सम्मोहन

दिनेश की बीमारी को लेकर अंततः जब मुम्बई के सभी नामी डाॅक्टरों ने जवाब दे दिया तो शैलेन्द्रसिंह वर्मा एवं कौशल्या का रोम-रोम काँप उठा। क्या उनके एकमात्र पुत्र को इतना कष्टकर जीवन बिताना होगा?

मुम्बई रोगियों की तीर्थ-स्थली है। असाध्य से असाध्य रोगों का यहाँ इलाज हो जाता है। यहां की आबो-हवा ही कुछ ऐसी है या यूं कहिए रोगों पर विशेषज्ञ डाॅक्टरों की ऐसी गहरी पकड़ है कि हर शहर का हारा-थका रोगी यहां से सुधर कर जाता है। वर्मा दम्पति का तो यह अपना शहर था, पीढ़ियों से यहीं बसे थे।

डाॅक्टरों ने प्रयासों में कोई कोर-कसर नहीं रखी। बीमारी पर चर्चा हेतु विशेषज्ञ डाॅक्टरों की एक बैठक भी आयोजित की गई पर सभी नेे हाथ खड़े कर दिए। सभी की स्पष्ट राय थी, हम जितना कर सकते थे कर चुके, इससे आगे ईश्वर ही अवलम्ब है। नियति की क्रूर लेखनी ने एक हँसते-खेलते परिवार की सारी खुशियाँ पल भर में छीन ली। कठोर भाग्य को एक अबोध बालक पर जुल्म करने में जरा भी रहम नहीं आया।

भावी प्रबल है, विधि विधान के आगे किसी का बस नहीं। वर्मा परिवार पर जैसे बिजली गिरी, जीवन की गति थम गई। इलाज और सेवा दोनों में कोई कसर नहीं छोड़ी, बेहिसाब पैसा खर्च किया, रात-दिन एक कर दिये, पर दैव एवं ईश्वरीय विधान के आगे दोनों हार गए। दुर्भाग्य से लड़ते दोनों थक गए, अंततः उन्होंने भी हथियार डाल दिए। वर्मा दंपति को अब दूर तक घना अंधियारा ही नजर आता, आशा की कोई किरण दृष्टिगोचर नहीं होती थी। कुछ फूल खिलने के पहले ही मुरझा जाते हैं, कुछ जीवन जीने के पहले ही उजड़ जाते हैं। बसन्त की प्रतीक्षा में कभी-कभी पतझड़ आ जाता है।

कोई अधिक समय नहीं हुआ। दो वर्ष पहले की बात है जब दिनेश इण्टर-स्कूल दौड़ प्रतिस्पर्धा में प्रथम पुरस्कार की शील्ड लेकर दौड़ता हुआ घर आ रहा था। घर पहुँचने की जल्दी में हिरन की तरह कुलांचे भर रहा था। पांव हवा से बात कर रहे थे, पैरों में जैसे घोड़े की टांगें लगी हों। उत्साह एवं उमंग के मारे उसकी सांसें नहीं थम रही थीं। घर में घुसते ही मम्मी को बाँहों में भरकर ऊपर उठा लिया, ‘‘मम्मी! मैं दौड़ स्पर्धा में पूरे मुम्बई में प्रथम आया हूँ। यह शील्ड मैंने जीती है।’’ उसकी आँखें गर्व से प्रदीप्त थी, वाणी आत्माभिमान से परिपूर्ण होकर छलक रही थी। शब्द मुँह में नहीं समाते थे। भावातिरेक,कौशल्या अपने हृदय की खुशी नहीं समेट पा रही थी। पास खड़े शैलेन्द्रसिंह भाव-विभोर हो रहे थे। किस माँ-बाप का सर पुत्र की उपलब्धि से ऊपर नहीं उठता ? अभी तेरह वर्ष में ही उपलब्धियों का ऐसा अम्बार है तो आगे क्या होगा? बहुमुखी प्रतिभा का धनी ऐसा होनहार पुत्र पाकर कौन माँ-बाप धन्य नहीं होते। पढ़ाई में भी अव्वल, खेल-कूद में भी अव्वल, अन्य गतिविधियों में भी अव्वल। वाद-विवाद एवं लेखन प्रतियोगिता में भी जाने कितने प्रमाण-पत्र दिनेश के पास थे। गत वर्ष उसे ‘जेम ऑफ दि स्कूल’ अवार्ड भी मिला था। वर्मा परिवार का तो जैसे वह कुलदीपक था।

अच्छे दिन सदैव नहीं रहते। आदमी कुछ और सोचता है, विधाता के मंसूबे कुछ और होते हैं। अभी इस बात को दो माह ही बीते होंगे कि वर्मा परिवार पर गाज गिरी। दिनेश एक दिन स्कूल से तरबतर भीगते हुए आया। सावन की पहली फुहार थी, सहपाठियों के साथ मस्ती में खो गया। सभी इतने भीगे कि अंततः क्लास टीचर को कहना पड़ा, ‘‘बच्चों! बाहर बस इन्तजार कर रही है, अब तुरन्त घर पहुँचो। ऊपर तेज बारिश चढ़ी है, चारों और काले बादल उमड़े हुए हैं।’’ बच्चे वहां से तो चल पड़े पर बाहर आकर फिर तेज फुहार में खड़े हो गए। बचपन मस्ती का दूसरा नाम है। अंततः क्लास टीचर ने फिर बाहर आकर लताड़ा तो सभी बस में बैठ गए। स्कूल मलाड वेस्ट में था एवं फ्लैट गोरेगाँव वेस्ट में। बस मलाड से सीधे गोरेगाँव स्टाॅप पर रुकती थी। बस स्टैण्ड से ‘नवनीत बिल्डिंग’ दो सौ कदम पर थी, इसी बिल्डिंग के दसवें माले पर वर्मा दंपत्ति का शानदार फ्लैट था। रास्ते भर बारिश की झड़ी लगी थी। लोग अपनी-अपनी छतरियों को ताने यहां-वहां भागते नजर आ रहे थे। रास्ते भी पानी से भर गये थे। बिल्डिंग में घुसकर दिनेश सीधे लिफ्ट से अपने फ्लैट पर आया, बेल बजाई, कौशल्या ने उसे तुरन्त अन्दर लिया। भागकर तौलिया लेकर आई एवं तुरन्त कपड़े बदलने को कहा।

दिनेश ने तुरन्त कपड़े बदले। खाना खाने बैठा ही था कि छींकें आने लगी। शाम तक बुखार चढ़ा, बदन तपने लगा। कौशल्या ने थर्मामीटर लगाकर देखा, बुखार ‘एक सौ चार’ डिग्री था। यह सीधे घबराने वाली बात थी। उसने तुरन्त फेमिली डाॅक्टर गर्ग को फोन किया। डाॅ. गर्ग ने इसे सामान्य बुखार समझा। एक दो एनालजेसिक एवं पेरासिटामोल टेब्लेट्स दे दी, बोले, ‘‘घण्टे-दो घण्टे में बुखार उतर जाएगा।’’ आश्चर्य! दवाई लेने के बाद भी शरीर तवे की तरह तप रहा था। शैलेन्द्रसिंह कारोबार के सिलसिले में शहर से बाहर गए हुए थे। घर में और कोई नहीं था। कौशल्या ने एक बार फिर डाॅ. गर्ग को फोन किया। डाॅ. गर्ग ने पुनः आश्वस्त किया, ‘‘मिसेज वर्मा, इत्मीनान रखिए, एक-दो डोज में बुखार उतर जाएगा। सुबह तक एकदम ठीक हो जाएगा।’’

मगर ऐसा नहीं हुआ। सारी रात दिनेश बड़बड़ाता रहा, कौशल्या पास बैठी सर पर ठण्डी पट्टी करती रही पर बुखार बरकरार था। आसमान में बादल धम-धम कर रहे थे, बिजलियाँ कौंध रही थी। दुर्भाग्य के काले बादल वर्मा परिवार पर अब मंडराने लगे थे। जब सुबह तक भी बुखार नहीं उतरा तो कौशल्या काँप उठी। एक अप्रत्याशित भय से लाल को छाती से लगा लिया। दिनेश अब भी कराह रहा था। वह हौसला देते हुए बोली, ‘‘सब ठीक हो जाएगा दिनेश! मैं फिर डाॅ. गर्ग को फोन करती हूँ। आज शाम तक तुम्हारे पापा भी आ जाएंगे।’’ दिनेश ने कातर आँखों से माँ की तरफ देखा, आँखें जैसे डूब रही थी। कौशल्या ने पुनः थर्मामीटर से बुखार देखा-एक सौ पाँच डिग्री। पाँव तले जमीन सरक गई। उसने पुनः डाॅ. गर्ग से सम्पर्क किया, इस बार उन्होंने उसे तुरन्त अपने नर्सिंग होम लाने के लिए कहा। सारे पेथोलोजिकल टेस्ट किये गए। कोई खास बात नहीं थी, पर बुखार शाम तक भी नहीं उतरा। बाद में विशेषज्ञ बुलाये गए, शाम तक शैलेन्द्रसिंह भी आ गए। विशेषज्ञों ने अपनी राय दी कि यह एक विशेष तरह का दिमागी बुखार है। सबकी राय के अनुसार इलाज बदला गया। कुछ समय में बुखार तो उतर गया, पर अब एक अन्य समस्या उपस्थित हो गई। तेज बुखार के कारण दिनेश के दोनों पाँवों की माँसपेशियों ने काम करना बन्द कर दिया, एक तरह से पाँवों को लकवा हो गया। आगे पूरे एक माह तक डाॅक्टरों, विशेषज्ञों ने पूरी मेहनत की पर पाँव जस के तस निढाल थे, हिलना-डुलना भी बंद हो गया। शैलेन्द्रसिंह शहर के जाने-माने धनाढ्य व्यवसायी थे पर इतनी अथाह सम्पत्ति के होते हुए भी विधि-विधान के आगे मजबूर थे। दिनेश पर कोई इलाज कारगर नहीं हो पाया।

व्हील चेयर ही अब दिनेश की एकमात्र संगिनी थी। क्या-क्या सपने शैलेन्द्रसिंह एवं कौशल्या ने उसके लिए नहीं देखे ? जो हिरन की तरह कुलांचे भरता था, आज दुर्भाग्य के आगे विवश था। दिनेश माँ-बाप की इस व्यथा को देखता, घण्टों सोचता, हर संभव प्रयास करता पर उसका शरीर उस लम्बे वृक्ष की तरह था जिसकी जड़ें धरती में धंसी थी पर टहनियाँ आसमान छूना चाहती थी।

इंसान के धैर्य, बुद्धि की परीक्षा विपरीत परिस्थितियों में ही होती है। दिनेश ने विधि की इस विडम्बना को चुनौती की तरह लिया। जीवन की इस भीषण परीक्षा में भी वह खरा उतरना चाहता था, हमेशा की तरह अव्वल आना चाहता था। वह अक्सर सोचता-क्या मैं अपने माता-पिता के स्वप्नों को यूँ ही चूर कर दूंगा? क्या मैं उनके स्वप्न महलों को यूँ ही ढहा दूंगा? लोगों की सहानुभूति उसे और तड़फाती। सहानुभूति के वाक्य उसे तीर की तरह लगते। पापा-मम्मी का बुझा हुआ चेहरा देखता तो तड़प उठता। वह उन लोगों मैं नहीं था जो ईश्वर के सामने याचक बनकर खड़े हो जाते हैं, वो बेबस भिखारियों की गिनती में नहीं खड़ा होना चाहता था। उसे तो अपने तदबीर की ताकत पर भरोसा था। वह जानता था कि ईश्वर उनकी मदद करता है जो स्वयं अपनी मदद करते हैं। ईश्वर की पूजा-पाठ करने वाले ही अगर उपलब्धियों के शीर्ष पर खड़े होते तो दुनिया के सारे पुजारी गणमान्य, अग्रगण्य लोगों में होते। पत्थर पूजने से ईश्वर नहीं मिल सकता। हाँ, हमारी तदबीर की ताकत से पत्थर पिघल अवश्य सकता है।

ईश्वर हर शख्स की आजमाइश करता है। जो उसकी आजमाइश से विचलित नहीं होते, जो मुसीबतों का पूरे हौसले से डटकर सामना करते हैं, जिनके इरादे अचल एवं अटल हैं, वे ही उसके स्वर्ग के अधिकारी बनते हैं। तकदीर के ताले की चाबी सिर्फ तदबीर है। दिनेश ने जिंदगी की इस विडम्बना से अकेले ही लड़ने का निश्चय कर लिया।

उसने अपने मन को एक नये विश्वास से स्फूर्त करना प्रारंभ किया। व्हील चेयर पर बैठा वह जब भोर के उगते सूरज को देखता तो उसे लगता जैसे आशा की किरणें फूट रही हैं। आसमान पर पंख फैलाकर उड़ते रंग-बिरंगे पक्षी सुख-संदेश लाते नजर आते। रात्रि के तारे उसे उमंगों से भरे हुए लगते। चन्द्रमा की किरणे अंधेरे में घुलकर प्रकाश फैलाती नजर आती। एक नये उल्लास से उसका जीवन भर उठा। उसने ठीक होने का निश्चय कर लिया।

इंसान की वैचारिक शक्ति असीम है। हमारा शरीर हमारे दिमाग का दास है। हमारे जीवन का सारा सुख-दुःख हमारे विचारों का ही रचा हुआ है। दुःख उसके नजदीक नहीं आता जो दुःखी होने से इंकार कर देता है। हमारे घर में कोई अन्य व्यक्ति तभी घुसेगा जब हम कमजोर है। मजबूत व्यक्ति का दरवाजा खटखटाने में भी दम चाहिए। जिसका मन आशा से आप्लावित है, जिसके हृदय में उल्लास की उमंगें उठ रही हैं, वहां दुःख कब तक रहेगा ? इंसान में अगर इच्छा शक्ति है, अदम्य साहस है तो वह तूफानों से भी टकरा सकता है। मन के वन में अगर सुविचार सिंह जितने बलवान हैं तो दुर्विचार दूर से ही चले जाएंगे। दिनेश ने कमर कस ली, ‘‘मै ठीक हो सकता हूँ, मैं ठीक होकर रहूँंगा। अगर मेरी बीमारी का कारण दिमागी है तो इलाज भी दिमागी ही होगा।’’ आशाओं की डोर में बंधी उसके जीवन की पतंग आसमान के उत्कर्ष को छूने लगी। उसका हृदय एक नये ऊर्जा-स्रोत से भर गया।

अब वो हमेशा प्रसन्न एवं पुलकित रहने लगा। एकांत में बैठा घण्टों अपने पाँवों से बातें करता, ‘‘मेरे पाँव, तुम निराश नहीं होना। मैं जानता हूँ आज तुम बेबस हो, हिल-डुल नहीं सकते, पर विश्वास रखना कल ऐसा नहीं होगा। कल तुम्हारा है। कल तुम फिर हिलोगे, एक दिन चलोगे, एक दिन दौड़ोगे, तुम फिर स्कूल के सबसे अच्छे धावक बनोगे। यही नहीं, एक दिन तुम राष्ट्र के सबसे अच्छे धावक बनोगे। राष्ट्र तुम पर गर्व करेगा। तुम्हें देखकर लोग कहेंगे कि ये वे ही अश्व-पाँव हैं जिन्होंने राष्ट्र की कीर्ति पताका फहराई है। मेरे पाँव! तुम विश्वास रखो एक दिन ऐसा होगा। ऐसा होना ही है, तुम इसके लिए बने हो। इसी तरह वह घण्टों अपने पाँवों से पुनः पुनः बातें करता। शैलेन्द्रसिंह एवं कौशल्या के नेत्र उसको यूँ पाँवों से बाते करते देखकर आर्द्र हो जाते। शैलेन्द्रसिंह सोचते यह कैसा बावला है? कौशल्या उसके पास जाकर कहती, ‘‘बेटा! तुम अपने पाँवों से यह क्या बतियाते रहते हो? पाँवों के भी कोई कान होते हैं ?’’ पुत्र को समझा-बुझाकर वह चली जाती पर दिनेश रुकता कहां था, वह पुनः अपने पाँवों से बातें करने लगता। मनोविद् मानसिक रोगी पर जो सम्मोहन करते हैं, वही सम्मोहन की क्रिया वह अपने पाँवों पर करता।

विश्वास से पहाड़ हिलते हैं। एक दिन अद्भुत चमत्कार हुआ, सचमुच उसके पाँव हिलने लगे। शिव का सिंहासन डोल उठा। उसने तेज आवाज में मम्मी-पापा को पुकारा, ‘‘मम्मी देखो! मेरे पाँव हिलने लगे हैं, पापा देखो! मेरे पाँव हिलने लगे हैं।’’ डाॅक्टर अचम्भे में पड़ गए। थोड़े समय बाद पाँवों में एक नई जान आई, आज दिनेश उठ खड़ा हुआ। कहीं दूर धुंधभरी परत में दोनों हाथ फैलाये करुणा निधान ईश्वर उसे अपनी गोद में लेने के लिए खड़ा था। एक दो माह बाद वो चलने लगा, थोड़े समय में वह फिर दौड़ने लगा एवं वह समय भी आया जब उसके पाँव फर्राटे भरने लगे। असंभव, संभव हो गया। वह फिर इन्टर स्कूल प्रतिस्पर्धा में प्रथम आया। धुन का मतवाला वह वीर बालक रुका नहीं एवं अन्ततः वह दिन भी आया जिसकी उसे चिर-प्रतीक्षा थी। उसका चयन राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा में हुआ। इस प्रतिस्पर्धा में भी वह अव्वल रहा।
उस दिन वह राष्ट्र का सबसे तेज धावक बना।

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24.04.2002

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