रहा था। घर में मुश्किल से चार-पांच लोहे के बर्तन, कुछ फलों की टोकरियां, और ऐसी ही कुछ वस्तुएँ रखी थी। सभी उसकी विपन्नता की कहानी कह रही थी। पास ही फटेहाल एक अधेड़ उम्र का आदमी एवं एक अपंग महिला बैठी थी। मुझे देखते ही छोटू उस्ताद की आँखें सजल हो उठी। अपनी सारी आत्मशक्ति को बटोर कर उसने मुस्कुराने की असफल कोशिश की पर एक निरीह बालक इतना दर्द कैसे सहन करता ? एक डाॅक्टर भी वहाँ स्टूल पर बैठा था, शायद बस्ती के दो-चार लोग मिलकर उसे ले आए थे। स्थिति समझने में मुझेे देर नहीं लगी। मैंने डाॅक्टर से बाहर आने का निवेदन किया एवं वस्तुस्थिति बताने का आग्रह किया। डाॅक्टर नेे बताया कि वह ‘ब्ल्यू बेबी’ है एवं जन्म से ही उसके हृदय में छेद है। अब उसका ऑपरेशन तुरन्त जरूरी है, जिसके लिए दो लाख रुपये की जरूरत होगी। बस्ती वालों ने मुझे बताया कि अन्दर बैठे उसके पिता अंधे है एवं माँ एक हाथ से लाचार है। बस यही उनका एकमात्र सहारा है।
छोटू उस्ताद के जीवन के इस पहलू को जानकर मैं अवाक् रह गया, जैसे कलियुग में श्रवणकुमार ने पुनः जन्म लिया हो। इस समय मुझे वह आसमान की ऊँचाइयों में चमकता एक नक्षत्र लग रहा था। वह अन्दर पड़ा कराह रहा था, बाहर मेरे मन मस्तिष्क में समुद्र मंथन चल रहा था। यह दीये और तूफान की लड़ाई थी। मेरे हृदय में छोटू उस्ताद का कद आज बहुत बढ़ गया था। दरअसल आज अपने कद को मैं उसके सामने बहुत छोटा पा रहा था। एक बालक के संघर्ष एवं जिम्मेदारी वहन करने के हौसले से मैं अभिभूत हो गया। मैंने उसी वक्त निर्णय कर लिया। यह दीया पैसे की कमी के कारण नहीं बुझ सकता। मैंने ऑपरेशन का सारा खर्च स्वयं वहन करने का निर्णय ले लिया। अपनी दुआओं के सारे खजाने को समेट कर जीवन में शायद पहली बार, दिल की गहराइयों से, मैंने उस परवरदिगार की रहमत को पुकारा जो सारी दुनिया का रहनुमा है। हे ईश्वर! हम तेरी ही इबादत करते हैं, तुम्ही पर ईमान लाते हैं एवं तुझ ही से मदद मांगते हैं।
ईश्वर बड़ा मेहरबान, निहायत रहमवाला है। वह बिना कानों सब कुछ सुनता है, बिना पाँवों सब जगह चलता है एवं बिना हाथों सब कुछ कर जाता है। उसकी करनी अलौकिक है, उस दयानिधि की माया वर्णनातीत है।
सच्चिदानंद घन परमात्मा सुख-स्वरूप एवं आनन्द-स्वरूप है। सूर्य से कभी अंधकार नहीं निकल सकता, वह तो सिर्फ रोशनी ही देता है। जो उसकी पनाह लेता है, निःसंदेह महफूज रहता है। छोटू उस्ताद का ऑपरेशन सफल रहा। पन्द्रह दिन में उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई, शीघ्र ही वह भला-चंगा हो गया।
मैं फिर सब्जी-मण्डी में एक ठेले के आगे खड़ा था। छोटू उस्ताद का शरीर एवं मेरी आत्मा नई सुगन्ध से महक रही थी। उसकी उपकृत आँखें जैसे कह रही थी, ‘बाबूजी आप मेरे भगवान हो।’ मैं और अधिक नहीं ठहर सका, आज तुरन्त सब्जी लेकर घर आ गया। एक विचित्र आनन्द आज मेरी आत्मा को आलोकित कर रहा था।
अगले दिन से मैंने मोर्निंग वाॅक की राह बदल ली।
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21.03.2002
