ताबीर

आप सही मानें या गलत, मजाक माने या हकीकत, पर मैं अखिल विश्व को साक्षी रखकर कहता हूँ कि मेरा निधन हो चुका था। मैंने स्वयं भी इसकी पुष्टि करने हेतु अपने शरीर की च्योंटी काटने की कोशिश की पर तमाम प्रयासों के बावजूद हाथ नहीं उठ रहे थे। मैंने पलकें झपकाने की कोशिश की, पर पथरायी आंखों के ऊपर वे भी निढाल पड़ी थी। अंतिम प्रयास के रूप में मैंने जोर से चिल्लाने की कोशिश की, पर नाकामयाब रहा। मेरी श्वास थम चुकी थी, शरीर ठंडा पड़ चुका था एवं अकड़ता जा रहा था। परिजन, रिश्तेदार, बदहवास इधर-उधर भाग रहे थे। घर में कोहराम मचा हुआ था। बाहर लोग कानाफूसी कर रहे थे कि अचानक हृदयाघात से बंसल साहब का निधन हो गया है। अभी-अभी ऑफिस से आए ही थे कि सीने में तेज दर्द हुआ एवं बंसल साहब के प्राण-पखेरू उड़ गए। काॅलोनी के डाॅ. मेहता अभी-अभी उनकी मृत्यु की पुष्टि करके गए हैं।

मेरे ही सामने मेरी लाश पड़ी थी। अब तक शाम के सात बज चुके थे। किसी ने लाश के आगे दीपक जलाकर रख दिया था। थोड़े समय बाद किसी ने आकर लाश के चारों तरफ थोड़ी-थोड़ी हल्दी बिखेर दी एवं दीपक के पास ही अगरबत्ती स्टैण्ड पर चार-पाॅच अगरबती लगाकर रख दी। सारा वातावरण शोकमय हो रहा था। रात करीब आने लगी थी। धीरे-धीरे नाते-रिश्तेदार, मित्र भी आने लगे थे।

हमारे घर में ड्राईंगरूम एवं डाइनिंग हाॅल आपस में सटे हुए हैं, जब भी मेहमान आते हैं हम बीच का पर्दा लगा देते हैं। पर्दा हटाने के बाद ड्राईग एवं डाइनिंग स्पेस मिलकर एक लम्बा हाॅल बन जाता है।

मेरी पत्नी मानसी हाॅल के एक कोने में अन्य स्त्रियों के साथ बैठी रो-रो कर बेहाल हो रही थी। लड़का राजेश पिछले आधे घण्टे से रोते-रोते थक गया था, उसकी घिग्गी बंध गई थी, वह भी लाश के पास अन्य पुरूषों के साथ बैठा था। पुरूष हाॅल के आगे की तरफ मेरी लाश के इर्दगिर्द एवं स्त्रियां हाॅल के पीछे की तरफ बैठी थी। बेटी माधवी मम्मी के पास ही बैठी थी, रह-रहकर दोनोें आपस में लिपटकर रोते। आश्चर्य! मैं यह सब ड्राईंग रूम में रखी आराम कुर्सी ’टेगोर चेयर’ पर बैठे तटस्थ भाव से देख रहा था। रोज मैं इसी कुर्सी पर बैठता था, आज यह कुर्सी खाली थी। एक अज्ञात भय के मारे कोई इसके समीप नहीं आ रहा था। सारी स्थिति विचित्र एवं परम रहस्य से भरी नजर आ रही थी।

धीरे-धीरे मुझे सारी बात समझ में आई। मैं जो सबकुछ देख-समझ रहा था, वह मेरा शरीर नहीं, मेरी आत्मा थी जो परमात्मा से मिलन के महाप्रयाण के पूर्व इस देह और देह के उन बंधनों को देखने के लिए रूकी हुई थी जो मेरी इस जीवनयात्रा में मेरे सम्पर्क में आए थे। अपनी निराकार सत्ता के रूप में, मैं अब भी विद्यमान था। गीता में लिखी सारी बातें मुझे सत्य नजर आ रही थी। कृष्ण ने अर्जुन से सही कहा था, ’’मेरा ही एक अंश सभी जीव-भूतों में सनातन रूप में विद्यमान है। आत्मा रूपी यह अंश अजर, अमर, अविनाशी एवं नित्य है। वायु इसे सुखा नही सकती, शस्त्र इसे काट नहीं सकते, जल इसे गीला नहीं कर सकते।’’ सचमुच मैं इसी रूप में अवस्थित था। एक अद्भुत, अलौकिक शक्ति मुझ में सिमटी हुई थी। वहाँ उपस्थित सभी लोगों के भूत, भविष्य यहाँ तक कि पिछले जन्म तक की मुझे खबर थी। यही नहीं मैं स्पष्ट रूप से समझ पा रहा था कि कौन क्या सोच रहा है। एक अलौकिक साक्षात्कार था यह। संभवतः ईश्वर मुझे महाप्रयाण के पूर्व सत्य से साक्षात्कार करवाकर मेरी मोक्ष यात्रा सुगम करना चाहता था। मैं जीवनमुक्त अनुभव कर रहा था।

मुझे मरे अब तीन घंटे हो चुके थे। रात दस बजे होंगे। सभी बाहर के रिश्तेदारों को छोटे भाई विमल ने टेलीफोन से सूचित कर कर दिया था, सभी देर रात अथवा कल सुबह तक आने वाले थे। विमल मुझ से तीन वर्ष छोटा था, इसी शहर में उसका हार्डवेयर का अच्छा कारोबार था। विमल की पत्नी रूपा एवं दोनों बच्चे भी अब तक पहुँच चुके थे, सभी की आँखों में आँसू थे।

विमल एवं मानसी ने एक तरफ जाकर विचार विमर्श किया। अंतिम यात्रा का समय सुबह नौ बजे तय हुआ एवं उठावने का अगले रोज पाँच बजे। मानसी ने अलमारी से निकाल कर मेरी एक फोटो भी विमल को दी, ’’विमलजी! कल के अखबार में ’शोक-समाचार’ छपवा दो ताकि इनके ऑफिस वालों एवं अन्य सभी को खबर हो जाए।’’ मैं इसी शहर में भारत बैंक में लेखाकार के पद पर कार्यरत था। विमल ने फोटो लेकर आगे अपने एक मित्र को दे दी। दोनों अन्य मुद्दों पर विचार विमर्श करने लगे। मैं भी टैगोर चेयर छोड़कर उसके पास आकर खड़ा हो गया। किसी ने मुझे आते हुए नहीं देखा। मैं अदृश्य था। विमल ने रूंधे गले से कहा, ’’भाभी! भाई साहब तो मुझे अनाथ कर गए। माँ-बाप तो बचपन में मर गए, मुझे तो आप दोनों ने ही पाल पोसकर बड़ा किया। आज जब हमारे सेवा करने का समय आया तो भाई साहब चल बसे।’’ उसकी बात सुनकर मानसी फूट-फूट कर रो पड़़ी।

दोनों के आँसू थमे तो विमल ने कहा, ’’भाभी! मेरे पास कुछ दो-तीन हजार रूपये ही हैं, आप लोकाचार के लिए कुछ रकम घर में रखी हो तो मुझे दे दो। ऐसे समय में किसी अन्य से मांगना उचित नहीं।” मानसी ने अंदर से लाकर पन्द्रह हजार रूपये दिए एवं चैक-बुक में से फाड़कर एक चैक दिया, बोली, ’’एक दो रोज में रकम निकलवा लेना।’’ विमल आश्वस्त हुआ। मैं पास ही खड़ा हैरान था। सत्य मेरे सामने था। दस कदम दूर ही विमल के घर पर तीस हजार रूपये रखे थे पर वह तो सपाट झूठ बोल गया। मन-ही-मन अपनी चतुराई पर प्रसन्न था, भाभी से रूपये झड़प लिए, नहीं तो हिसाब मांगने में मशक्कत हो जाती। दोनों थोड़ी देर में अपने-अपने स्थान पर आकर बैठ गए। मैंने अब एक-एक के पास जाकर आत्म-साक्षात्कार की सोची। जिस दुनिया को मैं गले लगा रहा था, उसका ऐसा आलम!

सर्वप्रथम मैं मानसी के पास गया। मानसी इसी शहर की यूनिवर्सिटी के ’रसायनशास्त्र’ विभाग में गत दस वर्ष से प्राध्यापक थी। पिछले जन्म में वह एक डाकू थी, जिसने मेरे घर से डेढ़ सौ सोने की मोहरें चुराई थी। सचमुच उसे मेरी मृत्यु का बहुत दुःख हुआ था। कभी रोती, कभी विचारों में खो जाती-परेश ! तुम्हारे बाद इस जीवन को मैं कैसे बिताऊंगी ? तुम्हारे-हमारे बीच मत-मतान्तर अवश्य थे, पर मैं तुम्हे हृदय से चाहती थी। मुझे माफ करना परेश! तीन चार साल पहले मुझे मेरे विभाग में कार्यरत प्रोफेसर शर्मा से इश्क हो गया था, पर यह बात मैं तुमसे छिपा गई। उन दिनों तुम ऑफिस से देर रात शराब पीकर आते थे, मुझे तुम पर क्रोध आता था। शादी के चार-पाँच वर्ष तो तुमने बहुत प्यार किया पर बच्चे होने के बाद लापरवाह हो गए, इन्ही दिनों मेरा प्रोफेसर शर्मा से इश्क हो गया। यूनिवर्सिटी से निकलकर चुपके-चुपके हम शिल्पा के घर मिलते रहते थे। शिल्पा ने ही हमारे इश्क का सारा प्रबन्ध किया , बाद में मुझे अपनी भूल का अहसास भी हुआ। शिल्पा उसी के विषय में रिसर्च स्काॅलर थी। प्रोफेसर शर्मा उसके गाइड थे। मैं हैरान था, जिस स्त्री ने सदैव मेरी मंगल कामना की, करवा चौथ का व्रत रखा, मंगल-सूत्र पहना, उसका यह रूप। जिसे मैंने देवी समझकर जीवनभर हृदय के पुष्प एवं भावनाओं का नैवेद्य चढ़ाया, वही फिसल गई। मैं जीवित होता एवं मुझे पता चल जाता तो उसकी हत्या कर देता। उसने भनक तक नहीं पड़ने दी। इतना सबकुछ जानकर भी मैं विवश था। मैं तो सुख-दुःख से परे आत्म-अवस्थित था, एक ऐसे मुकाम पर खड़ा था, जहां न सुख है न दुःख, न लाभ है न हानि, सिर्फ एक सम्यक् एवं समत्व दृष्टि है।

जब भी बाहर से कोई स्त्री आती मानसी फूट-फूटकर रोती पर थोड़ी देर बाद ही उसे भविष्य की चिन्ता सताने लगती। मेरे पीएफ , ग्रेच्यूटी, पेंशन एवं बीमा रकम की एक धुंधली जोड़ वो लगाने लगी थी। कुल जोड़ निराशाजनक थी। बच्चों की जिम्मेदारियाँ मुँह बायें खड़ी थी। कितनी बार इन्हें समझाया, कम से कम बीमा तो अच्छी रकम का करवा लो पर यह तो सदैव लापरवाह थे। इनको तो फाकामस्ती पसन्द थी।

इतने में उसके पीहर की गाड़ी बाहर आकर रूकी। गाड़ी से मेरा साला मुकेश, उसका परिवार एवं अन्य रिश्तेदार उतरे। मेरा ससुराल इस शहरसे डेढ़ सौ किलोमीटर दूर रामपुर शहर में था। सूचना मिलते ही वो गाड़ी से आ गए। मानसी सबसे मिलकर फूट-फूट कर रोई। पति के मरने के बाद भारतीय विधवा का पीहर ही आधार बन जाता है। औपचारिकतावश वह ससुराल वालों ने स्नेह अवश्य रखती हैे पर पीहर ही में उसे अवलम्ब नजर आता है। जड़ें ससुराल में होती हैं पर ठण्डी हवा पीहर से आती नजर आती है।

मेरा साला मुकेश, विमल एवं अन्य पड़ोसियों के मध्य जाकर बैठ गया। सांत्वना देने मैं भी उसके पास गया। मेरी मृत्यु से भी अधिक वह अपनी बहन के दुःख से दुःखी था। अभी तो यह चालीस वर्ष की है, कैसे सारा जीवन ढोएगी, इसका तो जीवन तपस्या हो गया। उठावने के दूसरे रोज होने वाली ’पगड़ी रस्म’ का खर्चा भी उसे व्यथित कर रहा था। पिछले एक वर्ष में बचाई सारी रकम स्वाहा होने वाली थी। बेचारा गोआ घूमने की योजना बना रहा था, सारी योजना खटाई में पड़ गई। मानसी को जोड़कर उसके चार बहनें थी, जैसे तैसे जोड़-तोड़ जुगत बिठाता, कोई-न-कोई खर्चा उसके आगे-पीछे लगा ही रहता । श्वसुरजी के निधन के बाद वही ससुराल का कर्णधार था। उसे देखकर मैं द्रवित हो गया। मैंने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा, पिछले जन्म में वह एक गाँव में साहूकार था, जरूरत के मारे किसान उसके आगे हाथ फैलाते । वह रकम तो दे देता पर ब्याज की गणित में किसान को जीवन भर उलझा देता। मूल जस-का-तस बना रहता। इस जन्म में ये किसान उसकी बहनें बनकर आए थे।

मेरे साले के पास ही हमारे मौहल्ले के सबसे बड़े रईस राजीव अग्रवाल बैठे थे। हमारे घर से पचास कदम पर उनका आलीशान बंगला था। घर में गाड़ी, नौकर, ड्राइवर सब कुछ थे, पर थे विधुर। पिछले वर्ष ही उनकी पत्नी का निधन हुआ था। बैठे-बैठे सोच रहे थे, ये ईश्वर भी कितना बेरहम है, किसी की पत्नी उठा लेता है तो किसी का पति। उनकी उम्र मेरी उम्र के आस-पास ही थी, सोच रहे थे काश! उनकी व मानसी की शादी हो जाए। बुढ़ापा आराम से कट जाएगा, हर महीने वेतन की मोटी रकम भी मिलेगी। उसके स्वप्नवर्तुल उनके बच्चों की याद आते ही भंग हो जाते। पिछले जन्म में वो कौआ थे, हर समय इधर-उधर से हड़पने को तकते रहते। इस जन्म में और जन्मों के पुण्य से मनुष्य की देह तो मिल गई पर काक-प्रवृत्ति नहीं गई।

दुनिया के इस वीभत्स रूप को देखकर मैं दंग था। धीरे-धीरे सभी के पास होकर गुजरा। सभी एक मौन चुप्पी के पीछे न जाने क्या-क्या योजनाएँ बना रहे थे। कोई किसी का धन हड़पने की योजना बना रहा था, किसी को पुत्रों की चिन्ता खाये जा रही थी, कोई अपनी बीवी से परेशान था, कोई कारोबार से दुःखी था। जीवन की नश्वरता सत्य बनकर उनके सामने पड़ी थी पर कोई इस यक्ष प्रश्न के मर्म को पकड़ने की कोशिश ही नहीं कर रहा था। सबसे अधिक आश्चर्य तो मुझे हमारे पड़ोसी व्यासजी पर हो रहा था। इसी शहर कोतवाली में सब-इंसपेक्टर थे, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे थे। न जाने कितने लोगों से रकम हड़पकर उन्होंने हमारे पड़ोस में शानदार मकान बनाया था। इन दिनों उनकी मूंछ ज्यादा ही तन गई थी। उन्हें क्या पता था कि वे मात्र दस रोज बाद एक ट्रक के नीचे आकर मरने वाले है। जीवन भर की बचाई सारी सम्पदा उन्होंने मकान में लगा दी पर मकान में रहने का योग सिर्फ दस रोज का था। इस दस रोज के योग के लिए उन्होंने न जाने कितने पाप कर डाले। देव-दुर्लभ मनुष्य देह पाकर भी अपना परलोक बिगाड़ लिया। पापी के पाप में ही उसके विनाश के बीच छिपे हेाते है, पर माया का प्रेरा इंसान सदैव इससे बेखबर होता है। लोभवश, लालायित होकर हम ऐसी चीजों की ओर लपकते हैं, जिसमें हमारा अमंगल है, सत्यानाश हैे। तृष्णा एवं लोभ बुद्धि को ढक लेते हैं। पापी के पाप स्वयमेव प्रगट होते हैं। पिछले जन्म में व्यासजी ने धोखे से अपने मित्र की धन-संपदा हड़प ली थी, इतना पैसा होने पर भी जीवनपर्यन्त कुछ भी दान नहीं किया। इस जन्म में वही मित्र उनका पुत्र बनकर आया था। नियति के न्याय से मैं मंत्रमुग्ध था।

मैंने अपने पुत्र राजेश व बेटी माधवी की भी खबर ली। दोनों असीम वेदना से भरे हुए थे। रह-रहकर उनकी आँखें भर आती। राजेश के पास जाकर मैंने उसे मूक सांत्वना दी। बाजार का सारा सामान लाना उसी के जिम्मे था। उसकी ईमानदारी एवं व्यवहार-पटुता पर मुझे गर्व था पर आश्चर्य! मुझे पता चला कि वह हर माह हिसाब में चार-पांच सौ रूपये मार लेता जबकि मैं उसे यथेष्ट ’पाॅकेट मनी’ देता था। पिछले जन्म में वो सियार था।

बेटी माधवी तो मेरी आँखों की पुतली थी। घर-बाहर की सारी खबर वही मुझे देती थी। उसे मैं घर का सबसे पारदर्शी सदस्य समझता था, राजेश से छुपकर उसे अधिक हाथ खर्ची भी देता था। लेकिन कमाल हो गया, अपने काॅलेज के एक सहपाठी से वो गत दो वर्ष से प्रेम करती थी। दोनों अगले माह ’कोर्ट मैरिज’ करने वाले थे। उसे पता था पापा इण्टरकास्ट मैरिज की अनुमति नहीं देंगे। मुझे और मानसी को भनक तक नहीं थी। मैंने दिव्य चक्षुओं से देखा, पिछले जनम में वो लोमड़ी थी।

माधवी के पास काॅलोनी के एक अन्य निवासी सुरेश जिंदल बैठे थे। उन पर लक्ष्मी की असीम कृपा थी। अत्यन्त दूरदर्शी, अंधेरे में भी प्रकाश ढूंढ लेते। पिछले जन्म में वो उल्लू थे, इस जन्म में इसीलिए लक्ष्मी उन पर सवार थी। पास ही मुँह लटकाये एक अन्य पड़ोसी दामोदरजी उदास बैठे थे। उनका चेहरा लटका हुआ था, सदैव उलटा सोचते थे। पिछले जन्म में वो चमगादड़ थे।

सभी मानव रिश्तों ने मुझे निराश ही किया। अन्तिम आशा लिये मैं अपने कुत्ते ’जिम्मी’ के पास गया। बेचारे ने शाम से खाना भी नहीं खाया। दुःख के मारे उसके प्राण निकल रहे थे, सोच रहा था जब मेरे स्वामी ही नहीं रहे तो जीने से क्या फायदा ? कल इनकी जलती चिता में कूदकर प्राण दे दूंगा। मैं हैरान था। जिस मनुष्य को हम सभ्य कहते हैं, वह कितनी पाशविकता से भरा है एवं जिसे हम पशु कहते हैं, उसके विचार कितने निष्कलुष एवं परिष्कृत है।

धीरे-धीरे रात गुजरने लगी थी। गर्मी के दिन थे। क्षितिज के पूर्वी छोर से लालिमा बिखेरने लगी थी। समाचार-पत्र में शोक- समाचार पढ़कर यहाँ-वहाँ से सभी परिचित आने लगे थे। अंत्येष्टि का सामान भी आ चुका था। माटी को माटी में मिलाने की तैयारी हो रही थी। बचपन में माँ अक्सर एक भजन गाती थी ’ एक दिन उड़े ताल से हंसा, फिर नहीं आवैला।’ भजन के बोल सत्य चरितार्थ हो रहे थे। किसी ने बाहर हांडी में उपले लगा दिये थे, हांडी से धुआँ उठने लगा था। मेरे ऑफिस के भी बहुत से लोग आ चुके थे। दूर खड़े हमारे साथी वर्माजी के आँसू नहीं थम रहे थे, मैं उनके पास भी पहुँचा पर यहाँ भी माजरा उलटा था, सोच रहे थे, अब ऑफिस में सबसे वरिष्ठ बन जाऊंगा, अगले साल प्रमोशन पक्का है। मैं चुपचाप लौट आया।

संसार के इस रूप में देखकर मैं ठगा-सा रह गया। जिस संसार में ऐसे मित्र-रिश्तेदार बसते हों, जिस दुनिया का ऐसा घिनौना रूप हो, उस दुनिया से इतना मोह! ऐसी दुनिया में तो मृत्यु उत्सव है।

मैं घर से बाहर आ गया, दूर एक तेज प्रकाश में विलीन होने ही वाला था कि एक तेज आवाज सुनकर चौंक गया। मानसी सामने खड़ी थी, ’’ बंसल साहब! चाय तैयार है।’’ हर सुबह वही मुझे चाय के प्याले के साथ उठाती थी। मै हड़बड़ाकर उठा! सारा शरीर पसीने से भीग गया था। मैंने उठकर मुँह धोया एवं चाय पीने लगा।

वैराग्य का एक सुप्त अंकुर मेरे मन में जन्म ले चुका था। संतों ने ठीक ही कहा है- यह संसार एक गोरखधंधा है, इसके पेच बहुत कठिन हैं। जगत में कोई अपना नहीं होता, इंसान सिर्फ भ्रम पालता है। अब मेरा मन इस अद्भुत, अलौकिक स्वप्न की ’ताबीर’ढूंढने में लगा था।

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