दिनेश बाबू आज फिर लेट हो गये।
दिनेश बाबू सदैव प्रयत्नरत रहते कि ऑफिस समय पर पहुँचे, लेकिन मत्थे चढ़ी गृहस्थी की समस्याएँ अक्सर देरी कर देती। अभी दस रोज पहले ही सेठ अचलनाथ ने उन्हें लताड़ पिलाते हुए कहा था, ‘‘दिनेश बाबू! मैं देखता हूँ आप अक्सर लेट आते हैं। अगर आप जैसे वरिष्ठ कर्मचारी भी ऐसा करने लगें तो अन्यों को कैसे समझाएंगे ?” कहते हुए उन्होंने दिनेश बाबू को यूँ घूरा मानो कह रहे हों, समझदार को इशारा काफी है , मेरा स्वभाव तुम जानते हो, यही लच्छन रहे तो एक दिन उल्टे पैर रास्ता नपवा दूंगा। दिनेश बाबू सकपकाए, उन्होंने सर नीचे कर ‘साॅरी‘ कहा एवं चुपचाप अपनी सीट पर आकर बैठ गए।
किसी भी सज्जन को मुनासिब है कि वह डाँट-डपट अकेले में एवं प्रशंसा सबके सामने करे पर सेठ उल्टी खोपड़ी थे। वे प्रशंसा इस तरह करते कि अन्य कोई सुन न ले, लेकिन डाँट-डपट खुले आम करते। वे इस सिद्धांत के प्रबल पक्षधर थे कि एक कबूतर पर पत्थर मारने से बाकी सब सहम जाते हैं। उन्हें पता था हालात के मारे यह कबूतर अब कहीं अन्यत्र उड़ने वाले नहीं हैं। उनका स्पष्ट मानना था कि ऐसा सूत्र रामबाण की तरह प्रबंधन में कारगर होता है।
दिनेश बाबू अब दस वर्ष पुरानी मोपेड पर उड़ रहे थे। उनकी मोपेड अजायबघर की किसी सामग्री से कम नहीं थी। किक पर लगे रबर के गट्टे कब के काल कवलित हुए। कई बार किक लगाते हुए लोहे की छड़ टखने से टकराती तो दर्द भी होता पर वे ज़ब्त कर लेते। जहाँ तक संभव होता खर्च टालते रहते। उनका बजट इतना तंग होता कि अन्य खर्चों की गुंजाइश ही नहीं रहती।
जेठ के दिन थे। उन्होंने मोपेड चलाते हुए बाँया हाथ ऊपर कर घड़ी पर नजर डाली। कांटा आठ के पार था। इसी समय उन्हें ऑफिस पहुँचना होता था। सेठ अचलनाथ का रौद्ररूप उनकी आंखों के आगे उभर आया। वे सिहर गए। उन्होंने मोपेड की गति बढ़ाई एवं ऐसा करते हुए क्षणभर आसमान की ओर देखा।
सूरज पूर्वांचल से ऊपर उठ आया था। नित्य उगते हुए सूर्य को देखकर उनके मन में अजीब श्रद्धा का जन्म होता, पर आज यही सूरज आग उगल रहा था। मोपेड चलाते हुए उन्होंने एक-दो बार पुनः सूर्य को निहारा फिर जाने क्या सोचकर नज़रें सड़क पर जमा ली। आज सूर्य के प्रति उनके मन में श्रद्धा कम एवं भय अधिक था। यह भय उचित भी था। निःसंदेह सूर्य जगत को रोशन करता है, पर क्या उसका यूँ आंखें फाड़ना उचित है ?
दिनेश बाबू ऑफिस पहुँचे तो जानकर संतोष हुआ कि सेठ अचलनाथ किसी कार्य में फँस गये हैं। आज वे दो घण्टे देरी से आएंगे। जान बची लाखों पाए। उन्होंने मन ही मन प्रभु को धन्यवाद दिया, अपनी सीट पर आये एवं कार्य में मशगूल हो गए।
दिनेश बाबू सेठ अचलनाथ के यहाँ गत बीस वर्षों से लेखा-जोखा देखते थे। कार्य में पारंगत तो थे ही, नई तकनीक एवं नियमों से भी स्वयं को अपडेट रखते। इसी कारण पुरानी पद्धति के साथ कम्प्यूटर अकाउंटेंसी के भी विशेषज्ञ थे। अपने काॅलेज के दिनों में उन्होंने कभी कम्प्यूटर नहीं सीखा, लेकिन अपने कार्यक्षेत्र में पीछे रहना उन्हें नागवार था। इसी मनोवृति के चलते उन्होंने आनन-फानन कम्प्यूटर एवं आवश्यक प्रोग्राम सीख लिये। इसके अलावा वे एक कुशल कार ड्राइवर भी थे। वस्तुतः उन्होंने अपने कैरियर की शुरूआत एक अन्य सेठ के यहाँ ड्राइवर के कार्य से ही की थी। उसके लेखा विभाग में कार्य नहीं था तो उन्होंने यही कार्य कर लिया। अचलनाथ ने उन्हें लेखा-जोखा कार्य का प्रस्ताव किया तो वे ड्राइवरी छोड़कर यहाँ चले आए। अचलनाथ उनके इन गुणों को खूब समझता था, इसी कारण उसके चंद विश्वासपात्र लोगों में उनका नाम था। वैसे भी सेठों के खरे-खोटे लेखा-जोखा वाले अधिक जानते हैं एवं मालिक का यह अप्रत्यक्ष भय अंततः कर्मचारी के पक्ष में जाता है। सेठों की कमजोरी जानने वाले अपेक्षाकृत अधिक स्थायी होते हैं, यह एक सर्वविदित तथ्य है। बिल्ली आंटे आने पर मरती है।
दिनेश बाबू की उम्र भी अब चेहरे पर दृष्टिगत होने लगी थी। पैंतालीस पार थे लेकिन व्यवहार, चाल-ढाल एवं पहनावे से ऐसे लगते मानो पचपन पार हो। सर के आगे के बाल बहुत कुछ उड़ चुके थे, इसी के चलते ललाट ऊँची लगती। खोपड़ी के पीछे भी एक चन्द्राकार बिना बालों का पैच यूँ दिखता जैसे सपाट खेत में एक छोटा-सा पठार उभर आया हो। उनके पतले लंबोतरे मुंह पर प्लास्टिक का चश्मा वजनी लगता। समय-समय पर कार्य करते हुए चश्मे को उतारकर साफ करते तो आंखों के नीचे कालापन स्पष्ट नजर आता। वे कपड़े भी कुछ ऐसे ही पहनते कि उम्रदराज दिखते वरना अनेक बूढे़ कपड़े ऐसे पहनते हैं जैसे कोई छरहरा युवक हो। ऐसा करने से वे जवान तो नहीं बन जाते , हां , बुढ़ापा अपेक्षाकृत कम दृष्टिगत होता है।
गृहस्थी की जिम्मेदारियों ने भी दिनेश बाबू को असमय परिपक्व बना दिया था। पाँच साल के थे तो पिता चल बसे, माँ ने जैसे तैसे पालकर बड़ा किया। उनसे बड़ी दो बहनें थी जिनका विवाह करते-करते माँ खाली हो गई। रहा सहा दिनेश बाबू के ब्याह में निकल गया। दिनेश के ससुराल वाले भी राग्ये के भाई पराग्ये की तरह उनके जैसे थे। एक बड़ा फकीर , दूसरा छोटा। कौन किसकी मदद करे ? इन पच्चीस वर्षों में तीन बच्चों का इज़ाफ़ा हुआ, बड़ी दो बेटियाँ एवं सबसे छोटा पुत्र। बेटियों के विवाह अभी दो वर्ष पूर्व ही एक साथ निपटाये थे। दोनों में दो वर्ष का अंतर था पर अपनी माली हालत के चलते दिनेश बाबू को यही लाजमी लगा। बेटा अब अठारह का था एवं अभी काॅलेज में पढ़ रहा था। इन दिनों दिनेश बाबू गत दिनों की तुलना में निश्चिंत थे एवं अक्सर कहते भी थे अब उनके इतमीनान के दिन आये हैं। स्वभाव से संतोषी थे या यूँ कहो कि भाग्य ने उन्हें ऐसा बना दिया था। मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक ही तो होती है। उन्हें मालूम था सेठ के मुनीम की महत्वाकांक्षा कितनी होती है अथवा होनी चाहिये ? छल-छद्म से कोसों दूर थे। इसके अतिरिक्त भी कुछ गुण उनमें कूट-कूट कर भरे थे। वे परम स्वाभिमानी थे। लोगों से इस तरह पेश आते कि कोई उन्हें हल्के से न ले। पूरे ऑफिस में उनके कार्य की तूती बोलती। सभी जानते थे दिनेश बाबू पुरुषार्थी तो हैं ही कार्यकुशल भी हैं।
सेठ अचलनाथ के यहाँ कार्य करते उन्हें दो दशक हुए। अब तक वे सेठ की रग-रग जानते थे। वे जानते थे उसका व्यवहार कर्कश है। जब-तब, कारण-अकारण आँखें दिखाता रहता है, कहने-सुनने का ध्यान नहीं रखता पर कुछ ऐसे मानवीय गुण भी उसमें थे जो अन्यों में नहीं मिलते। दिनेश बाबू की छोटी-बड़ी अनेक विपत्तियों में उन्होंने ही पार लगाया था पर जब भी अहसान करते हजार बार गिनाते एवं पाई-पाई वसूलते। ऐसा करने के पीछे उनकी मंशा कर्मचारी के आत्म-गौरव के नाश की होती अथवा उस पर रौब जमाने की अथवा फिर उसे उसकी औकात से परिचय करवाने की, इस रहस्य को वे ही जानते थे। उसके तानों एवं जिल्लत की आंच से सभी कर्मचारी संतप्त थे, लेकिन वही बात ‘धणी रो कुण धणी’। मालिक की शिकायत सिवाय ईश्वर के किससे करें ? अकारण टोका-टोकी करना, बेवजह गरम होना उनका स्वभाव बन चुका था। खरी-खोटी सुनाने में वह जरा नहीं चूकते। इस मुद्दे पर अचलनाथ निहायत संगदिल एवं बेरहम थे। बहरहाल दिनेश बाबू की इसी सेठ के साथ गाड़ी चल रही थी।
अच्छे दिन कुछ लोगों के लिए ईश्वर की आँख चूकने जैसे होते हैं। अभी कुछ दिन पहले दिनेश बाबू ऑफिस से घर आकर संजोली से बतिया रहे थे कि यकायक संजोली ने सीने में तेज दर्द की शिकायत की। वैसे संजोली उनकी तरह ही सहनशील थी। छोटे-मोटे दर्द तो गरीब आदमी वैसे भी पीना सीख लेता है पर आज मानो दर्द थम ही नहीं रहा था। उन्होंने पुत्र को पुकारा एवं संजोली को लेकर एक प्राईवेट अस्पताल पहुँचे। डाॅक्टर ने जाँचकर इसीजी आदि किया तो पता चला कि उसे हृदयघात हुआ है। तात्कालिक तौर पर डाॅक्टर ने कुछ दवाइयाँ एवं विश्राम की सलाह दी। दस दिन पश्चात् कुछ अन्य परीक्षण हुए तो पता चला कि हृदय धमनियों में ब्लाकेज हैं एवं इस हेतु बाईपास सर्जरी आवश्यक है। डाॅक्टर से उन्होंने कुल खर्च पूछा तो उसने पाँच लाख बताए एवं यह भी आगाह किया कि ऑपरेशन दो-तीन माह में हो जाए तो उचित है।
दिनेश बाबू का दिल बैठ गया। ऑपरेशन चूंकि शीघ्रातिशीघ्र करवाना था, दिनेश बाबू इन दिनों परेशान दिखते। खोपड़ी में तरह-तरह की जोड़-तोड़, समीकरण चलते रहते, लेकिन कुल जमा इसी निष्कर्ष पर पहुँचते कि इतनी बड़ी रकम इकट्ठा करना उनके बूते की बात नहीं है। यही सोचते-सोचते इन दिनों बात-बेबात उखड़ जाते। संजोली से वे बेइंतहा प्यार करते थे। उनके कठोर संघर्ष पथ की वह समभागिनी थी। इस बात की कल्पना से ही उनके औसान जाते रहते कि संजोली धन के अभाव में दम तोड़ दें। पन्द्रह हजार मासिक वेतन में वे क्या बचत करते ? तनख्वाह तवे की बूंदों की तरह उड़ जाती। जब-तब बहन-बेटियों के खर्चे काले बादलों की तरह मंडराते रहते। कभी कुछ बचा भी लेते तो माँ की तीमारदारी, बच्चों की शिक्षा आदि में रकम उड़ जाती। स्थिति हर दम ढाक के तीन पात वाली होती। लेकिन इस बार तो आपात स्थिति आन पड़ी थी।
दिनेश बाबू जानते थे इस हालात में सेठजी की कृपा ही डूबते को तिनखे का सहारा बन सकती है, लेकिन उनका स्वभाव जानकर सहम गए। इन दिनों नित्य से अधिक कार्य करते, जब-तब सेठ को रिझाने की कोशिश करते एवं फिराक में रहते कि मूड अच्छा हो तो पाँच लाख अग्रिम लेने की बात करूँ। दुःख के इस गोवर्धन को तो सेठ अचलनाथ ही अपनी कृपा-तर्जनी पर उठा सकता था।
इसी उधेड़धुन में एक माह बीत गया। जेठ को विदाकर आषाढ़ दस्तक दे चुका था। दिनेश बाबू ऑफिस आए तब से काम में लगे थे। आज सुबह घर से निकले तब मौसम खुशगवार था। कल आषाढ़ की पहली बारिश पड़ी थी। प्रकृति की उमंग के साथ ही जड़-चेतन सभी प्रसन्न नजर आते थे। सेठ अचलनाथ भी आज अपेक्षाकृत खुश था। दिनेश बाबू जब-तब काम निपटाते हुए उसकी तरफ देखते एवं मन ही मन सोचते- इससे इतनी बड़ी रकम कैसे मांगूं? उन्होंने एक-दो बार उठकर कहने का साहस भी किया पर लौटकर पुनः बैठ गए। उसे कहना मधुमक्खी का छत्ता छेड़ना जैसा था। इसी उलझन में शाम हो गई। क्षणभर के लिये संजोली का निरीह चेहरा उनकी आंखों के आगे से गुजर गया। वे बिफर गए। उनका तनाव सर चढ़ बैढा। कहने-न कहने की कशमकश में खोपड़ी गरमा गई। इस घोर दुःख को वे कितनी देर झेलते ? अंततः उन्होंने तनाव उगलने का निर्णय लिया। वे साहस कर अचलनाथ के समीप आए एवं मन का भेद खोल दिया, ‘‘सर! आप तो जानते है संजोली बीमार है। डाॅक्टरों ने तुरन्त ऑपरेशन की सलाह दी है। मुझे पाँच लाख रुपयों की सख्त आवश्यकता है।” वे एक सांस में सब कुछ बोल गए। मन का भेद खोलते ही उन्हें लगा प्राण गले में अटक गए हैं।
उनके कहते ही सेठ अचलनाथ ने उन्हें यूँ देखा मानो कह रहा हो फकीर ले तो लेगा पर चुकाएगा कैसे ? दिनेश बाबू पुराने चावल थे, उन्होंने उनकी मनोदशा ताड़ ली, हाथ जोड़कर बोले, ‘‘सर! आपने इतने काम निकलवाए हैं, यह बला भी टलवा दो, मैं छह माह पश्चात् कुछ रिश्तेदारों से लेकर चुकता कर दूंगा।” सेठ अचलनाथ गंभीर हुए। वे जानते थे दिनेश बाबू बात के पक्के हैं। इन दिनों अनेक जरूरी काम भी उनसे बंधे थे, जाने क्या सोचकर उन्होंने दिनेश बाबू को ‘हाँ’ कर दी। इस हाँ को सुनकर दिनेश बाबू के कानों में अमृत बह गया। उनकी स्थिति अंधा क्या चाहे दो आँखें वाली थी। उन्होंने तुरत-फुरत अपाॅईंटमेंट लेकर संजोली का ऑपरेशन करवाया। दस रोज तो वह गंभीर रही, पर धीरे-धीरे उसकी दशा में अप्रत्याशित सुधार हुआ। दो माह बीतते वह भली चंगी हो गई।
अब दिनेश बाबू को ऋण चुकाने की चिंता सताने लगी। एक बार अचलनाथ ने उन्हें बुलाकर पूछा भी रकम कैसे चुकाओगे ? सुनते ही उन्हें सांप सूंघ गया, पर आंतरिक भावों को दबाकर पूरे आत्मविश्वास से बोले, ‘‘सर! आप निश्चिंत रहें, मैं समय पर चुका दूंगा।” मन की दुर्बलता प्रकट करतेे तो अचलनाथ प्राण ले लेता। इसी कशमकश में छः माह और बीत गए। अब तो मियादी माह से भी दो माह अधिक हो गए।
दो-चार दिन तो अचलनाथ चुप रहा लेकिन अंततः मोर्चा संभाल लिया। उसने पुराने पैंतरे डाले। इन दिनों दुगुना काम लेता एवं जब-तब सुनाता भी – मैंने क्या सोचकर पैसे दे दिये, इन फकीरों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये, मैं तो फंस गया, होम करते हुए हाथ जल गये, जाने कैसे रकम वापस आयेगी आदि-आदि अनेक ताने उसकी ज़ुबान पर होते। दिनेश बाबू को यह ताने विषबुझे तीर की तरह लगते पर ज़ब्त करने के अतिरिक्त उनके पास अन्य क्या विकल्प था ? जिसने समय पर मदद की हो उसे प्रति उत्तर कैसे देते ? वादाफरामोशी भी तो उन्होंने ही की थी।
समय बीतने के साथ अचलनाथ उखड़ने लगा। उसने तीर तीखे किये। दिनेश बाबू को खरी-खोटी सुनाने में अब वह जरा नहीं चूकता। कभी-कभी तो गाली-गलौच पर उतर आता। ऐसा नहीं था कि उसके लिए पाँच लाख बड़ी रकम थी एवं वह बीस वर्ष पुराने कर्मठ कर्मचारी पर विशेषतः उस पर जिसने अपने विवेक से उसे लाखों का फायदा पहुँचाया हो, कुर्बान नहीं कर सकता था, पर पैसा प्राणों से प्यारा था।
इन दिनों दिनेश बाबू अक्सर काम में मशगूल होते। मार्च के अंतिम दिनों में लेखा-जोखा वाले अधिक व्यस्त होते हैं। इस वर्ष संयेाग से सेठ का व्यवसाय भी खूब चला। यह दिनेशबाबू की दुआओं का अगोचर प्रभाव था अथवा उसका अपना भाग्य पर यह बात तो तय है कि इंसान अपने सत्कर्मो की फसल काटता अवश्य है। नेकी के एक बीज से हजारों बाले फूटते हैं।
इन्हीं दिनों अचलनाथ को तीन करोड़ का एक बड़ा आर्डर मिला। इस आर्डर को पूरा करने के लिए तुरन्त कच्चा माल खरीदना आवश्यक था। आज दिनेश बाबू जब घर जाने लगे तो अचलनाथ ने उन्हें बुलाकर कहा परसों सुबह हमें गाड़ी में पचास लाख लेकर दिल्ली जाना है। रकम नगद देंगे तो माल औने – पौने सस्ता मिलेगा। आप कल रकम बैंक से निकलवा लें। परसों सुबह हम दोनों दिल्ली साथ चलेंगे। रास्ते में बन पड़ा तो पुराने ग्राहकों से नये आर्डर भी प्राप्त कर लेंगे।
सेठ अचलनाथ एवं दिनेश बाबू अब गाड़ी में दिल्ली प्रस्थान कर रहे थे। दिनेश बाबू कुशल ड्राइवर तो थे ही, आज वही कार ड्राइव कर रहे थे। उनकी ड्राइविंग पर अचलनाथ को पूरा भरोसा था। अचलनाथ उनके पास दूसरी सीट पर बैठे थे। मौसम खुशगवार था। सवेरे की ठण्डी हवा दिनेश बाबू के मन को सुकून दे रही थी। कनखियों से वे कभी-कभी सेठजी को भी देख लेते। कभी-कभी उनके अवचेतन मन में यह भय भी उभर आता कि ठाले बैठे सेठजी पाँच लाख वसूली का मुद्दा न उठा लें। लेकिन अचलनाथ ठेठ के बनिये थे। जिस गाड़ी के ड्राइवर दिनेश बाबू हो एवं जिस गाड़ी में वे स्वयं बैठे हो उसके ड्राइवर का मूड खराब कर वे स्वयं की जान जोखिम में डालने वालों में नहीं थे।
दिन में वे रास्ते पर आने वाले अनेक पुराने ग्राहकों से भी मिले। इसी चक्कर में एवं लंच लेते चार बज गए। दिल्ली अब भी करीब दो सौ किमी दूर थी। हर हाल में शाम तक दिल्ली पहुँचकर रकम सुरक्षित रखनी थी। यही सोचकर दिनेश बाबू ने गाड़ी तेज की। दिन रहते गाड़ी तेज चलाई जा सकती है, अंधकार होने पर हेडलाईट की तेज रोशनी में रफ़्तार आधी हो जाती है।
दिनेश बाबू गाड़ी चला रहे थे कि यकायक मोड़ पर गिरा पेड़ देखकर चौंके। उन्होंने गाड़ी धीरे की एवं मोड़कर आगे बढ़ने ही वाले थे कि एक पेड़ की आड़ से मुंह बांधे दो लुटेरे गाड़ी के समीप आए, उनमें से एक ने उनकी कार का दरवाजा खोला एवं दिनेश बाबू को खींचकर बाहर पटक दिया। दिनेश बाबू स्थिति भाँप गए। वे कुछ करते तब तक उसने उनके सिर पर पिस्तौल तान दी। सारा माजरा देख अचलनाथ काँपने लगा। कुछ करते नहीं बन पा रहा था। तभी दूसरे लुटेरे ने दूसरी ओर जाकर सेठ अचलनाथ की काॅलर पकड़ी, उन्हें बाहर खींचा एवं तेज आवाज में कहा, ‘‘बैग सुपुर्द करो, वरना………..।” विवश अचलनाथ ने नोटों भरा बैग उसके हाथ में थमाया एवं बदहवास वहीं बैठ गए। अचलनाथ वैसे भी कच्चे थे। बड़बोले व्यक्तियों की आत्मा बहुधा अशक्त होती है।
दिनेश बाबू की स्वामीभक्ति अब दाँव पर थी।
वे जरा भी होशियारी दिखाते तो मरना तय था।
दिनेश बाबू ने साहस बटोरा। अतीत में किये अचलनाथ के अहसान उनकी आँखों में उतर आये।
प्राण संकट में फँसे व्यक्ति के पास दो ही विकल्प होते हैं – आत्मसर्मपण अथवा अगर वह मरने की ठान ले तो अनेक बार अप्रत्याशित परिणाम भी निकल आते हैं।
दिनेश बाबू को दूसरा विकल्प ही उचित लगा। नमक का मूल्य चुकाने का ऐसा अवसर फिर कब मिलता ? ऐसा सोचते ही स्वामीभक्ति का भाव उनके सर चढ़ बैठा। वे अचलनाथ के दुर्व्यवहार, ताने मारने एवं जिल्लत की कसक पूर्णतः भूल गये। दीपक जलने पर भला कब अंधेरा रहा है।
दिनेश बाबू के मस्तिष्क में एक भीषण संकल्प तैर गया।
जान की परवाह किए बगैर उन्होंने पास खडे़ लुटेरे के हाथ से बैग छीना एवं समीप ही खडे़ पिस्तौल ताने लुटेरे से गुत्थमगुथा हो गए। लुटेरा बैग छीनने का पूरा प्रयास कर रहा था एवं वे पिस्तौल छीनने का। इसी कशमकश में लुटेरे ने दो गोलियाँ दागकर उन्हें लहुलूहान कर दिया। गोलियाँ दिनेश बाबू की छाती के पार हो गई पर उन्होंने बैग नहीं छोड़ा। इसी दरम्यान शोर सुनकर कुछ लोग घटनास्थल की ओर बढे़ तो दोनों लुटेरे पेड़ की आड में रखी मोटरसाइकल पर भाग खडे़ हुए।
लहुलूहान दिनेश बाबू ने बैग अचलनाथ को थमाया और कहा, ‘‘सर! मैं आपका ऋण तो नहीं चुका पाया पर यह आपके नमक का मूल्य है। मेरी आत्मा का दान लेकर आज मुझे ऋणमुक्त कर दीजिये।”
अचलनाथ को काठ मार गया। उनकी पराजित-ग्लानित आत्मा उन्हें धिक्कारने लगी। कुछ कहते नहीं बन रहा था। साहस कर बोले, ‘‘दिनेश बाबू! यह तुमने क्या कर दिया?” लेकिन दिनेश बाबू अब कहाँ थे। ऋणमुक्त हंसा भारविहीन होकर क्षणभर में उड़ गया।
सेठ अचलनाथ के कपोल आंसुओं से नहा गए। दिनेश बाबू का हाथ अपने हाथ में लिये वे मन ही मन बुदबुदा रहे थे, ‘‘तुम्हारे जैसा खुद्दार एवं ऐसी खुद्दारी तो दुनिया में अब तक नहीं देखी।”
कहते हैं इस घटना के पश्चात् सेठ अचलनाथ ने किसी कर्मचारी को गलत शब्द नहीं कहे।
खुद्दारी का मूल्य जानने के पश्चात् भला उस पर क्या नहीं वारा जा सकता है ?
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11 – 08 – 2011
