आसमान की छाती पर विचरने वाला अकेला चांद किससे बतियाता है ? वह क्या इतना एकांतप्रिय हो गया है कि उसे किसी का संग नहीं सुहाता ? यह भी तो हो सकता है कि ऐसा होना उसकी मजबूरी…
कंदराएं
अगर मैं यह कहूं कि काली आंखें, गोरा रंग, तीखे नक्श एवं मतलब-बेमतलब बात-बात पर हंसने वाली लड़की का नाम पद्मा है तो गलत नहीं कह रहा। सचमुच ये सभी बातें उसमें मौजूद थी। लेकिन जैसे चांद में…
अदृश्य हाथ
दुनिया की ज़ुबान भला कौन पकड़ सकता है ? यहाँ जितने मुँह उतनी बातें हैं। फैक्ट्री के मुलाजिम एवं मजदूर इन दिनों जहां मिलते, एक ही बात करते, ‘‘आखिर सेठ हरनारायण को हो क्या गया है ? कल…
सेवा
मि. कक्कड़ की व्यथा वे ही जानते थे। पिता की सेवा करते-करते शारीरिक तथा मानसिक दोनों स्तर पर वे टूट चुके थे। उनकी पत्नी सुरेखा की आंतें भी श्वसुर की तीमारदारी करते गले में आ चुकी थी। मि.…
धरोहर
सूरज की पगड़ी सिर पर रखकर दिवस ने गंभीर आँखों से चारों ओर निहारा तो संपूर्ण जगत एक विचित्र भय से सिहर गया। जाने क्या सोचकर किसानों ने अपने हल सम्हाले, कामगारों ने औजार एवं जुलाहे करघों पर…
जीत
मीना और महेश की दुश्मनी सारे मौहल्ले में मशहूर थी। यह भी कैसी दुश्मनी हुई ? दो दादाओं , दो पहलवानों , दो राजाओं , दो उस्तादों यहाँ तक कि दो स्त्रियों की दुश्मनी के बारे में तो…
हवेलियाँ
विदेशी सैलानियों से भरी वातानुकूलित लक्ज़री बस ’सम’ गाँव की ओर भागी जा रही थी। ‘डेविड स्मिथ’ दूसरी कतार में दायें खिड़की के पास बैठा मीलों पसरे रेगिस्तान को निहार रहा था। चारों और मिट्टी का समुद्र फैला…
तृप्ति
आकाश का पूर्वी छोर प्रभात की नवरश्मियों से रंजित हो चुका था। कलियों ने सूर्यदेव के दर्शन हेतु घूंघट उठाए तो नवकिरणों का स्पर्श पाकर उनके चेहरे पर बिखरी बूंदें कुदरत के मोतियों की तरह चमक उठी। गर्मी…
लुगाईलट्टू
धरती जैसे सूर्य का चक्कर लगाती है, चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता है, केदारनाथ भार्गव अपनी पत्नी के इर्दगिर्द उपग्रह की तरह घूमा करते थे। मोहल्ले की स्त्रियों के लिए यह कौतुक का विषय था, मर्दों के…
युगाान्तर
आज सुबह से ही घर में सभी काम पर लगे थे, सभी के चेहरों पर एक विशेष उत्साह था। सबको मालूम था, आज लड़के वाले रेखा को देखने आ रहे हैं। उमेश पंखें, फानूस, ट्यूबें चमका रहा था।…
फुहार
ऑफिस पहुँचकर मेरी टेबल में आधी घुसी कुर्सी को खींचकर मैं इतमीनान से बैठ गया। गत दस वर्षों से मैं इसी टेबल-कुर्सी को प्रयुक्त करता था। अब तो यह मुझे अपनी निजी सम्पत्ति जैसी लगती थी। रोज प्रयुक्त…
ढोल-थाली
जोड़े तो दुनियाँ में बहुत देखे पर जगताप्रसाद बाली एवं वीणा जैसा जोड़ा कहीं नहीं देखा। शायद उनको देखकर ही किसी ने ‘एक और एक ग्यारह होते हैं’, वाला मुहावरा बनाया होगा। बाली साहब गलत हो या सही,…
